
मंत्र -
विश्वरूपां सुभगामच्छावदामि जीवलाम् ।
सा नो रुद्रस्यास्तां हेतिं दूरं नयतु गोभ्यः ॥
यह अथर्ववेद, षष्ठ काण्ड में ५९-वां सूक्त का तीसरा मंत्र है।
सामान्य अर्थ -
इस मंत्र में प्रार्थना की गयी है कि भय उत्पन्न करनेवाला कोई भी श्स्त्र गौओं के पास न आवे।
गौएं सदा सुरक्षित और निर्भय रहें।
विश्लिष्ट अर्थ -
विश्वरूपाम्
समस्त जगत में व्याप्त, अनेक रूपों वाली।
सुभगाम्
मंगलमयी, कल्याण प्रदान करने वाली।
अच्छा वदामि
मैं उसकी ओर प्रार्थना करता हूँ, उसे पुकारता हूँ।
जीवलाम्
जीवन देने वाली, प्राणों की रक्षा करने वाली।
सा नः
वह हमारे लिए।
रुद्रस्य हेतिम्
रुद्र का भय उत्पन्न करने वाला अस्त्र, दंड या विनाशकारी शक्ति।
अस्ताम् दूरं नयतु
उसे दूर ले जाए, शांत कर दे।
गोभ्यः
हमारी गायों के पास से।
गहरा संदेश -
पहला गहरा संकेत यह है कि यहाँ ‘रुद्रस्य हेतिम्’ को सीधे रोकने की नहीं, बल्कि ‘दूरं नयतु’ की प्रार्थना है। इसका अर्थ है — विनाशकारी शक्ति का पूर्ण नाश नहीं, बल्कि उसका संतुलन। वैदिक दृष्टि में शक्ति का विरोध नहीं किया जाता, उसे संयमित किया जाता है।
दूसरा, ‘गोभ्यः’ का अर्थ केवल गाय नहीं है। वेदों में ‘गो’ का अर्थ प्रकाश, इंद्रिय, वाणी और पृथ्वी भी होता है। इस प्रकार यह मंत्र प्रार्थना करता है कि हमारी जीवन-शक्ति, हमारी चेतना, हमारी समृद्धि और हमारा धर्म किसी भी भयकारी आघात से सुरक्षित रहें।
तीसरा, ‘जीवलाम्’ शब्द बताता है कि हम जीवनदायिनी शक्ति को पुकार रहे हैं। इसका अर्थ है कि जीवन की रक्षा केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि दिव्य करुणा से होती है। यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि सुरक्षा का मूल स्रोत आध्यात्मिक है।
चौथा, इस मंत्र में भय की स्वीकृति है, पर भय के सामने समर्पण नहीं है। यह सक्रिय प्रार्थना है। संदेश यह है कि समाज को अपने पोषण-आधार — गौ, अन्न, प्रकृति, धर्म — की रक्षा के लिए सजग रहना चाहिए।
पाँचवाँ, यहाँ गौओं की निर्भयता की कामना की गई है। निर्भयता केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं है। यह सामाजिक व्यवस्था का आदर्श है — जहाँ पालन-पोषण करने वाली शक्तियाँ भयमुक्त हों। जब पोषण सुरक्षित है, तभी संस्कृति सुरक्षित है।
प्रश्नोत्तर -
इस मंत्र में किसका आह्वान किया गया है?
उत्तर: इस मंत्र में विश्वरूपा, मंगलमयी और जीवनदायिनी शक्ति का आह्वान किया गया है, जो समस्त जगत में व्याप्त है।
‘विश्वरूपा’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘विश्वरूपा’ का अर्थ है वह शक्ति जो पूरे विश्व में विभिन्न रूपों में विद्यमान है और सबको धारण करती है।
‘सुभगा’ विशेषण से क्या संकेत मिलता है?
उत्तर: ‘सुभगा’ से उस दिव्य शक्ति की मंगलमय, कल्याणकारी और सौभाग्य देने वाली प्रकृति का संकेत मिलता है।
‘जीवलाम्’ शब्द का क्या भाव है?
उत्तर: ‘जीवलाम्’ का अर्थ है जीवन देने वाली और प्राणियों की रक्षा करने वाली शक्ति।
‘रुद्रस्य हेतिम्’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: इसका अभिप्राय रुद्र के उस अस्त्र या शक्ति से है जो भय या विनाश उत्पन्न कर सकती है।
इस मंत्र में किससे रक्षा की प्रार्थना की गई है?
उत्तर: इस मंत्र में प्रार्थना की गई है कि भय उत्पन्न करने वाला कोई भी शस्त्र गौओं के पास न आए।
‘दूरं नयतु’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘दूरं नयतु’ का अर्थ है उसे दूर ले जाए, हटाए या शांत कर दे।
‘गोभ्यः’ शब्द का यहाँ क्या महत्व है?
उत्तर: ‘गोभ्यः’ का अर्थ गौओं से है। यहाँ गौओं की सुरक्षा और निर्भयता के लिए विशेष प्रार्थना की गई है।
गौओं की रक्षा को इतना महत्व क्यों दिया गया है?
उत्तर: गौएं पोषण, समृद्धि और धर्म का आधार मानी जाती हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा समाज के कल्याण से जुड़ी है।
इस मंत्र का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस मंत्र का मुख्य संदेश यह है कि दिव्य शक्ति हमारी गौओं को हर प्रकार के भय और संकट से सुरक्षित रखे, ताकि वे सदा संरक्षित और निर्भय रहें।
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