
विश्व में जितने लोक हैं, उन सब में से
धर्ती ही कर्मस्थान है।
बाकी सारे भोगस्थान हैं।
बलि चक्रवर्ती को देखिए।
असुर होने से पाताल उनका स्वलोक था।
उनको पाना था स्वर्ग।
पर इसके लिए यज्ञ कहां किया?
यहां नर्मदा के तट पर।
क्योंकि धर्ती पर किया हुआ कर्म ही फल देता है।
यहां किया हुआ अच्छा कर्म उत्तम लोकों में पहुंचाता है जिसे स्वर्ग कहते हैं।
यहां किया हुआ बुरा कर्म नरक जैसे पीड़ाप्रद लोकों में पहुंचाता है।
तो स्वर्ग में जो देवता लोग हैं, उन्होंने अगर कुछ कर्म किया तो क्या होगा?
कुछ नहीं, न पुण्य मिलेगा न पाप।
स्वर्ग के देवता पाप तो करेंगे नहीं।
लेकिन कर्म द्वारा उन्हें पुण्य भी नहीं मिलता।
उनका पुण्य क्षीण होता जाता है।
जैसे-जैसे सुख-भोगों का अनुभव करते जाएंगे, उनका पुण्य क्षीण होता जाएगा।
अगर पुण्य कमाना है तो उन्हें क्या करना होगा?
धर्ती पर आना पड़ेगा, मानव का शरीर लेकर।
मानव के रूप में जन्म लेकर, फिर उस शरीर में रहते हुए अच्छा कर्म करके।
मान लीजिए कोई विदेश में नौकरी करता है, कमाता है।
पर उसको वहां कोई आनंद नहीं है क्योंकि अकेला है।
आनंद उसको परिवार के साथ ही है।
तो,
१० महीने कमाकर स्वदेश में आकर परिवार के साथ दो महीने आनंद से रहता है।
फिर जाता है, कमाकर आता है।
स्वदेश में कोई कमाई नहीं है।
लगभग इसी प्रकार है —
स्वदेश = स्वर्ग, और
विदेश = धर्ती।
लेकिन जब दो महीने के लिए स्वदेश जाता है तो पहले दिन से ही countdown शुरू हो जाता है —
५९ दिन बचे,
५८ दिन बचे।
स्वर्ग का आनंद भी इसी प्रकार है।
स्वर्ग में वास क्षयोन्मुख है।
धर्ती पर जो पेड़-पौधे हैं, पशु-पक्षी हैं,
वे सब प्रगति की ओर जा रहे हैं,
क्योंकि उनका अशुभ कर्म क्षय होता जाता है।
आपने देखा होगा,
जब किसी ऋषि को शाप देना होता है तो कहते हैं —
कुत्ता बन जाओ,
मछली बन जाओ,
पेड़ बन जाओ।
क्योंकि इन योनियों में पीड़ा ही पीड़ा है।
पुष्पित वृक्ष को देखकर हमें लगता है कि कितना सुंदर।
पर उस वृक्ष का अंदरूनी अनुभव क्या है, हम नहीं जानते —
सुख है कि पीड़ा है?
कोई आया, फूल तोड़कर ले गया,
फल तोड़कर ले गया —
अच्छा लगेगा?
दर्द नहीं लगेगा?
पीड़ा नहीं होगी?
जानवरों को बांधकर रखते हो,
दूध निकालते हो,
ऊन निकालते हो।
जंगली जानवर भी डर में जीते हैं।
शेर जैसे को भी कितना प्रयास करना पड़ता है हर बार खाने के लिए।
इसकी तुलना में देखो —
'माँ, भूख लगी है',
खाना टेबल पर।
ये सारी योनियां पीड़ा अनुभव करने के लिए हैं।
पीड़ा अनुभव करके-करके अशुभ कर्म क्षय हो जाने पर उनकी प्रगति होती है।
भोग ही करते हैं, वे भी कर्म नहीं कर सकते।
केवल मानव ही अच्छा कर्म करके प्रगति या बुरा कर्म करके अवनति को पा सकता है।
मानव से श्रेष्ठ और कोई है ही नहीं।
विराट पुरुष को देखिए — मानव का स्वरूप है।
देवता लोगों को मोक्ष पाना हो, तब भी धर्ती पर मानव के रूप में जन्म लेकर प्रयास करना पड़ेगा।
पर मानव — यह निर्णय उसे स्वयं लेना है कि —
क्या मैं अच्छा कर्म करके प्रगति करूं,
या बुरा कर्म करके पीड़ाओं का अनुभव करूं।
मनुष्य को ही कर्म करने का अधिकार क्यों है?
