कर्ण के जन्म की कहानी

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कर्ण के जन्म की कहानी

जैसा पहले बताया गया है, शन्तनु और सत्यवती दंपति के दो पुत्र हुए, चित्रांगद और विचित्रवीर्य। सत्यवती की आज्ञा का पालन करते हुए व्यासजी पुत्रोत्पत्ति के लिए अंबिका के पास पहुंचे। व्यासजी का स्वरूप देखकर अंबिका घबरा गईं और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं। तपस्वी होने के कारण जटा और तप का तेज उनके चेहरे पर स्पष्ट था। इसके कारण जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह धृतराष्ट्र था, जो जन्म से ही अंधा था।

व्यासजी को देखकर अंबालिका भय से पीली पड़ गईं। इसलिए उनका जो पुत्र हुआ, वह पाण्डु रोग से ग्रस्त था। पाण्डु रोग का अर्थ है सफेद दाग की बीमारी। अंबालिका की दासी का व्यासजी के साथ संसर्ग साधारण रूप से हुआ। उसका परिणाम विदुर के रूप में हुआ, जो मेधावी, शुद्धात्मा और अत्यंत पवित्र थे।

अंधा होने के कारण धृतराष्ट्र राजा नहीं बन सके। रोगी होने पर भी पाण्डु को ही राजा बनाया गया, क्योंकि दोनों में वही स्वीकार्य थे। विदुर को प्रधान मंत्री बनाया गया। धृतराष्ट्र की दो पत्नियां थीं, गांधारी और एक वैश्य की पुत्री। पाण्डु की भी दो पत्नियां थीं, कुन्ती और माद्री। गांधारी ने सौ कौरवों को जन्म दिया। धृतराष्ट्र की दूसरी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम युयुत्सु था।

कुन्ती का पाण्डु से विवाह होने से पहले ही सूर्यदेव से एक पुत्र हुआ था, जिसका नाम कर्ण था। यह सुनकर ऋषि-मुनि यह जानने के लिए उत्सुक हुए कि विवाह से पहले कुन्ती को संतान कैसे हुई और फिर भी उसका कौमार्य कैसे बना रहा।

कुन्ती शूरसेन की पुत्री थीं। शूरसेन के चचेरे भाई कुन्तीभोज ने बाल्यावस्था में ही कुन्ती को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया था। कुन्ती अग्निहोत्र आदि कार्यों में कुन्तीभोज की सहायता करती थीं। एक बार ऋषि दुर्वासा चातुर्मास्य व्रत के लिए कुन्तीभोज के यहां आए। कुन्ती ने उनकी अत्यंत सेवा की।

सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने कुन्ती को एक विशेष मंत्र का उपदेश दिया। उस मंत्र के जप से किसी भी देवता को प्रकट किया जा सकता था और वह देवता कुन्ती की इच्छा भी पूर्ण करता था। ऋषि के चले जाने के बाद कुन्ती उस मंत्र की शक्ति की परीक्षा करने बैठीं।

कुन्ती ने सोचा कि किस देवता को बुलाया जाए। पूर्व दिशा में उन्हें सूर्यदेव दिखाई दिए और उन्होंने मंत्र द्वारा सूर्यदेव का आह्वान किया। सूर्यदेव कुन्ती के सामने प्रकट हो गए। उन्हें सामने देखकर कुन्ती चकित रह गईं और उसी समय उनका मासिक धर्म आरंभ हो गया।

कुन्ती ने कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि उनके आह्वान से सूर्यदेव पधारे, और उन्होंने उनसे सूर्य मंडल लौट जाने की प्रार्थना की। सूर्यदेव ने कहा कि वे ऐसे लौट नहीं सकते। एक सुंदर कन्या के आह्वान पर आए हैं, और बिना संसर्ग के लौटने पर अन्य देवता उनका उपहास करेंगे। इसलिए वे संसर्ग के बाद ही लौटेंगे।

