जीवन को सुन्दर कैसे बनायें?

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जीवन को सुन्दर कैसे बनायें?

आइए हमारी जीवनचर्या कैसी होनी चाहिए इसके बारे में वेद के कुछ वचनों को देखते हैं।

जातो जायते सुदिनत्वे अह्नां समर्य आ विदथे वर्धमानः।
पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देवया विप्र उदियर्ति वाचम् ॥५॥
ऋग्वेद तीसरा मण्डल आठवां सूक्त पांचवां मंत्र

हमने जन्म क्यों लिया है?
जीवन को सुन्दर बनाने के लिए।
पीड़ा सहन करने के लिए नहीं जन्म लिया है।
जीवन को सुन्दर बनाना है।

ध्यान में रखिए जीवन सुन्दर बनाना और विषय सुखों का आनन्द लेना, दोनों एक बात नहीं है।
हम कैसी जगह को सुन्दर कहते हैं?
एक साफ-सुधरा बगीचा हमें सुन्दर दिखता है।
एक सुव्यवस्थित बगीचा हमें सुन्दर दिखता है।
एक साफ-सुधरा घर, सुव्यवस्थित घर हमें सुन्दर दिखता है।
जहां कूड़ा-कचरा पड़ा हो वह जगह सुन्दर नहीं दिखता है।

तो, सुन्दरता के पीछे दो कारण हैं - पवित्रता और व्यवस्था।
जीवन को पवित्र बनाते जाओ। जीवन को सुव्यवस्थित करते जाओ।
यह अपने आप में नहीं होगा।
वेद कहता है जीवन एक संग्राम है।
प्रयास करने से ही जीवन में व्यवस्था और पवित्रता आती है।
इसके लिए सबसे पहले धीरज की आवश्यकता है।
आग्रह और अटलता की आवश्यकता है।
धीरज के साथ अपनी बुद्धि को ऐसे कार्यों में ही लगाओ कि जीवन पवित्र बने रहे।
जीवन सुव्यवस्थित बने रहे।
इसी से जीवन सुन्दर बनता है।

सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते।
तयोर्यत्सत्यं यतरदृजीयस्तदित्सोमोऽवति हन्त्यासत्॥
ऋग्वेद मण्डल ८, सूक्त १०४, ऋचा १२

जो विज्ञान के सहारे जीवन बिताना चाहता है, उसके सामने हर परिस्थिति में दो बातें खड़ी हो जाती हैं।
एक सच और एक झूठ।
एक सत्य का मार्ग और एक असत्य का मार्ग।
ये दोनों मार्ग सामने खड़े होकर आपस में स्पर्धा करते हैं कि - मुझे अपनाओ, मुझे अपनाओ।

इसमें सत्य का मार्ग सरल रहेगा। इसे चुनोगे तो आगे जीवन भी सरल बनेगा। आगे जीवन में शान्ति रहेगी।
झूठ का मार्ग शायद तत्कालीन समस्या को सुलझा देगा, पर आगे उससे भी दस गुना समस्याओं को लेकर आएगा।
सर्वदा सरल सत्य के मार्ग को ही अपनाओ।

यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति।
यदीं शृणोत्यलकं शृणोति नहि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम्॥
ऋग्वेद १०.७१.६

संस्कृत में सखा शब्द का अर्थ है सौहार्दयुक्तः। जिसका हृदय पवित्र हो।
ऐसे लोगों को ही मित्र के रूप में चुनो।
उनकी सलाहों के ऊपर ध्यान दो।
अच्छा दिलवाला दोस्त कभी गलत रास्ते पर नहीं ले जाएगा।
क्योंकि अच्छा दिल का विकास ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है।
जिसके पास ज्ञान है उसी का हृदय पवित्र रहता है।
ऐसे मित्रों का कभी त्याग मत करो।
ऐसे मित्रों के बिना जीवन में कभी प्रगति नहीं होती।
ऐसे मित्रों को छोड़कर जो मूर्खों के वचनों को सुनेगा उसका जीवन मूल्यहीन हो जाएगा।

स इद्भोजो यो गृहवे ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय।
अरमस्मै भवति यामहूता उतापरीषु कृणुते सखायम्॥
ऋग्वेद १०.११७.३

जो भूखे को खिलाता है, उसके पास सर्वदा पर्याप्त अन्न रहेगा।
जरूरत पड़ने पर उसकी सहायता के लिए बहुत सारे लोग आकर खड़े हो जाएंगे।
जिनको वह शायद जानता तक न हो।
अन्नदान में यह महिमा है। अन्नदान में यह शक्ति है।

अन्नदान में एक और विशेष बात है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ गरीबों को खिलाओ।
जो भी भूखा है, अमीर हो या गरीब, अनजान हो या दोस्त, अगर भूखा है तो वह अन्न देने लायक है।

 

