मंत्र दीक्षा गुरु और गुरुपत्नी दोनों साथ में रहकर देते हैं

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मंत्र दीक्षा गुरु और गुरुपत्नी दोनों साथ में रहकर देते हैं

भगवान शिव के पाँच कृत्य और ओमकार की महिमा

 भगवान भोलेनाथ महादेव के पाँच कृत्य हैं: सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह। संहार के बाद अगली सृष्टि तक जगत को कहीं छुपा कर रखना, इसे कहते हैं तिरोभाव। अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करना, संसार से मुक्ति प्रदान करना, यह है अनुग्रह

कार्यभार का वितरण

भगवान शिव ने इनमें से चार कृत्यों का कार्यभार सौंप दिया:

  • सृष्टि: ब्रह्मा को

  • पालन: विष्णु को

  • संहार: रुद्र को

  • तिरोभाव: महेश को

अनुग्रह करने का अधिकार उन्होंने अपने पास ही रखा। रुद्र और महेश सर्वदा भगवान शिव का ही ध्यान करते रहते हैं, इसलिए उन्हें शिव का ही रूप मिला जिसे सारूप्य कहते हैं। ब्रह्मा जी और श्रीहरि का रूप शिवजी से भिन्न रहा।

ओमकार दीक्षा और विधि

भगवान ने ब्रह्मा और विष्णु से कहा कि मेरे सदृश रूप को पाने के लिए ओमकार का जप करना शुरू करो। ओमकार ही एक ऐसा मंत्र है जो शब्द के रूप में शिवजी का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है।

भगवान शिव ने ब्रह्मा जी और श्रीहरि को ओमकार की दीक्षा दी। मंत्र दीक्षा की एक विधि होती है:

  • मंत्र दीक्षा कहीं पर भी और किसी भी समय नहीं दी जाती।

  • उपनयन संस्कार के समय एक वस्त्र को वितान की तरह पकड़कर उसके नीचे माता-पिता और पुत्र बैठते हैं। यह इसलिए है क्योंकि मंत्र एक रहस्य है जिसे कोई दूसरा न सुन ले।

  • गुरु और गुरु-पत्नी दोनों का होना ज़रूरी है। गृहस्थाश्रमी से मंत्र ग्रहण सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

मंत्र दीक्षा की प्रक्रिया

भगवान शिव ने पार्वती माता को साथ लेकर ब्रह्मा और विष्णु को दीक्षा दी। वे चारों वस्त्र के नीचे आए और शिष्यों ने उत्तर की ओर मुख करके बैठकर दीक्षा प्राप्त की। भगवान ने दोनों के सिर पर हाथ रखकर तीन बार ओमकार का उच्चारण किया। तीन बार उच्चारण इसलिए किया गया क्योंकि मनुष्य के तीन शरीर होते हैं: स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर

गुरु दक्षिणा और स्तुति

गुरु दक्षिणा के रूप में ब्रह्मा और विष्णु ने स्वयं को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर दिया। मंत्र दीक्षा पाकर दोनों ने शिवजी की स्तुति की:

नमो निष्कलरूपाय नमो निष्कलतेजसे। नमः सकलनाथाय नमस्ते सकलात्मने।।

निष्कल का अर्थ है रूप रहित। भगवान शिव का एक भाव आकार रहित भी है। वे सबके नाथ हैं और सबकी आत्मा हैं।

नमः प्रणववाच्याय नमः प्रणवलिंगिने। नमः सृष्ट्यादिकर्त्रे च नमः पञ्चमुखाय ते।।

प्रणव जिसे सूचित करता है, वे शिवजी ही हैं। उनके पाँच मुख हैं: तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, ईशान और अघोर। इन्हें ही पञ्चब्रह्म कहते हैं।

ब्रह्मा जी और श्रीहरि ने भगवान शिव को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया और उनके बीच गुरु-शिष्य का संबंध स्थापित हुआ।

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