दण्ड का आध्यात्मिक निरूपण

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दण्ड का आध्यात्मिक निरूपण

क्या अहिंसा हमारे देश के लिए एक राजशासन नीति हो सकती है?

इस मे कई बातें हैं। व्यक्तिगत तौर पर अहिंसा का आचरण किया जाए तो इससे आध्यात्मिक प्रगती होगी। यह सनातन धर्म का एक मौलिक सिद्धांत है, इसमें कोई संदेह नही है।

अहिंसा मे दोनों ही बातें हैं: दूसरों को हानि न पहुंचाना और खुद के ऊपर किसी ने अत्याचार किया तो उसे चुपचाप सहन कर लेना। अध्यात्म मे जहां सुख और क्लेश को एक जैसे मानकर उनका समन्वय करने का उपदेश है, वहां अहिंसा काम आती है।

लेकिन अहिंसा के नाम पर अगर हम फौज को हटा दें तो देश का वही हाल होगा जो तिब्बत के साथ हुआ था। अहिंसा के नाम पर अगर नीति व्यवस्था, पुलिस, न्यायालयों और कारागारों को बन्द कर दिया जाए तो समाज का क्या होगा? शासन के द्वारा ही समाज ढंग से चलता है।

शासक दण्ड स्वरूपी है। स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः। शासक दण्ड द्वारा ही समाज को चला पाएगा।

दण्ड देना शासक का धर्म है। राज धरम है। दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।

दण्ड ही प्रजा की रक्षा करता है। यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः। शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः। अगर शासक ने आलस्य रहित होकर अपराधियों को दण्ड नही दिया तो बलवान दुष्ट बुद्धि लोग दुरबलों को मछलियों की तरह शूल पर चढा देंगे, वैसे ही साधु जन के साथ करेंगे।

समाज को चलाने और देश की सुरक्षा के लिए दण्ड रूपी हिंसा जरूरी है। आक्रमण चाहे अन्दर से हो या बाहर से। बाहर से अपने साम्राज्य के विस्तार का लालच रखने वाला शासक दण्ड से ही सीखेगा। दण्ड के डर से ही दूर रहेगा। लाथों के भूत बातों से नही मानते।

आध्यात्मिक स्तर पर इस तथ्य का निरूपण यह है कि जगत मे दोनों ही हैं: देव भाव और असुर भाव। देव भाव सत्य और अहिंसा पर आधारित है। असुर भाव असत्य और हिंसा पर आधारित है।

असुर भाव कायिक बल पर आधारित है। वेद स्वयं कहता है: बलं स्त्यादोजीयः। बल सत्य से ताकतवर है। हिंसा का अहिंसा पर विजय हो सक्ता है, इसलिए बल का सामना बल से ही हो सकता है।

यह बल लौकिक भी हो सकता है, दैवी भी हो सकता है। हमारे पहले के शासक दोनों का ही प्रयोग करते थे। अहिंसा एक भाव है, पर हिंसा सक्रिय है। सक्रिय हिंसा का सामना केवल मानसिक भाव से नही हो पाएगा। हिंसा का सामना हिंसा से ही होता है।

पर ध्यान में रखिए कि यह राज धर्म है, शासकों का धर्म है। व्यक्ति के लिए नही है। व्यक्ति सर्वदा अहिंसा के मार्ग को ही अपनाए। अपने ऊपर हिंसा का आचरण होने पर शासन के माध्यम से ही उसका सामना करे।

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