
रामचरितमानस में तुलसीदास जी सज्जन और दुर्जनों का वर्णन कर रहे हैं।
गुण अवगुण जानत सबकोई, जो जही भाव नीकत ही सोई।
भलो भलायी पई लहाई, लहाई नीच इही नीच।
सुधा सराहिये अमरता, गरल सराहिये मीच॥
गुण कौन से होते हैं और अवगुण कौन से होते हैं, यह सब लोग जानते हैं। पर उन्हें अपनाना व्यक्ति की अपनी रुचि पर निर्भर है। जिन लोगों को जो अच्छा लगता है, उसी को वे अपनाते हैं। तुलसीदास जी बार-बार दुर्जनों को अवगुणों के साथ जोड़कर बताते हैं।
इस पंक्ति से तुलसीदास जी यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह न समझा जाए कि दुर्जन अपने अवगुणों को नहीं जानते। वे जानते हैं कि उनमें अवगुण हैं, पर प्रारब्धवश उनकी चित्तवृत्ति उसी में लग जाती है। वे यह नहीं सोचते कि इन अवगुणों से भविष्य में क्या परिणाम होंगे, इनमें दोष क्या है। वे विचार किए बिना उन्हें अपना लेते हैं।
सच यह है कि बहुत लोग ऐसे होते हैं। उनके सामने एक पात्र में दूध और एक पात्र में मद्य रखिए, उन्हें बताइए कि दूध शरीर को पुष्ट करता है और मद्य उसे कष्ट देता है। फिर भी वे मद्य ही उठाकर पी लेंगे — यही उनकी प्रकृति है।
भले लोग भलाई के लिए जाने जाते हैं, बुरे लोग बुराई के लिए। इसी कारण दोनों को उनकी-अपनी प्रशंसा भी मिलती है। अमृत अमरत्व देने के कारण सराहा जाता है, तो विष मृत्यु देने के कारण भी सराहा जाता है। यही स्थिति सज्जन और दुर्जन की है — दोनों अपने-अपने कर्म से प्रसिद्ध हैं।
दुर्जन जो फैलाते हैं, वह विष है; वे इसे जानकर ही फैलाते हैं। ऐसा करना उनकी स्वाभाविक वृत्ति है, और उसी में उन्हें आनंद मिलता है। सज्जन और दुर्जन — दोनों को मेरा नमस्कार।
दुष्ट जनों के पाप और अवगुणों की कथाएं तथा साधु जनों के गुणों की कथाएं — दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं। अपार का अर्थ है अत्यंत विस्तृत, जिसे पार करना कठिन हो; अथाह का अर्थ है गहरा, जिसे मापा न जा सके। इस समुद्र का एक अंश ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में गुण-दोष के रूप में वर्णित किया है।
हमें इन गुणों को पहचानकर उनका सहारा लेना चाहिए और अवगुणों को पहचानकर उनका त्याग करना चाहिए। सामान्यतः सभी गुण-अवगुण जानते हैं, पर गुणों के संग रहने और अवगुणों से दूर रहने के लिए तुलसीदास जी ने उनकी तुलना सुधा और विष से की है।
अब प्रश्न उठता है कि देवी और आसुरी संपत्ति — दोनों भगवान ने ही बनाई हैं, तो फिर त्याग और ग्रहण का विचार क्यों? तुलसीदास जी स्पष्ट करते हैं कि भगवान ने अवगुण भी बनाए हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम उन्हें अपना लें। अवगुणों की सृष्टि का उद्देश्य था — गुणों की पहचान कराना।
जो लोग कहते हैं कि भगवान भोलेनाथ मद्य पीते हैं, भांग आदि का सेवन करते हैं, इसलिए वे भी करें — गोस्वामी तुलसीदास जी इस विचार का खंडन करते हैं। ऐसे लोगों के मन में भक्ति नहीं होती; वे केवल नशे के लिए भगवान का नाम लेते हैं। अरे, शिव भगवान हैं, हम मनुष्य हैं।
समुद्र-मंथन के समय, घोर विष से जगत को बचाने के लिए भगवान शिव ने विष पी लिया था। स्मरण रहे — हम विष नहीं पी सकते। इसलिए हमेशा याद रखें कि भगवान भगवान हैं और मनुष्य मनुष्य। भगवान जो करते हैं, वह सब मनुष्य को नहीं करना होता।
तुलसीदास जी इसलिए गुणों और अवगुणों का बार-बार उल्लेख करते हैं, ताकि हमारी चित्तवृत्ति गुणों की ओर प्रवृत्त हो। हर कार्य में परीक्षा करें कि यह गुण है या अवगुण, और विवेकपूर्वक गुणों को अपनाकर अवगुणों का त्याग करें।
इन गुणों और अवगुणों को पहचानने के लिए आवश्यक है विवेक। उसी के स्वरूप को आगे बताया गया है। भले और बुरे — दोनों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी ने की। सृष्टि के प्रारंभ से ही वेदों में यह स्पष्ट था कि क्या शुभ है और क्या अशुभ। इन्हीं बातों को समझाने के लिए वेद इस पृथ्वी पर प्रवर्तित हुए।
वेद, पुराण और इतिहास — ये तीनों बताते हैं कि ब्रह्मा जी ने गुण और अवगुण की रचना की तथा मनुष्य को विवेक भी प्रदान किया। इसलिए हमें उसी विवेक का उपयोग करते हुए गुणों को अपनाना और अवगुणों का त्याग करना चाहिए।
गुण और अवगुण की पहचान क्या दर्शाती है?