कुन्ती ने कहा कि वह कुलीन कन्या हैं। सूर्यदेव ने कहा कि उनका कौमार्य नष्ट नहीं होगा और इस संसर्ग से उन्हें उनके समान एक दीप्तिमान पुत्र की प्राप्ति होगी। इसके बाद कुन्ती गर्भवती हुईं और गुप्त रूप से रहने लगीं। एक दासी के अतिरिक्त किसी को इस गर्भ का ज्ञान नहीं था।

कुन्ती ने कर्ण को जन्म दिया। कर्ण जन्म से ही सुंदर कवच और कुंडलों के साथ उत्पन्न हुए। लेकिन कुन्ती कर्ण को अपने पास नहीं रख सकीं। वह यह नहीं बता सकती थीं कि यह बालक कहां से आया। इसलिए उन्होंने कर्ण को लकड़ी की एक पेटी में रखकर दासी के माध्यम से नदी में बहा दिया।

रोते हुए कुन्ती ने कहा कि वह कितनी अभागिन हैं और कैसी मां हैं कि अपने पुत्र का पालन नहीं कर पा रहीं। उन्होंने कहा कि अब जगदम्बिका ही उसकी रक्षा करेंगी। भविष्य में वह उसे देख पाएंगी या नहीं, यह उन्हें नहीं पता। उन्होंने अपने पूर्व कर्मों को इसका कारण बताया और कहा कि इस पाप की स्मृति में वह जीवन भर जलती रहेंगी। यह कहकर कुन्ती ने कर्ण को दासी के हाथ सौंपा और पिता के घर लौट गईं।

  • व्यासजी के संसर्ग से उत्पन्न पुत्रों में भिन्नता क्यों दिखाई गई है?
    यह भिन्नता मानसिक अवस्था के प्रभाव को दर्शाती है। अंबिका, अंबालिका और दासी की प्रतिक्रिया अलग-अलग थी। उसी के अनुसार संतानों का स्वरूप भिन्न हुआ। इससे यह स्पष्ट किया गया है कि संतान केवल शारीरिक नहीं, मानसिक स्थिति से भी प्रभावित होती है।

  • क्या यह केवल प्रतीकात्मक बात मानी जा सकती है?
    नहीं, इसे कारण और परिणाम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कथा स्पष्ट रूप से मानसिक भय और सहजता का परिणाम दिखाती है। यह मनोवैज्ञानिक क्रम को दर्शाती है।

  • क्या यह विचार अतार्किक लगता है?
    नहीं, क्योंकि आज भी मानसिक तनाव के प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। यहां उसी सिद्धांत को कथा के माध्यम से दिखाया गया है।

  • कर्ण का जन्म विवाह से पहले कैसे संभव हुआ?
    यह मंत्र के प्रयोग से हुआ बताया गया है। कुन्ती को विशेष मंत्र का ज्ञान प्राप्त था। उसी मंत्र के कारण सूर्यदेव प्रकट हुए। इससे घटना का क्रम स्पष्ट होता है।

  • कुन्ती ने मंत्र की परीक्षा क्यों की?
    क्योंकि वह उसकी शक्ति को जानना चाहती थीं। यह जिज्ञासा स्वाभाविक थी। पर परिणाम उनकी अपेक्षा से भिन्न निकला।

  • क्या यह निर्णय अपरिपक्व नहीं था?
    हां, यह अनुभवहीनता का परिणाम था। शक्ति मिलने पर विवेक की आवश्यकता होती है। यही संदेश इस प्रसंग में निहित है।

  • कर्ण को त्यागने का निर्णय क्यों लिया गया?
    क्योंकि सामाजिक परिस्थिति में सत्य प्रकट करना संभव नहीं था। कुन्ती के लिए यह मानसिक संघर्ष का क्षण था। उन्होंने विवश होकर यह निर्णय लिया। यह त्याग नहीं, विवशता थी।

  • कुन्ती का विलाप क्या दर्शाता है?
    यह मातृत्व और परिस्थिति के टकराव को दिखाता है। वह भीतर से टूट चुकी थीं। यह भावनात्मक सत्य को उजागर करता है।

  • क्या इसे कठोर निर्णय कहा जा सकता है?
    हां, लेकिन यह परिस्थितिजन्य था। इसमें स्वार्थ नहीं, पीड़ा थी। यही इसे मानवीय बनाता है।

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देवी भागवत

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