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शौनक महर्षि सूत जी से कहते हैं, हमें सारे शास्त्रों का सार सुनाइए। ऋषिजन उनसे ही सारे पुराण सुन चुके हैं। अब उनको पुराणों का, शास्त्रों का सार सुनना है क्योंकि कलयुग में किसी को भी यह सब पूर्ण रूप से सुनने में ना तो रुचि रहेगी, ना ही समय रहेगा। कलयुग एक भूत बनकर सबको निगलने पास आ चुका है। लोग सांसारिक दैनंदिन समस्याओं में उलझे रहेंगे। धर्म से वे विमुख हो जाएंगे। उनकी मदद के लिए कुछ तो चाहिए। इस बीच भी अगर शास्त्रों का सार मिल जाए तो उसे सुनकर उनका उद्धार हो सकता है। शौनक जी ने यह भी बताया, उनको लगता है कि श्री कृष्ण और उनकी लीलाएं। यही शास्त्रों का सार है। श्री कृष्ण हैं, परब्रह्म, परमात्मा। उनकी महिमा को सुनने से कलिदौड़ से बच निकल सकते हैं और वही मोक्ष का भी मार्ग है। यह सुनकर सूत जी प्रसन्न हो गए। कथा सुनने के लिए उनकी उत्सुकता देखकर सूत जी प्रसन्न हो गए। अच्छे श्रोताओं के सामने ही वक्ता का हृदय पिघल कर श्रेष्ठ बातें सामने आती हैं। अच्छे श्रोता वक्ता के अंदर से ज्ञान निकाल सकते हैं। नहीं तो कथा सुनाना बुद्धि रहित और नीरस बन जाता है। वक्ता के लिए कुछ समय बाद, कुछ दोहराओं के बाद सूत जी प्रसन्न हुए कि उन्हें अच्छे श्रोता मिले। लेकिन एक बात ने सूत जी को विस्मित कर दिया। ऋषि जन ज्ञानी हैं, मेधावी हैं। उनको भूत, भविष्य, वर्तमान सब पता रहता है। इतने पुराण लगभग 1000 साल तक क्योंकि यह घटना नैमिषारण्य में ऋषि मुनियों के 1000 साल वाले यज्ञ की समाप्ति के पास की है। तभी तो वे सार मांग रहे हैं। फिर भी इतना सब कुछ सुनने के बाद, ये मुझसे क्यों सार पूछ रहे हैं? सूत जी का नाम है उग्र श्रवा। नैमिषारण्य में कथा सुनाना उनके पिताजी लोम हर्षण ने प्रारंभ किया था। वे बलराम जी के हाथों मारे गए। उसके बाद बलराम जी ने स्वयं लोमहर्षण जी के सारा ज्ञान, सारे गुण उनके पुत्र उग्रश्रवा के शरीर में स्थापित कर दिया था। तब से उग्र श्रवाजी कथा सुनाते आ रहे हैं। अब तक ऋषि जन कहते थे हमें शिव जी के बारे में सुनाइए, हमें देवी के बारे में सुनाइए। लेकिन अब तो ये सबका सार मांग रहे हैं। वह भी सूत से। इसमें एक और बात है। सौनक जी कहते हैं कि आप तो व्यास जी के प्रिय शिष्य हैं। उन्होंने कुछ तो रहस्य आपको बताया होगा। ऐसे कुछ रहस्य होते हैं जो गुरु अपने प्रिय शिष्य को ही बताता है। सूत जी कहते हैं, आप लोगों को पता है मेरे पास जो भी ज्ञान है इसको मेरे पिताजी ने व्यास मोह से प्राप्त किया था। लेकिन अगर आप सार पूछेंगे तो यह मुझे इस माध्यम से नहीं मिला। मैंने शास्त्रों का सार जाना है सुखदेव जी से। वे ही मेरे लिए सब कुछ हैं। इस विषय में उन्होंने ही मुझे अनुग्रह किया है। मुझे पता है, ऐसा नहीं है कि आपको शास्त्रों का सार नहीं पता हो। आप मेरे मुंह से सुनना चाहते हैं। सूत मुख से सुनना चाहते हैं। आप लोग शास्त्रों के सारातिसार को प्रकाशित करना चाहते