क्योंकि केवल मनुष्य में विचार, विवेक और निर्णय की स्वतंत्रता होती है। पशु-पक्षियों में यह क्षमता नहीं होती। यही कारण है कि धरती पर ही पुण्य या पाप का अर्जन संभव है।
क्या इसलिए स्वर्ग जाने की बजाय धरती पर कर्म करना बेहतर है?
हाँ, क्योंकि धरती पर कर्म करके ही जीव ऊँची अवस्थाओं तक पहुँच सकता है। स्वर्ग सिर्फ भोग का स्थान है, वहाँ से वापसी तय है।
अगर स्वर्ग में सुख है, तो फिर लोग वहां क्यों नहीं कर्म कर सकते?
क्योंकि स्वर्ग एक फल की तरह है, न कि साधना की भूमि। वहाँ चेतना का स्तर भोग में लीन होता है, कर्म की प्रेरणा नहीं रहती।
देवता भी पुण्य क्यों नहीं कमा सकते?
क्योंकि वे केवल अपने पिछले पुण्य का उपभोग कर रहे होते हैं, कर्म करने की स्वतंत्रता वहाँ नहीं होती।
क्या देवता फिर से धरती पर जन्म लेते हैं?
हाँ, जब उनका पुण्य क्षीण हो जाता है, तो वे पुनः जन्म लेकर नया कर्म करते हैं।
स्वर्ग में रहने वाले क्या सदा के लिए सुखी रहते हैं?
नहीं, उनका सुख भी समय के साथ खत्म हो जाता है, फिर उन्हें नीचे आना पड़ता है।
पशु-पक्षी जैसी योनियाँ क्यों पीड़ादायक मानी जाती हैं?
क्योंकि उनमें चेतना सीमित होती है और जीव केवल भोग करता है, कर्म नहीं कर सकता।
क्या पेड़-पौधों को भी पीड़ा होती है?
हाँ, वे चेतन होते हैं, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति सीमित होती है। उनका जीवन अधिकतर दूसरों के लिए उपयोग में आता है, पर वे खुद कष्ट झेलते हैं।
अगर पेड़-पौधे इतने सुंदर लगते हैं, तो उन्हें दुखी कैसे कह सकते हैं?
बाहरी सुंदरता अनुभव का प्रमाण नहीं होती। फूल तोड़ना, फल चुराना, सब उनके लिए क्षोभ पैदा करता है — पर वे बोल नहीं सकते।
मनुष्य सबसे श्रेष्ठ योनि क्यों मानी गई है?
क्योंकि इसमें कर्म करने की पूरी स्वतंत्रता और विवेक होता है।
क्या सभी योनियों से मुक्ति पाने का द्वार मानव शरीर ही है?
हाँ, चाहे देवता हो या अन्य जीव, सभी को मानव जन्म लेकर ही मोक्ष का प्रयास करना पड़ता है।
अगर इंसान इतना श्रेष्ठ है, तो वह दुखी क्यों रहता है?
क्योंकि वह अपने विवेक का उपयोग नहीं करता। श्रेष्ठता अवसर है, गारंटी नहीं — इसे उपयोग में लाना पड़ता है।
स्वर्ग में आनंद का अनुभव कैसा होता है?
वह सीमित अवधि का होता है, जैसे छुट्टी पर गए प्रवासी के दिन गिनती के होते हैं।
क्या देवता स्वर्ग में रहते हुए भी बेचैन होते हैं?
हाँ, जैसे-जैसे उनका पुण्य खत्म होता है, वे जानते हैं कि वापसी तय है।
क्या स्वर्ग जाने का मतलब हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाना है?
नहीं, वह तो एक ब्रेक जैसा है — असली मुक्ति केवल आत्मज्ञान से मिलती है, और वह कर्मभूमि यानी धरती पर ही संभव है।
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