मन का मत सुनो । बुद्धि का सुनो । कहती है गीता ।

धृतराष्ट्र का अपने पुत्रों के प्रति ममता ही युद्ध का कारण बना।

इस ममता के कारण ही उनके मन में पाण्डवों के प्रति द्वेष भी पैदा हुआ। अगर वे सोचते कि पाण्डव भी मेरे ही हैं, मेरे ही पुत्र समान हैं, अपने भाई के पुत्र ही तो हैं। अगर वे ऐसे सोचते तो कभी यह अशान्ति नहीं होती, युद्ध नहीं होता।

न्याय से देखोगे तो दोनों का समान अधिकार है राज्य के ऊपर। जहां-जहां यह भाव कि 'ये मेरे, ये पराये' — इस भाव को कहते हैं प्रतिद्वन्द्वी भाव। जहां यह प्रतिद्वन्द्वी भाव उत्पन्न होता है — न केवल ज़मीन के विषय में, हर विषय में — शिक्षा, कला, हर विषय में, वहां-वहां आज नहीं तो कल द्वन्द्व, यानी युद्ध, होगा ही।

किसी भी युद्ध को शुरू करानेवाला भाव ही यही है। चाहे वो राज्यों के बीच हो या घर के अंदर हो।

मेरा–उसका, उसको दिया मुझे नहीं दिया, उसको ज़्यादा दिया मुझे कम दिया, मेरे लड़के–भाई के लड़के, मेरे घरवाले–उनके घरवाले — जहां ये शब्द सुनाई देंगे, समझ लेना कि थोड़े ही समय में महाभारत युद्ध शुरू होनेवाला है।

गीता का सन्देश क्या है?

राग और द्वेष को छोड़ दो। जो काम तुम्हारे टेबल पर आये, उसे कर्त्तव्य समझकर करो। यह कर्म तुम्हारा अधिकार सिद्ध कर्म ही होगा, जब तक तुम उसे ढूंढकर उसके पीछे नहीं जाओगे।

धृतराष्ट्र का धर्म था क्षत्रिय धर्म का पालन। लेकिन वे निष्पक्ष नहीं रहे। उसके बीच में अपने पुत्रों के प्रति राग और भाई के पुत्रों के प्रति द्वेष को लेकर आये।

गीता शुरू से अंत तक यही कहती है — इस ममता के भाव को त्याग करो। ममता एक मनोविकार है, यह बुद्धि में नहीं है। बुद्धि से काम करो, मन का वशीभूत होकर मत चलो। यही गीता का सन्देश है।

हर सन्दर्भ में बुद्धि का प्रयोग करो — क्या यह धर्म है कि अधर्म है? मन का मत सुनो, बुद्धि का सुनो।

देखो, सीधी-सी बात है — युद्ध का प्रारंभ कैसे हुआ? ममता के कारण। कौन हारा? जो ममता को लेकर चल रहे थे — कौरव। कौन जीता? जो बुद्धि से धर्म के अनुसार चल रहे थे — पाण्डव।

मन के अनुसार चलना अधर्म है। विवेक में प्रतिष्ठित बुद्धि के अनुसार चलना ही धर्म।

आपके पास फेसबुक पर एक मेसेज आता है। एक घटना का उदाहरण लेकर कहता हूं — लॉकडाउन के समय मुंबई के पास दो संत लोग मारे गये, बहुत दुख की बात है।

उस इलाके में सोशल मीडिया पर प्रसार हो रहा था कि बच्चों को उठानेवाले चोर निकले हैं। ये महात्मा लोग उस इलाके से जा रहे थे, गुजरात में किसी के अंतिम संस्कार में भाग लेने। उनके ऊपर शक हुआ, उन लोगों को मार दिया।

यह है मन का काम। जो बिना सोचे-समझे ऐसी खबर को फैलाते हैं, वे सब इस हत्या के लिए जिम्मेदार हैं। न केवल वे खूनी जिन्होंने सामने से उनको मारा — उन सब को, एक-एक को, इसका फल भुगतना पड़ेगा।

फॉरवर्ड करते समय, शेयर करते समय क्या हम समझते हैं?

एक आदमी शहर से गांव गया, उसने एक सौ लोगों में कोरोना फैला दिया। गांव लौटने वाले सारे शक पर आ गए। कोई गांव नहीं जा पा रहा है, कोई रास्ते में भूखा पड़ा है। आपको क्या अधिकार है यह करने का?

वह तो सरकार जाने, आप क्यों बीच में आ रहे हो? यह है मन का काम, बुद्धि का नहीं।

मैं ये भी नहीं कह रहा हूं कि बिना सोचे-समझे आप ये जो गलत खबर, लापरवाह खबर फैलाये जा रहे हो — इसके कारण अगर एक दिन भी एक आदमी को भी भूखा रहना पड़ा, तो क्या आपको नहीं लगता है, आपको उसका फल भुगताना पड़ेगा?

मन से काम मत करो। मन राग पैदा करेगा, द्वेष पैदा करेगा, डर पैदा करेगा। इसलिए मन से काम मत करो। बुद्धि से काम करो — यही गीता का सन्देश।

मन और बुद्धि में फर्क क्या है?

मन सब में है। बुद्धि विकसित होती है। बुद्धि का विकास करना पड़ता है अच्छे उपदेशों को सुनकर, पढ़कर — जो गीता जैसे धार्मिक ग्रंथ बताते हैं।

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