ऋषिगणों ने सूतजी से प्रार्थना की कि कृपया यह बताइए कि राजा शन्तनु का सत्यवती से विवाह कैसे हुआ।
राजा शन्तनु को शिकार का बहुत शौक था। भीष्म के उनके पास लौट आने के चार वर्ष बीत चुके थे। एक बार वे यमुना के तट के जंगल में शिकार कर रहे थे। वहां के मन्द समीर में उन्हें अचानक एक अनोखी सुगन्ध का अनुभव हुआ। राजा उस सुगन्ध के स्रोत को खोजने लगे। वह सुगन्ध एक अत्यंत सुंदर तरुणी के शरीर से निकल रही थी।
राजा विस्मित हो गए। उन्होंने उस तरुणी से पूछा कि वह कौन है, उसके माता-पिता कौन हैं, वह वहां क्यों बैठी है, और वह कुआंरी है या विवाहित। उस तरुणी ने कहा कि वह एक निषाद कन्या है और यमुना में नाव चलाती है। राजा उसके सौन्दर्य से अत्यंत आकर्षित हो गए।
राजा ने कहा कि वह स्वयं राजा शन्तनु हैं और उसे अपनी धर्मपत्नी बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि गंगा के चले जाने के बाद उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया है और उससे विवाह करके वह महारानी बन सकती है। सत्यवती ने उत्तर दिया कि वह स्वयं निर्णय नहीं ले सकती और राजा को उसके पिता से उसका हाथ मांगना होगा। यदि उसके पिता मान जाएंगे, तो वह सदा राजा के अधीन रहेगी।
राजा को अपने घर आए देखकर निषाद अत्यंत विस्मित हुआ। निषाद ने कहा कि वह राजा की आज्ञा का पालन करेगा। राजा ने कहा कि वह उसकी पुत्री का हाथ मांगने आए हैं और उसे अपनी धर्मपत्नी बनाना चाहते हैं। निषाद ने सहमति व्यक्त की, लेकिन एक शर्त रखी। उसने कहा कि राजा के बाद उसकी पुत्री का पुत्र ही राजा बनेगा।
यह सुनकर राजा शन्तनु चिंता में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि भीष्म के रहते हुए यह कैसे संभव है। भीष्म ज्येष्ठ पुत्र हैं और उन्हें राजा न बनाना अधर्म होगा। राजा दुखी होकर राजधानी लौट आए।
राजा को व्याकुल देखकर भीष्म ने उनसे पूछा कि वे इतने चिंतित क्यों हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई पुत्र अपने पिता के दुख को दूर नहीं कर सकता, तो उसके जन्म का क्या अर्थ है। उन्होंने उदाहरण दिए कि किस प्रकार पुत्रों ने अपने पिता की आज्ञा के लिए कठिन त्याग किए हैं। उन्होंने कहा कि उनके रहते राजा को किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
राजा शन्तनु ने कहा कि उनकी चिंता यह है कि भीष्म उनके एकमात्र पुत्र हैं। यदि युद्ध में उन्हें कुछ हो गया, तो वंश कैसे आगे बढ़ेगा। यही उनकी चिंता है। भीष्म को यह सुनकर भी स्पष्ट नहीं हुआ। उन्होंने मंत्रियों से पूछा। मंत्रियों ने उन्हें पूरा वृत्तांत बताया, शिकार पर जाना, सत्यवती से मिलना, निषाद से विवाह की बात और निषाद की शर्त।
भीष्म ने कहा कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। उन्होंने कहा कि भविष्य में सत्यवती का पुत्र ही राजा बनेगा और उनका इसमें कोई स्वार्थ नहीं है। उन्होंने कहा कि वे स्वयं निषाद के पास जाकर अपने पिता के लिए उसकी पुत्री का हाथ मांगेंगे और यह वचन देंगे कि सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा।
भीष्म निषाद के पास गए और कहा कि उसकी पुत्री उनकी माता समान होगी और उसका पुत्र ही भविष्य में राजा बनेगा। निषाद ने यह बात स्वीकार की, लेकिन एक और शंका प्रकट की। उसने कहा कि यदि भविष्य में भीष्म का विवाह हुआ और उनका पुत्र हुआ, और उसने राज्य छीनने का प्रयास किया तो क्या होगा।
तब भीष्म ने शपथ ली और कहा कि वह जीवन भर विवाह नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि यह उनका सत्य वचन और अटल शपथ है। इसी शपथ के कारण भीष्म विश्व प्रसिद्ध हुए।
इसके बाद राजा शन्तनु ने सत्यवती से विवाह किया और भीष्म वंश के रक्षक बनकर आजीवन अविवाहित रहे। अंत में कहा गया कि जो प्रतिदिन श्रीमद्देवी भागवत की कथा सुनता है, वह पराशक्ति महामाया की कृपा का पात्र बनता है।
राजा शन्तनु और सत्यवती के विवाह में मुख्य बाधा क्या थी?
