विश्व का उपादान और उसे बनाने वाला

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विश्व का उपादान और उसे बनाने वाला

श्रीमद् भागवत के सबसे प्रथम श्लोक जन्माद्यस्य यतोन्वयात इतरतश्च। इस श्लोक का प्रथम शब्द जन्माद्यस्य इसके अर्थ के बारे में हमने विस्तार से देखा। अब इसके आगे ये तो अन्वयात इतरतच्च। यहां पर दो शब्द हैं अन्वयात इतरतच्च। किसी वस्तु को बनाने के लिए उपादान भी चाहिए, बनाने वाला भी चाहिए। ये दोनों ही चाहिए। जैसे घट के लिए उपादान है मिट्टी और बनाने वाला कुम्हार। जगत के विषय में, कोई कहता है ब्रह्म उपादान है, प्रकृति बनाने वाली है। कोई कहता है प्रकृति उपादान है और ब्रह्म बनाने वाला है। इस बात पर स्पष्टीकरण दे रहा है भागवत यहां। इस शब्द से हेतु अन्वयादितरतश्च। जगत का उपादान भी भगवान है। जगत को बनाने वाला भी भगवान ही है। भगवान ही ब्रह्म ही विश्व को बनाते हैं, उसे चलाते हैं और उसका संहार भी करते हैं। तो प्रलय के समय यह विश्व जिस भी उपादान से बना हुआ है, उसका क्या होता है? क्या उसका विनाश होता है? नहीं। उसका तिरोभाव ही होगा। जैसे समुद्र से लहर उठती है और वापस समुद्र में ही गिर जाती है। पर लहर जिस पानी से बनी हुई थी, वो तब भी वही है ना समुद्र में ही। इसी प्रकार जगत का भी। लहरों में समानता है। एक लहर हाथी के जैसी और दूसरी लहर पेड़ के जैसी नहीं होती। उनमें समानता है। ऐसी समान रूप वाली लहरों को बनाते रहने के लिए कोई एक विशेष ज्ञान चाहिए। यह अंधाधुंध तरीके से नहीं हो सकता। यह उथल-पुथल में नहीं हो सकता। इसके लिए विशेष ज्ञान और व्यवस्था जरूरी है। यह कहां से मिलेंगे? यह भी समुद्र के अंदर ही है। उपादान भी और ज्ञान भी। दृष्टांत के रूप में बता रहा हूं। जगत का उपादान और उसकी रचना के लिए ज्ञान दोनों ही भगवान के अंदर ही है। दोनों ही भगवान ही है। और बनने के बाद जगत को चलाता कौन है? वो भी भगवान। बाहर से नहीं, हर प्राणी और हर वस्तु के अंदर रहकर अंतर्यामी के रूप में, अंदर से यम नियंत्रण करने वाले के रूप में। यह है स्वराज शब्द का अर्थ। अर्थेष अभिज्ञस्वराट। जगत में देखिए दो प्रकार के सृजन हैं। पहाड़, समुद्र आदियों का सृष्टिकर्ता हमें दिखाई नहीं देता है। मेज, कुर्सी आदियों को जो बनाता है, वो हमें दिखाई देता है। इन दोनों प्रकार के सृजन भगवान ही करते हैं। दूसरे प्रकार के सृजन में उस बनाने वाले के माध्यम से, पहले में स्वयं ही। अन्वयात इतरतः इन दो शब्दों को लेकर व्यास जी इसके ओर ही इंगित करते हैं। अगला शब्द अर्थेष्वभिज्ञः अर्थों के जानकार। क्या है अर्थ? लक्ष्य। यह जगत क्यों बनाया गया? इसके एक या कई उद्देश्य हैं, लक्ष्य हैं। एक घटनाक्रम दिखाई देता है, कई घटनाक्रम दिखाई देते हैं। कार्यकला मनमाना नहीं है, सुव्यवस्थित है। किस प्रकार के हैं ये लक्ष्य? उदाहरण के लिए। मेरे जन्म का परम