क्या जीवन का लक्ष्य दुख सहना है या उसे सुन्दर बनाना?
जीवन का उद्देश्य उसे सुन्दर और सार्थक बनाना है। यह लक्ष्य केवल विषय सुखों से अलग है। जैसे गंदगी से भरी जगह कभी सुन्दर नहीं दिख सकती, वैसे ही अव्यवस्थित और अपवित्र जीवन कभी सुखद नहीं होता। जन्म का कारण दुख भोगना नहीं, बल्कि उच्चता और पवित्रता की ओर बढ़ना है।

सुन्दर जीवन का अर्थ क्या है?
जब जीवन में पवित्रता और व्यवस्था का मेल हो तो वह स्वाभाविक रूप से सुन्दर हो जाता है। जैसे साफ और सुव्यवस्थित बगीचा या घर मन को आकर्षित करता है, वैसे ही शुद्ध और संतुलित जीवन मन को संतोष देता है। यह केवल बाहरी सजावट नहीं बल्कि भीतर की शुद्धता से जुड़ा है।

अगर जीवन अपने आप सुन्दर नहीं होता तो क्यों कहा गया है कि हर व्यक्ति इसे बना सकता है?
क्योंकि प्रयास, धैर्य और अटलता से जीवन को सुन्दर बनाया जा सकता है। कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती, और निरंतर प्रयास से गंदगी भी साफ की जा सकती है। जैसे किसान खेत को बार-बार जोतकर उपजाऊ बनाता है, वैसे ही मनुष्य अपने जीवन को पवित्र और व्यवस्थित बना सकता है।

सत्य और असत्य के मार्ग कैसे सामने आते हैं?
हर परिस्थिति में मनुष्य के सामने दो विकल्प खड़े होते हैं — सत्य और असत्य। ये दोनों आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। सत्य का मार्ग सीधा और दीर्घकालीन लाभ वाला है, जबकि असत्य का मार्ग तात्कालिक समाधान देकर अंततः भारी कष्ट देता है।

अगर असत्य तत्काल समस्या हल कर देता है तो सत्य क्यों चुनना चाहिए?
क्योंकि असत्य भविष्य में दस गुना बड़ी कठिनाइयों का कारण बनता है। सत्य भले ही प्रारंभ में कठिन लगे, लेकिन दीर्घकाल में वही शांति, सरलता और स्थायित्व देता है। असत्य का मार्ग केवल तात्कालिक सुविधा है, टिकाऊ समाधान नहीं।

क्या यह कहना तर्कसंगत है कि सत्य हमेशा लाभ देगा?
हाँ, क्योंकि सत्य का अर्थ वास्तविकता के साथ चलना है। वास्तविकता से लड़ाई असंभव है, इसलिए असत्य का मार्ग अंततः टूटता ही है। जैसे गलत हिसाब कभी बैलेंस नहीं बैठा सकता, वैसे ही असत्य जीवन को असंतुलित ही करेगा।

सच्चा मित्र किसे कहा गया है?
वह व्यक्ति जिसका हृदय ज्ञान और पवित्रता से भरा हो, वही सच्चा मित्र है। उसकी संगति जीवन को सही दिशा देती है और कभी गलत मार्ग पर नहीं ले जाती।

क्यों कहा गया है कि मूर्ख मित्र से दूर रहना चाहिए?
क्योंकि मूर्खता में दिए गए सुझाव जीवन का मूल्य घटा देते हैं। मूर्ख की संगति प्रगति रोक देती है और मनुष्य का समय और ऊर्जा नष्ट करती है। अच्छे मित्र जीवन को ऊँचा उठाते हैं, बुरे मित्र नीचे गिराते हैं।

क्या यह तर्कसंगत है कि केवल ज्ञानवान ही मित्र हो सकता है?
हाँ, क्योंकि ज्ञान ही वह आधार है जिससे हृदय पवित्र बनता है। बिना ज्ञान के पवित्रता टिकती नहीं। ज्ञानवान मित्र की सोच और कार्य दोनों लाभकारी होते हैं, जबकि अज्ञान से भरा व्यक्ति खुद गिरेगा और दूसरों को भी गिराएगा।

अन्नदान को सबसे बड़ा दान क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह सीधे जीवन से जुड़ा है। भूखे को अन्न देने से वह जीवित रहता है और यह देने वाले को भी संतोष और पुण्य देता है। इसके परिणामस्वरूप देने वाले को कभी कमी नहीं होती।

क्या अन्नदान केवल गरीबों के लिए है?
नहीं, यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो भूखा है। चाहे वह अमीर हो या गरीब, परिचित हो या अजनबी, भूख मिटाना सबसे बड़ा धर्म है। भूख किसी का भेदभाव नहीं करती, इसलिए अन्नदान भी निष्पक्ष होना चाहिए।

क्या अन्नदान से सचमुच मददगार लोग स्वतः मिल जाते हैं?
हाँ, क्योंकि समाज में सद्भावना का आदान-प्रदान होता है। जो व्यक्ति भूखों को खिलाता है, उसके चारों ओर विश्वास और सहयोग का जाल बन जाता है। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक अनुभव से सिद्ध बात है।

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