
जो सुमिरत सिधि होइ, गननायक करिवरबदन
कर उ अनुग्रह सोइ, बुद्धिरासि सुभगुन सदन
जिनके स्मरण से सिद्धि होती है, जो गणों के स्वामी हैं, और सुन्दर हाथी के जैसे मुख वाले हैं,
वे गणेशजी बुद्धि की राशि हैं, गुणों का घर हैं — वे अनुग्रह करें, कृपा करें।
गणेशजी को दो शक्तियाँ प्राप्त हैं — सिद्धि और बुद्धि। कार्य करने के लिए 'बुद्धि' अर्थात् विचार-शक्ति और किए हुए कार्य की 'सिद्धि' अर्थात् सफलता — दोनों ही उनके अधीन हैं।
दोनों ही शब्द इस सोरठे में आए हैं — तुलसीदासजी गणेशजी से मांग रहे हैं ग्रन्थ-रचना के लिए बुद्धि, उसकी सफलता, और साथ ही साथ ग्रन्थ में शुभ गुणों की उपस्थिति।
उन्होंने 'सुमिरत' कहा है — क्योंकि सही भाव से स्मरण मात्र से ही सिद्धि हो जाती है। गणेशजी इतने दयालु हैं कि विशेष विधि की अपेक्षा नहीं करते — केवल स्मरण पर्याप्त है।
कहा गया है 'सिद्धि होइ', पर यह नहीं बताया गया कि किन बातों की सिद्धि। यदि बता देते तो वह सीमित हो जाता — एक, पाँच, या सात बातों की सिद्धि।
यहाँ तो संकेत है कि स्मरण करनेवाले की 'हर बात' की सिद्धि होती है।
इसके बाद वर्णन हुआ है — गणेशजी का नाम, रूप, लीला और धाम।
नाम — गननायक।
रूप — करिवरबदन।
लीला — 'कर उ अनुग्रह' — अनुग्रह करके विघ्नों का निवारण करना।
धाम — शुभ गुणों का निवास, अर्थात् सुभगुन सदन।
स्मरण के लिए नाम है 'गननायक' और रूप है 'करिवरबदन' — हाथी के मुख वाले।
सिर्फ 'हाथी का मुख' कहने से भ्रम हो सकता है, इसलिए साथ में 'बुद्धिरासि सुभगुन सदन' कहा है।
'गणनायक' शब्द से कार्तिकेय का भी बोध हो सकता है, क्योंकि वे भी गणों के नायक हैं, पर वे सेनापति हैं।
इसलिए यहाँ 'करिवरबदन' स्पष्ट किया गया — जिससे गणेशजी ही तात्पर्य हो।
इस सोरठे में रामचरितमानस के सभी काण्डों का भी संकेत छिपा है —
'जो सुमिरत सिधि' — बालकाण्ड — शंकर, पार्वती, मनु, शतरूपा — इन सबका स्मरण और राजा दशरथ व जनक की कामनाओं की सिद्धि।
'होइ गननायक' — अयोध्या काण्ड — दशरथ और अयोध्यावासी चाहते थे कि श्रीराम गननायक, यानी राजा बनें।
'करि वर' — अरण्यकाण्ड — श्रीरामजी की श्रेष्ठ प्रतिज्ञाएँ, जैसे राक्षसों का नाश।
'वर वदन' — उन्होंने अपने श्रेष्ठ वदन से राक्षसों को मोहित किया — संकेत।
'कर उ अनुग्रह सोइ' — किष्किन्धा काण्ड — प्रभु का पूर्व परिचय, जैसे —
'प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥'
'पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।'
'बुद्धिरासि' — सुन्दरकाण्ड — जाम्बवान, सुग्रीव, हनुमान — इनकी चतुराई।
'सुभगुन' — लंका काण्ड — राक्षसों को भी सद्गति मिली, राम के शुभ गुणों की लीला।
'सदन' — उत्तरकाण्ड — श्रीरामजी का अवध में पुनः आगमन, अपने सदन में प्रवेश।
यह एक ही सोरठा है — पर उसमें नाम, रूप, लीला, धाम, कृपा, बुद्धि, सिद्धि, और समस्त काण्डों का संकेत छिपा है — और यही तुलसीदासजी की काव्य-कला और भक्तिभाव की विलक्षण विशेषता है।
'सुमिरत सिद्धि होइ' का वास्तविक अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि भगवान गणेश का स्मरण ही कार्यों की सफलता के लिए पर्याप्त है। बिना जटिल कर्मकाण्डों के भी उनका स्मरण हर बाधा को दूर करता है।
क्या केवल स्मरण से ही कार्य सिद्ध हो सकता है?
हाँ, जब स्मरण श्रद्धा और विश्वास से किया जाए तो उसका मानसिक और आत्मिक बल इतना गहरा होता है कि वह विघ्नों को दूर कर देता है।
क्या यह विचार अतार्किक नहीं लगता?
नहीं, क्योंकि यह अनुभव आधारित सत्य है — स्मरण चित्त को स्थिर करता है, भय हटाता है और व्यक्ति को निर्णायक बनाता है। इससे कार्य के प्रति एकाग्रता आती है और सफलता की संभावना बढ़ती है।
'गणनायक करिवरबदन' से किसका संकेत मिलता है?
यह गणेशजी का स्वरूप वर्णन करता है — वे गणों के अधिपति हैं और उनका मुख हाथी के समान है, जो बुद्धिमत्ता और बल का प्रतीक है।
क्या केवल 'गणनायक' शब्द से गणेशजी स्पष्ट होते हैं?
नहीं, क्योंकि कार्तिकेय भी गणनायक माने जाते हैं — इसलिए 'करिवरबदन' शब्द जोड़ा गया, जिससे स्पष्ट हो जाए कि यह स्तुति गणेशजी की है।
क्या इस प्रकार के विशेषण आवश्यक होते हैं?
हाँ, विशेषण स्पष्टता लाते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि अर्थ में कोई भ्रम न रहे और भाव किस देवता की ओर जा रहा है, यह सुनिश्चित हो।
'बुद्धिरासि सुभगुण सदन' में क्या संदेश है?
यह बताता है कि गणेशजी केवल विघ्नहर्ता नहीं, अपितु विवेक, सद्गुण और शुद्धता के आधार भी हैं।
क्या इससे केवल एक देवीय छवि बनती है या व्यावहारिक भी है?
यह व्यावहारिक भी है — क्योंकि व्यक्ति यदि बुद्धिमान, गुणी और विवेकशील हो, तो जीवन के अधिकांश विघ्न पहले ही समाप्त हो जाते हैं।
क्या ये गुण केवल पूजा से आते हैं?
नहीं, ये गुण स्मरण, अनुकरण और साधना से आते हैं — और गणेशजी का स्मरण इन गुणों को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है।
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