वेदों में गौ माता

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वेदों में गौ माता

अथर्व वेद दूसरा कांड छब्बीसवां सूक्त में कहा है कि-

एह यन्तु पशवो ये परेयुर्वायुर्येषां सहचारं जुजोष।

वायु भगवान गायों के साथ चलकर उन की रक्षा करते हैं।

त्वष्टा येषां रूपधेयानि वेद।

त्वष्टा मतलब सूर्य भगवान।

सूर्य भगवान गाय के गर्भ के अंदर बछडे को अपना स्वरूप देते हैं।

अथर्व वेद तृतीय कांड चौदहवां सूक्त में गौ से प्रार्थना करते हैं-

अहर्जातस्य यन्नाम तेना वः संसृजामसि ।

हमें पुत्रपौत्रादि से संपन्न करें।

मयि संज्ञानमस्तु वः ।

मेरे ऊपर आप लोगों की प्रीति हो जाएं।

ऋग्वेद में प्रार्थना करते है-

आ गावः अस्मे भद्रमक्रन्

गौ हमारा कल्याण करने आए।

प्रार्थना करते हैं कि-

न ता अर्वा अश्नुते

ये गाय बाघ जैसे हिंसक जानवरों से आक्रमित न हो।

न संस्कृतत्रमुपयन्ति ।

मांस को काट कर खाने वालों के हाथ में ये गाय न फसें।

इमा या गावः स जनास इन्द्रः ।

इन्द्रादि देवताओं को भी गौ माता आपने दूध से, दही से और घी से पुष्ट करती है।

उन का शरीर गौ माता का ही दिया हुआ है।

इस कारण से गौ माता ही सारे देवता हैं ।

यजुर्वेद मे बोला है- गायत्राः पशवः ।

गौ और गायत्री मंत्र एक दूसरे से भिन्न नहीं है ।

यह है संक्षेप में गौ माता की महिमा ।

इसे जानें, गौ माता के भक्त अपनी भक्ति और आस्था को और दृढ करें।

जो वर्तमान में गौ भक्त नहीं हैं वे भी गौ भक्त बनें।

कम से कम गौ भक्तों की भावनाओं का आदर करें।

अपने धर्म का पालन करने में उन को सहयोग दें।

गौ माता की रक्षा करें ।

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गौ माता की महिमा

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