हैं लोगों की भलाई के लिए मेरे माध्यम से। एक बात आपको बताता हूं। श्री कृष्ण की लीलाओं के बारे में बताना इसमें बड़ा आनंद है। चाहे जितनी बार सुनाओ, यह आनंद कभी कम नहीं होता। वक्ता कभी तृप्त नहीं होता। बार-बार सुनाने का दिल करता है। मैं आपको वह तथ्य बताता हूं जिसको मैंने सुखदेव जी से जाना है। श्री चरणों में भक्ति इससे बढ़कर इस जगत में और कुछ भी नहीं है। भक्ति से सब कुछ पाया जा सकता है यहां और परलोक में भी। अगर किसी के पास श्री चरणों के प्रति भक्ति है तो उसकी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं। सारा दुख, क्लेश समाप्त हो जाता है। एक बार श्री हरि जिस दिल में रहने लगते हैं, उस दिल में काम के लिए कोई स्थान नहीं, क्रोध के लिए कोई स्थान नहीं, लोभ के लिए कोई स्थान नहीं, मोह के लिए कोई स्थान नहीं, मद के लिए कोई स्थान नहीं, मात्सर्य के लिए कोई स्थान नहीं। सब भाग जाते हैं उस दिल से। भगवान का तेज उनसे सहन नहीं होता। मनुष्य की इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होती। विश्व का सब कुछ उसे दे दो, उसे विश्व का सम्राट बनाओ। मनुष्य को देखकर कभी तृप्त नहीं कर सकते। यह एक आसुरी शक्ति है मनुष्य के अंदर। कभी तृप्त नहीं होने वाली भूख है यह। काम से दुख ही दुख है। जिसके ऊपर मन लग गया यह मेरे पास नहीं है ऐसा दुख। उसको अपनाने में श्रम का दुख। अपनाने के बाद उसकी सुरक्षा को लेकर चिंता, डर। और एक बार वो चला जाए तो उसका दुख। अभिलाषा ने कभी किसी को सुख दिया है क्या? तब भी अभिलाषाओं का अंत नहीं है, काम का अंत नहीं है। काम का अंत तभी होता है जब हृदय में भक्ति आ जाती है। हृदय में काम के स्थान में अगर भक्ति आ जाएगी तो सारी समस्याएं, सारी वासनाएं नष्ट हो जाएंगी। इच्छापूर्ति ना होने से क्रोध आता है। आशा भंग ही क्रोध का कारण है। अगर इच्छा ही नहीं है तो क्रोध कहां से आएगा? जब ध्यान अवधान भगवान की ओर होने लगता है, इच्छाएं समाप्त होने लगती हैं। जिसकी किसी चीज की इच्छा नहीं है तो वो क्यों संग्रह करेगा? लोभ भी समाप्त। इच्छा का मूल कारण है अज्ञान, अहंकार। कि ये मेरा है, ये मेरा नहीं है, मुझे ये चाहिए। ये सब अज्ञान है। इच्छा समाप्त होते होते ये मोह भी समाप्त हो जाएगा। स्वत्व और स्वामित्व का मोह। अगर कुछ भी मेरा नहीं है, सब प्रभु का है, तो उसे मद या घमंड किस बात पर आएगा? यह किसके साथ स्पर्धा करेगा? क्यों स्पर्धा करेगा? भक्ति ही सारी वासनाओं का समाधान है। एक ही प्रहार से भक्ति सारी वासनाओं को दूर भगा देती है। और भक्ति दिल में कैसे पैदा होगी? भगवान की लीलाओं को सुनने से, उनकी कीर्ति को सुनने से, उनकी महिमा को सुनने से। जैसे मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है मंत्रों से, उसी प्रकार भगवान शब्द तरंगों के रूप में कानों से अंदर जाकर भक्त के हृदय में। बस जाते हैं। कहते हैं सूत जी। हरि ओम।
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