मुख्य बाधा उत्तराधिकार की थी। सत्यवती के पिता चाहते थे कि उनकी पुत्री का पुत्र ही राजा बने। यह शर्त पहले से स्थापित उत्तराधिकारी के विरुद्ध थी। इसी कारण राजा शन्तनु मानसिक द्वंद्व में पड़ गए।
यह शर्त स्वाभाविक क्यों मानी जा सकती है?
क्योंकि एक पिता अपनी पुत्री और उसके पुत्र का भविष्य सुरक्षित देखना चाहता है। सत्ता के अनुभव से वह जानता था कि बाद में विवाद हो सकते हैं। इसलिए उसने पहले ही स्पष्ट शर्त रखी। यह व्यावहारिक सोच को दर्शाता है।
क्या इस शर्त को अन्यायपूर्ण कहा जा सकता है?
नहीं, क्योंकि यह किसी के अधिकार छीनने के लिए नहीं थी। यह भविष्य की अनिश्चितता से बचने का प्रयास था। अन्याय तब होता जब छल या बल प्रयोग होता। यहां खुली शर्त रखी गई थी।
भीष्म ने पिता के कष्ट को अपना कर्तव्य क्यों माना?
क्योंकि उनके लिए पिता का मानसिक सुख सर्वोपरि था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अधिकारों को पीछे रखा। यह निर्णय स्वेच्छा से लिया गया था, किसी दबाव में नहीं। यही इसे विशेष बनाता है।
भीष्म का निर्णय सुनकर जिज्ञासा क्यों पैदा होती है?
क्योंकि सामान्यतः ऐसा त्याग असंभव लगता है। लोग सोचते हैं कि कोई अपने पूरे जीवन का त्याग कैसे कर सकता है। यही जिज्ञासा इस प्रसंग को स्मरणीय बनाती है।
क्या यह निर्णय व्यवहारिक रूप से कठोर नहीं था?
यह कठोर अवश्य था, पर उद्देश्य स्पष्ट था। उन्होंने भविष्य के संघर्ष को रोकने के लिए यह मार्ग चुना। दीर्घकालिक शांति के लिए व्यक्तिगत त्याग किया गया।
भीष्म की शपथ को इतना महत्व क्यों मिला?
क्योंकि यह केवल कथन नहीं था, जीवन भर निभाया गया व्रत था। शब्द और कर्म में कोई अंतर नहीं था। यही कारण है कि यह शपथ इतिहास में प्रसिद्ध हुई।
इस शपथ से समाज को क्या संदेश मिलता है?
यह संदेश मिलता है कि वचन तभी मूल्यवान है जब उसे निभाया जाए। त्याग बिना दिखावे के होना चाहिए। यही नैतिक बल समाज को स्थिर रखता है।
क्या आज के समय में ऐसा त्याग संभव है?
संभव है, लेकिन दुर्लभ है। आज प्राथमिकताएं अधिक व्यक्तिगत हो गई हैं। फिर भी यह प्रसंग आदर्श के रूप में मार्ग दिखाता है।
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