यह बताती है कि मनुष्य में सही और गलत को समझने की क्षमता पहले से है। इस ज्ञान का उपयोग करके ही जीवन का स्तर ऊँचा उठता है। गुण का चयन आत्मिक विकास की दिशा में कदम है।
अगर सब जानते हैं कि क्या सही है, तो फिर लोग गलत क्यों चुनते हैं?
क्योंकि हर व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति के अनुसार आकर्षित होता है। जिसकी बुद्धि मोह से ढकी है, वह सुखद लगने वाली बात को ही चुनता है, चाहे वह नुकसानदायक क्यों न हो।
क्या यह कहना उचित है कि स्वभाव ही सब कुछ तय करता है?
नहीं, क्योंकि स्वभाव जन्मजात हो सकता है, पर विवेक अर्जित किया जा सकता है। मनुष्य का विवेक ही उसे प्रकृति से ऊपर उठाकर संस्कृति की ओर ले जाता है।
सज्जन और दुर्जन में अंतर किस आधार पर है?
उनके कर्म और उद्देश्यों से। सज्जन समाज में कल्याण फैलाते हैं, जबकि दुर्जन अहित फैलाते हैं। दोनों अपने कर्मों के अनुसार सम्मान या निंदा पाते हैं।
क्या बुरे लोगों में सुधार संभव है?
हाँ, अगर उनकी चित्तवृत्ति को दिशा मिले तो। जैसे लौह को अग्नि में रखकर शुद्ध किया जा सकता है, वैसे ही बुराई से भरा मन भी सत्संग और ज्ञान से बदल सकता है।
अगर दोनों को ही प्रसिद्धि मिलती है, तो अच्छाई का महत्व क्या है?
प्रसिद्धि का मूल्य नहीं, उद्देश्य का मूल्य है। सज्जन की प्रसिद्धि प्रेरणा बनती है, जबकि दुर्जन की चेतावनी। एक जीवन को दिशा देता है, दूसरा सावधानी।
दुर्जन जानते हुए भी अवगुण क्यों अपनाते हैं?
क्योंकि उनकी चित्तवृत्ति उस दिशा में स्थिर हो चुकी होती है। जैसे लता जिस दिशा में मुड़ जाए, उसी ओर बढ़ती जाती है, वैसे ही उनका मन भी उसी मार्ग पर चलता है।
क्या ऐसी वृत्ति बदली जा सकती है?
हाँ, कठिन है पर असंभव नहीं। विवेक और सत्संग के निरंतर अभ्यास से मन को नई दिशा दी जा सकती है।
क्या यह केवल प्रारब्ध का खेल है कि कोई दुर्जन बनता है?
प्रारब्ध परिस्थिति देता है, पर निर्णय मनुष्य का होता है। वही उसे साधु या दुष्ट बनाता है। प्रारब्ध दिशा है, नियंत्रण हाथों में है।
भगवान ने अवगुण क्यों बनाए?
ताकि मनुष्य गुणों का मूल्य समझे। प्रकाश तभी पहचाना जाता है जब अंधकार हो। इसी विरोध के माध्यम से विवेक जागृत होता है।
अगर भगवान ने सब कुछ बनाया, तो फिर त्याग की बात क्यों?
क्योंकि सृष्टि में सब कुछ साधन है, उद्देश्य नहीं। मनुष्य का कर्तव्य है उनमें से चयन करना। हर वस्तु उपयोगी तभी है जब वह धर्म के अनुकूल हो।
क्या भगवान के आचरण को मानव जीवन में लागू किया जा सकता है?
नहीं, क्योंकि ईश्वर की क्रियाएँ लौकिक नियमों से परे हैं। शिव ने विष पिया जगत-रक्षा के लिए, मनुष्य ऐसा करेगा तो विनाश होगा। भक्ति का अर्थ अनुकरण नहीं, श्रद्धा है।
विवेक का स्थान क्या है?
विवेक वह दीपक है जो अंधकार में दिशा देता है। यह गुण-अवगुण, धर्म-अधर्म, हित-अनहित में भेद करना सिखाता है।
विवेक कैसे विकसित किया जा सकता है?
ज्ञान, सत्संग और आत्मचिंतन से। जैसे तलवार को घिसाई से धार मिलती है, वैसे ही बुद्धि को चिंतन से शक्ति मिलती है।
अगर सब कुछ पहले से तय है, तो विवेक का क्या उपयोग?
विवेक ही वह तत्व है जो नियति के जाल को तोड़ता है। यह मनुष्य को केवल प्रतिक्रिया नहीं, चयन करने की शक्ति देता है।
ब्रह्मा ने गुण और अवगुण दोनों क्यों बनाए?
क्योंकि सृष्टि संतुलन पर चलती है। अच्छाई-बुराई, दिन-रात, सुख-दुख — यही द्वंद्व जीवन को गतिमान रखता है।
क्या इन द्वंद्वों से मुक्ति संभव है?
हाँ, जब मनुष्य विवेक से निर्णय लेना सीखता है। द्वंद्व का अस्तित्व रहता है, पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
अगर सब कुछ ब्रह्मा की रचना है, तो दोष किसका है?
दोष निर्णय का है। सृष्टि साधन देती है, उपयोग का स्वरूप मनुष्य बनाता है। यही उसका धर्म और उत्तरदायित्व है।
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