लक्ष्य है मोक्ष द्वारा परिपूर्ण स्वतंत्रता को पाना। इसके लिए मेरे उपलक्ष्यों के रूप में साधन हैं धर्म का आचरण, संसाधनों का सही विनियोग और इच्छाओं का संचालन। धर्म, अर्थ और काम। इन तीनों साधनों को उपलक्ष्यों को करते-करते ही मुझे परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। इस प्रकार हर बो लक्ष्य जगत में एक साथ निष्पादित किए जाते रहते हैं। भगवान इन सबके जानकार हैं, इन लक्ष्यों को उन्होंने ही बनाया। अर्थेषु अभिज्ञः। यहां पर एक विशेष बात है, सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया गया है, अर्थेषु अभिज्ञः। अर्थानाम अभिज्ञः इस प्रकार षष्ठी विभक्ति नहीं। अर्थों में जानकार, अर्थों का जानकार नहीं। ऐसे क्यों? क्योंकि ये दिखाने के लिए कि इन सब कार्यों को करते हुए भी, कराते हुए भी भगवान को इन विषयों में कोई आसक्ति नहीं है। यही भगवान और मानव में भेद है। एक अच्छा व्यवस्थापक, प्रबंधक, उसको वो जो भी करता है उसके ऊपर आसक्ति रहेगी। एक जुनून रहेगा, तभी वो अच्छे से अपने कर्तव्य को निभा पाएगा। लेकिन भगवान में ऐसी कोई आसक्ति नहीं है। बिना आसक्ति के कैसे अच्छा कार्य हो सकता है? जैसे गन्ने का रस निकालने वाला मशीन, अच्छे से रस निकलता है उसमें से। पर वो मशीन उस रस का आनंद नहीं लेता है। निष्काम रूप से काम करता है वो मशीन। भगवान के लिए समुचित दृष्टांत नहीं है ये, फिर भी अनासक्ति को समझने के लिए बता रहा हूं। अनासक्त होकर भी काम हो सकता है इसे दिखाने के लिए। यहां तक प्रपंच के जितने रूप हैं, प्राणियों के स्वरूप में, वस्तुओं के स्वरूप में इनके बारे में बात हुई। आगे नामों के बारे में देखेंगे। सारे नामों के आधार हैं वेद। तेने ब्रह्म हृदय या आदि कवये मुह्यन्तीयत् सुरेह। श्लोक के इस पद के द्वारा। हरिः ओम।

 

  • अन्वयात् और इतरतः शब्दों के माध्यम से व्यास जी ईश्वर के किस स्वरूप को स्पष्ट करना चाहते हैं?
    व्यास जी इन शब्दों द्वारा यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भगवान ही इस जगत के उपादान कारण भी हैं और निमित्त कारण भी। अर्थात, जिस प्रकार मिट्टी से घड़ा बनता है तो मिट्टी उपादान है और कुम्हार निमित्त, परंतु जगत के निर्माण में भगवान स्वयं ही वह सामग्री हैं जिससे संसार बना है और वे स्वयं ही इसे बनाने वाले चेतना भी हैं।
  • प्रलय के समय इस दृश्य जगत का क्या होता है? क्या वह पूर्णतः नष्ट हो जाता है?
    नहीं, जगत का विनाश नहीं होता बल्कि उसका तिरोभाव होता है। जिस प्रकार समुद्र से उठने वाली लहर वापस समुद्र में ही समा जाती है, उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता बल्कि वह अपने मूल कारण में विलीन हो जाती है। जगत अपने उपादान स्वरूप भगवान में ही लौट जाता है।
  • लहरों के दृष्टांत से जगत की व्यवस्था के विषय में क्या रहस्य प्रकट होता है?
