मेवाड़ की वीरांगना रानी कर्मदेवी

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मेवाड़ की वीरांगना रानी कर्मदेवी

झांसी रानि ल्क्श्मी बाई की वीरता और निर्भयता प्रसिद्ध है।

और भी कई वीरांगनाओं ने भारत वर्ष मे जन्म लिया है।
कर्म देवी।

तेरहवीं सदी के मेवाड के राजा थे समर सिंह।
उनका देहांत होने पर उनकी रानी कर्म देवी राज काज संभालने लगी।
राजकुमार नाबालिग था।
राककुमार की संरक्षिका के रूप मे, उस स्मय कुतुब-उद-दीन ऐबक ने भारी सेना के साथ मेवाड पर आक्रमन किया।

बहुत बडी और ताकत्वर सेना थी शत्रु की।

राजपूत चिंता मे पड गये।
उनके सरदार ने रानी से पूछा, 'मेव्वाड की रक्षा कैसे होगी, राजमाते?'।

रानी ने कहा, 'यह सव्बाल भी आपके मन मे कैसे आया?
मातृभूमि की रक्षा करने हर एक राजपुत सर्वदा सुसज्ज और प्र्तिज्ञा बद्ध रहता है।
मातृभूमि के लिए अपने जीवन को तृणवत मानकर मर मिटने हर राजपूत हमेशा तैयार रहता है।
क्या हमारे रगों मे व्ह राजपूती खून नही रहा?'।

'ऐसी बात नही है राजमते।
हम सब तैयार हैं, पर हमारा नेतृत्व कौन करेगा?
राजा तो नही रहे।'।

'चिंता मत करो।
मैं हूं उन की वीर पत्नी।
चंडी बन कर संहार करूंगी शत्रु सेना की।
तैयार हो जाओ युद्ध के लिए।'।

क्षण्भर मे राज्पूत सेना तैयार हो गयी रानी कर्म देवी के नेतृत्व मे, रानी द्वारा दिया हुआ दृढ विश्वास के साथ।

रणभूमि मे रानी शत्रुओं के ऊपर एक सिंहिनी जैसे टूट पडी।
शत्रुओं के खून की नदियां बहने लगि।
श्त्रु सेना अपने प्राण को लेकर भागी।

इस प्रकार वीरांगना कर्म देवी ने अपना और मेवाड के राजपूतों का नाम रोशन किया।

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