शिव तत्त्व का साक्षात्कार है ॐकार साधना का उद्देश्य

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शिव तत्त्व का साक्षात्कार है ॐकार साधना का उद्देश्य

महादेव ने ब्रह्मा जी और श्रीहरि को अपने पंचकृत्यों के बारे में समझाया।

  • सृष्टि: जगत की रचना

  • स्थिति: जगत का पालन

  • संहार: जगत का विनाश

  • तिरोभाव: सत्य को छिपाना

  • अनुग्रह: कृपा या मोक्ष

इनमें से सृष्टि, स्थिति, संहार और तिरोभाव का कार्यभार उन्होंने क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश को सौंप दिया था।

रुद्र और महेश की श्रेष्ठता

रुद्र और महेश सर्वदा भगवान शिव के ध्यान में ही मग्न रहते हैं। इसके कारण उन्हें शिव का ही रूप प्राप्त हुआ। ब्रह्मा और श्रीहरि ने ऐसा नहीं किया, इसलिए उनका स्वरूप भगवान शिव से भिन्न रहा।

भगवान शिव ने उनसे कहा:

"तुम दोनों का अवधान मेरे ऊपर नहीं होने से तुमने मेरे बारे में पूर्ण रूप से जाना भी नहीं। इसलिए ही तुम दोनों लड़ रहे थे कि 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' बोलकर।"

उन्होंने आगे समझाया कि यदि वे भी रुद्र और महेश की तरह शिव तत्व को जान लेते, तो उन्हें भी महादेव जैसा रूप मिल जाता।

ॐकार (ओंकार) की महिमा

महादेव ने ब्रह्मा और विष्णु को ज्ञान प्राप्ति के लिए ॐकार मंत्र का जप करने का निर्देश दिया:

  • ॐकार के जप से शिव के बारे में ज्ञान प्राप्त होगा और उनका साक्षातकार हो सकेगा।

  • शिव तत्व को साक्षात करना ही ॐकार का मुख्य प्रयोजन है।

  • ॐकार का उद्भव भगवान शिव के मुख से ही हुआ था।

  • ॐकार वाचक है, तो उसके वाच्य स्वयं शिवजी हैं।

ॐकार के पांच अंग और पंचाक्षर मंत्र

ॐकार के पांच घटक या अंग भगवान शिव के पांच मुखों से उत्पन्न हुए हैं:

मुख ॐकार का अंग
उत्तरवर्ती मुख अकार
पश्चिमवर्ती मुख उकार
दक्षिणवर्ती मुख मकार
पूर्ववर्ती मुख बिंदु
मध्यवर्ती मुख नाद

इन पाँचों के मेल से ॐकार बना है, जिससे सारा जगत व्याप्त है।

पंचाक्षर मंत्र और अन्य मंत्रों का संबंध

  • पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) की उत्पत्ति ॐकार से ही हुई है।

  • ॐकार शिवजी का निर्गुण स्वरूप है, जबकि पंचाक्षर मंत्र उनका सगुण स्वरूप है।

  • संस्कृत की वर्णमाला और गायत्री छंद की उत्पत्ति भी पंचाक्षर मंत्र से ही हुई है।

  • संसार के करोड़ों अन्य मंत्रों की शक्ति पंचाक्षर मंत्र पर ही आधारित है।

अंत में, महादेव ने बताया कि यदि किसी को हर प्रकार की सिद्धि और ज्ञान चाहिए, तो उसे पंचाक्षर मंत्र का जप करना चाहिए, क्योंकि हर मंत्र इसके अंतर्गत ही आता है।

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