    लहरों का निर्माण और उनका स्वरूप एक निश्चित व्यवस्था के अंतर्गत होता है। यह अंधाधुंध प्रक्रिया नहीं है। इसी प्रकार जगत की रचना के लिए जिस विशेष ज्ञान और व्यवस्था की आवश्यकता होती है, वह भी समुद्र रूपी ईश्वर के भीतर ही निहित है। ज्ञान और सामग्री दोनों का स्रोत परमात्मा ही है।
  • भगवान जगत का संचालन किस प्रकार करते हैं? क्या वे इसे बाहर से नियंत्रित करते हैं?
    भगवान जगत का संचालन बाहर से नहीं बल्कि प्रत्येक प्राणी और वस्तु के भीतर अंतर्यामी के रूप में रहकर करते हैं। वे सबके भीतर विराजमान होकर नियंत्रण करने वाले हैं, जिसे स्वराट शब्द से संबोधित किया गया है।
  • जगत में सृजन के जो दो प्रकार बताए गए हैं, उनमें ईश्वर की भूमिका क्या है?
    प्रथम प्रकार के सृजन में, जैसे पर्वत और समुद्र, भगवान स्वयं प्रत्यक्ष कर्ता हैं। दूसरे प्रकार के सृजन में, जैसे मनुष्य द्वारा बनाई गई मेज या कुर्सी, भगवान उस व्यक्ति के माध्यम से ही कार्य करते हैं। दोनों ही स्थितियों में मूल शक्ति भगवान की ही होती है।
  • अर्थेषु अभिज्ञः पद में अर्थ शब्द का क्या तात्पर्य है और इसके लक्ष्य क्या हैं?
    यहाँ अर्थ का अर्थ है लक्ष्य। ईश्वर इस जगत के निर्माण के समस्त उद्देश्यों को जानते हैं। मुख्य लक्ष्य मोक्ष के माध्यम से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना है, जबकि धर्म, अर्थ और काम इसके सहायक उपलक्ष्य या साधन हैं।
  • श्लोक में अर्थानाम अभिज्ञः के स्थान पर अर्थेषु अभिज्ञः (सप्तमी विभक्ति) का प्रयोग क्यों किया गया है?
    सप्तमी विभक्ति का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि भगवान इन समस्त लक्ष्यों और कार्यों के ज्ञाता और कर्ता होते हुए भी उनमें लिप्त नहीं हैं। वे विषयों के भीतर रहते हुए भी उनसे अनासक्त हैं, जबकि मनुष्य अपने कार्यों में आसक्त हो जाता है।
  • ईश्वर की अनासक्ति को समझने के लिए गन्ने की मशीन का उदाहरण किस प्रकार सहायक है?
    जिस प्रकार गन्ने की मशीन रस तो पूरा निकालती है परंतु स्वयं उस रस का आनंद नहीं लेती, उसी प्रकार भगवान संपूर्ण सृष्टि का संचालन पूरी निपुणता से करते हैं किंतु उसके फलों या सुख-दुख में स्वयं को नहीं बांधते। वे निष्काम भाव से कार्य करते हैं।
  • तेने ब्रह्म हृदया य आदिकवये पद का क्या अर्थ है और यह क्या रहस्य उद्घाटित करता है?
    इसका अर्थ है कि भगवान ने सृष्टि के प्रारंभ में आदि कवि ब्रह्मा जी के हृदय में वेदों का ज्ञान प्रविष्ट कराया। यह इस रहस्य को बताता है कि समस्त नामों और ज्ञान के आधार वेद हैं और इनका मूल स्रोत भी भगवान ही हैं।
  • मुह्यन्ति यत् सूरयः के द्वारा व्यास जी क्या संकेत दे रहे हैं?
    इस पद के द्वारा व्यास जी यह बताते हैं कि भगवान का स्वरूप इतना रहस्यमयी और महान है कि बड़े-बड़े विद्वान और देवता भी उसे समझने में भ्रमित हो जाते हैं। उनकी माया और सत्य का स्वरूप तर्क से परे है, जिसे केवल भक्ति और भगवद कृपा से ही समझा जा सकता है।
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