संसार में आपको क्या दिखाई देता है? सुख या दुख?
कोई सुखी है तो कोई दुखी। कोई हँसता है, उसी समय कोई रोता भी है। कोई किसी की हँसी पर रोता है, तो कोई किसी के रोने पर हँसता है। अपने आप को भी देखो, कभी सुखी तो कभी दुखी, कभी हँसते हो तो कहीं रोते हो। किसी ने जन्म लिया तो कोई मरा। कोई स्वस्थ है तो कोई रुग्ण।
न केवल अवस्थाएं, एक से दूसरे की ओर परिवर्तन भी होता ही रहता है। परिवार में बच्चा पैदा हुआ, सब खुश। किसी का देहांत हुआ तो सारे दुखी। आजकल बात और थोड़ा संकीर्ण हो गयी है। बच्चा होने से दुखी होने वाले परिवार भी हैं आजकल, खास करके बेटी हुई तो; पहले ऐसा नहीं था। किसी के गुजर जाने पर खुश होने वाले परिवार भी हैं आजकल—मुसीबत टली, बहुत परेशान कर रखा था।
वस्तुतः दो विरुद्ध अवस्थाएं सर्वत्र यही दिखाई देती हैं—एक ही जगह पर दोनों। कुरुक्षेत्र में भी यही बात थी। अगर इसे धर्म-क्षेत्र बोला जाए तो सुख देता है, क्योंकि धर्म का उद्देश्य ही आत्यन्तिक सुख को पाना है। दुखी होने के लिए धर्म का आचरण कोई नहीं करता।
अगर आप सोचते हो कि आप धर्म का पालन कर रहे और पालन करते-करते आपको दुख का अनुभव हो रहा है, तो आपने धर्म के बारे में गलत समझ रखा है। धर्म जो है, आचरण करते समय और भविष्य में भी सुख को ही देता है। हर कार्य ऐसा नहीं है।
कोई-कोई कार्य, जैसे कोई सिगरेट पीता है—पीते समय सुखदायक है, पर बाद में कैंसर रूपी दुख को देखा। भूखा रहकर बैंक में पैसा जमा किया—बुढ़ापे में सुख को देगा, शायद; पर अब तो भूख का दुख ही है न। धर्म ऐसा नहीं है—करते वक्त भी अच्छा लगेगा, बाद में भी अच्छा लगेगा।
अगर इसे कुरुक्षेत्र बोला जाए, दुख देता है। कैसे? कुरु कुरु, करो करो—यह जो काम से युक्त, क्रोध से युक्त, लोभ से युक्त, मोह से युक्त, मद से युक्त, मत्सर-बुद्धि से युक्त प्रेरणा जो काम कराती रहती है—करो, करो; कुरु, कुरु—यह आत्यन्तिक दुख को ही देने वाली है। धर्म-क्षेत्र आत्मा के साथ है, शाश्वत सुख के साथ है। कुरुक्षेत्र धन, जमीन, मान-सम्मान रूपी तात्कालिक सुख के साथ है, जो क्षण भर में नष्ट हो जाता है।
‘क्षेत्र’ शब्द उत्पन्न होता है ‘क्ष’ और ‘त्र’ से। ‘क्ष’ का अर्थ है क्षय, ‘त्र’ का अर्थ है त्राण, यानी रक्षा। यहाँ अगर धर्म का आचरण करेंगे, तो सुख का क्षय नहीं—दुख का क्षय और सुख की रक्षा परिणाम रहेगा। यहाँ कामादि प्रेरणावश कर्म करेंगे, तो सुख का क्षय और दुख का त्राण परिणाम होगा।
जगह एक ही है, पात्र एक ही है—उसमें शहद भरना है या जहर भरना है, यह आपके ऊपर है। जो धर्म को सुबह ६ से ७ तक किए जाने वाला कार्य समझेगा, और नौकरी इत्यादि बाकी समय किए जाने वाले कार्यों को ‘कर्म’ समझेगा—उसके लिए यह दुख की भूमि है। इन दोनों का समन्वय जो कर पाता है, वही सुखी है।
नौकरी तो मालिक को धनी बनाने के लिए कर रहा हूँ; उतना समय, ९ से ५, मेरा समय नहीं है—उनको दिया हुआ है। वेतन लेकर उसके बदले में मालिक को मैंने वह समय बेच दिया। बाकी समय ही मेरा अपना समय है—जो ऐसे सोचता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। नौकरी करते समय और कारोबार चलाते समय धर्म का आचरण जरूरी नहीं—अपने समय में ही ये सब करना चाहिए—जो ऐसे समझता है, उसका जीवन दुखमय रहेगा।
ज्ञान की प्राप्ति ग्रन्थों से या प्रवचनों से होती है, कर्म से नहीं—जो ऐसे समझता है, वह जीवन में दुखी होता है। इसलिए ही यहाँ शुरुआत में ही धर्म-क्षेत्र को कर्म-क्षेत्र के विशेषण के रूप में और कर्म-क्षेत्र को धर्म-क्षेत्र के विशेषण रूप में बताया है। इससे पता चलता है कि गीता का संदेश क्या है।
इस जीवन में एक मिनट भी व्यर्थ करने जैसा नहीं है—किसी और का नहीं है। हर पल से लाभ उठाओ। कर्म से ज्ञान को पाओ। ज्ञान के अनुसरण में कर्म करो। बुद्धिपूर्वक जीओ—यही है गीता का संदेश।
पाण्डव समझते थे—धर्म ही सब कुछ है। कौरव समझते थे—बल, धन, जमीन—ये ही सब कुछ है। हमें दोनों ही चाहिए। कर्म को त्याग नहीं सकते—नहीं तो विश्व भुखमरी में चला जाएगा। साथ ही साथ आत्मा को भी उसके लक्ष्य तक ले जाना है। यह हमें दिखाना कैसे किया जाए—यही गीता का उद्देश्य है।
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