
भीमसेन ने कहा कि इन दुष्टों की सद्गति के लिए राजकोष का धन व्यर्थ नहीं किया जा सकता। इस अंधे के मन को शांति मिले, इसके लिए देश का धन क्यों दिया जाए। इसी अंधे की वजह से यह सब हुआ है। जिन लोगों ने द्रौपदी का सभा में अपमान किया, उन्हें सद्गति क्यों मिले। इसके लिए हम क्यों प्रयास करें।
धृतराष्ट्र के प्रति युधिष्ठिर का यह मृदु और करुणापूर्ण व्यवहार भीमसेन से सहन नहीं हो पा रहा था। यह उसे पच नहीं रहा था। भीमसेन ने युधिष्ठिर से कहा कि आप जो सोच रहे हैं और कर रहे हैं, वह मूर्खता है। आपकी इसी मूर्खता के कारण हमें वनवास झेलना पड़ा। द्रौपदी को अपमान सहना पड़ा। मत्स्य देश में मुझे राजा विराट का सेवक बनकर रहना पड़ा।
भीमसेन ने कहा कि यदि आप जुआ न खेलते तो यह सब नहीं होता। मैंने जरासंध का वध किया, फिर भी विराट के यहां रसोइया बनना पड़ा। अर्जुन को स्त्री वेश धारण करना पड़ा। बृहन्नला बनकर बच्चों को नृत्य सिखाना पड़ा। जिन हाथों ने गांडीव उठाया, उन्हीं हाथों में आपकी मूर्खता के कारण चूड़ियां पहननी पड़ीं।
इन सब घटनाओं को याद करके भीमसेन ने कहा कि उसका मन करता है कि अभी इस अंधे का सिर काट दे। नहीं तो आप इसी तरह इनके लिए मूर्खताएं करते रहेंगे और भविष्य में हम सबको और कष्ट उठाने पड़ेंगे। जब गंधर्वों ने दुर्योधन आदि को बंदी बना लिया था, तब उन्हें छुड़ाने कौन गया था। आप ही गए थे। फिर इन दुष्टों का भला क्यों करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वह एक फूटी कौड़ी भी उन्हें नहीं देंगे।
इसके बावजूद युधिष्ठिर ने अर्जुन, नकुल और सहदेव से धन लेकर धृतराष्ट्र को दिया। धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों का विधिवत क्रियाकर्म कराया। इसके बाद वे वन की ओर चले गए। यह सब देखकर भीमसेन का मन भी धीरे-धीरे पिघलने लगा। उन्हें विदा करने गंगातट तक पहुंचते-पहुंचते भीम भी रोने लगे। माता कुन्ती भी उनके साथ चली गईं।
धृतराष्ट्र शतयु आश्रम पहुंचे और वहां तपस्या करने लगे। छह वर्ष बीत गए। एक बार युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा कि उन्होंने सपना देखा है कि वन में रहने वाली माता कुन्ती बहुत दुर्बल हो गई हैं। उन्होंने कहा कि एक बार सब मिलकर उनसे मिलने चलें।
पांडव, सुभद्रा, उत्तरा, द्रौपदी और हस्तिनापुर के अनेक निवासी शतयु आश्रम पहुंचे। आश्रम में विदुर दिखाई नहीं दिए। युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र से पूछा कि विदुर कहां हैं। धृतराष्ट्र ने कहा कि विदुर के मन में वैराग्य आ गया है और वे एकांत में रहकर परमात्मा का ध्यान कर रहे हैं।
भीमसेन कौरवों के श्राद्ध का विरोध क्यों कर रहे थे?
भीमसेन के मन में अपमान और पीड़ा की स्मृतियां अभी जीवित थीं। उन्हें लगता था कि जिन लोगों ने अन्याय किया, उन्हें शांति का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। उनके लिए यह न्याय का प्रश्न था, करुणा का नहीं। इसलिए राजकोष के उपयोग का विरोध किया।
यह विरोध स्वाभाविक क्यों लगता है?
क्योंकि गहरे आघात के बाद क्षमा तुरंत संभव नहीं होती। युद्ध और अपमान की स्मृतियां तर्क से अधिक भावनाओं को प्रभावित करती हैं। भीम उसी मनःस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।
क्या भीम का दृष्टिकोण पूरी तरह गलत था?
नहीं, वह भावनात्मक रूप से समझने योग्य था। लेकिन वह दीर्घकालिक शांति की दिशा नहीं दिखाता था। यही सीमा उसका पक्ष दिखाती है।
युधिष्ठिर का व्यवहार भीम से इतना भिन्न क्यों था?
क्योंकि युधिष्ठिर ने धर्म को व्यक्तिगत पीड़ा से ऊपर रखा। उन्होंने शत्रु और अपने में अंतर नहीं किया। उनका लक्ष्य प्रतिशोध नहीं, संतुलन था।
यह करुणा लोगों को असहज क्यों करती है?
क्योंकि करुणा तब कठिन होती है जब सामने अपराधी हो। ऐसे समय में कठोरता सरल लगती है। युधिष्ठिर का मार्ग इसी कारण असामान्य लगता है।
क्या युधिष्ठिर का मार्ग व्यावहारिक था?
हां, क्योंकि इससे शेष समाज में स्थिरता बनी। द्वेष को समाप्त किए बिना शासन टिक नहीं सकता। यही व्यावहारिक पक्ष था।
अंत में भीम का मन क्यों पिघलने लगा?
क्योंकि विदाई का क्षण भावनाओं को बदल देता है। जब क्रोध का स्थान करुणा लेती है, तब मन नरम पड़ता है। यही मानवीय परिवर्तन यहां दिखता है।
यह परिवर्तन क्या सिखाता है?
यह सिखाता है कि समय भावनाओं को रूपांतरित करता है। कठोर मन भी स्थायी नहीं रहता। अनुभव धीरे-धीरे दृष्टि बदल देता है।
क्या यह भीम की हार मानी जाए?
नहीं, यह परिपक्वता का संकेत है। अपने भीतर के क्रोध को पहचानना ही पहला परिवर्तन होता है।
वनगमन और तपस्या का चयन क्या दर्शाता है?
यह सत्ता से विरक्ति को दर्शाता है। शोक के बाद आत्मचिंतन की आवश्यकता होती है। यही उस मार्ग का अर्थ है।
आज के संदर्भ में यह निर्णय असामान्य क्यों लगता है?
क्योंकि आज लोग पद और सुविधा छोड़ना नहीं चाहते। उस समय त्याग को मूल्यवान माना जाता था। यही दृष्टिकोण का अंतर है।
विदुर के वैराग्य का उल्लेख क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि वह कथा को भीतर की यात्रा की ओर मोड़ता है। बाहरी घटनाओं के बाद आंतरिक साधना का आरंभ दिखता है।
यह संकेत क्या बताता है?
यह बताता है कि अंततः समाधान बाहर नहीं, भीतर खोजा जाता है। जब संबंध और सत्ता समाप्त होती है, तब साधना आरंभ होती है।
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