
भगवान कैलाशपति शंकर कहते हैं - ब्रह्मचर्य अर्थात् वीर्य धारण यही उत्कृष्ट तप है। इससे बढकर तपश्चर्या तीनॊं लोकों में दूसरी कोई भी नहीं हो सकती। ऊर्ध्वरेता पुरुष अर्थात् अखण्ड वीर्य का धारण करनेवाला पुरुष इस लोक में मनुष्य रूप में प्रत्यक्ष देवता ही है।
शास्त्र में ब्रह्मचर्य नाश के आठ मैथुन बताये हैं।
१२-मन व इन्द्रियाँ में शान्त जो युवा में, शान्त धीर बह बीर । नष्ट हुए पर बीर्थ के, कोन वने गम्भीर ?
समा पुरात सारथी ही है जो सम्मन्स घोड़ों को अपने फायू में रखता है; नन्द उपाज नहीं होने देता। जैसे ही सच्चा वीर पुशप वही है जो कि यषावस्था में भी प्रथा इन्द्रियों को अपने अधीन रखता है। उन्हें स्वतंत्र व स्पेच्छाचारी नहीं होने देवा। शामों पर और सम्पूर्ण रामानों पर विजय प्राप्त करने बाला सचा शूर नहीं कहा जा सकता । सथा शूर यही है जो मन और इन्द्रियों का स्वामी है और मन तथा इन्द्रियों पर फेपल महापुरुष ही अधिकार चला सकते हैं और कोई मनुन्ध यदि सदुपदेशों के अनुसार मग-गम-पचन से पले तो महापुरुप हो सकता है। इसमें अब भी कठिनता नहीं है। मैला पपड़ा जैसे पुनः साफ हो सकता है। वैसे ही विषयक दुयसन से गन्दा बना हुमा मन भी पुनः साफ हो सकता है। परन्तु अटल निश्चय व पूरी दता होनी चाहिये । पविष मन माता पिता गुरु पमित्रों से भी अधिक उपकारी मन ही मवन्ध को नरक में से निकाश पर ऊँचे पच पर पहुँचाता है। मन ही मुम हुस का असली कारण है गन ही स्वर्गव गरस, अंध व मोचा का प्रदाता है-ऐसा भगवान श्रीकृष्णचन्द का पचन है । अतः मन को इस्तियार में रवालो। मन बड़ा दयापाया है। मन के वायदे की कमी न मानो। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत । यह अढत सिद्धान्त जानो । मन कोम चाँधोगे तो मन तुमको जहाँ चाहे यहाँ पटक देगा, यह निश्चय समझो। क्या आपको इसका अनुभव नहीं है ? आत्मोद्धार कैसे हो ? इस पर सन्त कहते हैं मन की कथनी से उलटी रीति पर चलो-उलटी चाल चलो। मन का गुलाम सब का गुलाम है । वह पंडित होने पर भी महामूर्ख है, बलवान होने पर भी महान दुर्बल और राजा होने पर भी पूरा दुखी, अभागा
और भिखारी है । मन का स्वामी ही सम्पूर्ण जगत् का स्वामी है, चाहे वह शरीर से भले ही दुर्बल हो। श्रीगोस्वामी जी कहते हैं :
काम क्रोध मद लोभ की, जब लग मन में खान ।
तुलसी पण्डित मूरखो, दोनों एक समान ॥ १॥ अतः हमें चाहिये कि इस ग्रन्थ में दिये हुए सरल, श्रेष्ठ व अमूल्य नियमों द्वारा अपने मन को स्वाधीन कर ब्रह्मचर्य का सच्चा पालन करें तथा अपना सच्चा उद्धार कर लें।
१३-वीर्य को उत्पत्ति रसाद्रक्तं ततो मांसम् मांसान्मेदः प्रजायते । मेदस्याऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः॥
-श्रीसुश्रुताचार्य - मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह प्रथम पेट में आकर पचने लगता है और उसका रस बनता है; उस रस का पांच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है; रक्त का भी पांच दिन तक पाचन होकर और उससे मांस चनता है। पाचन की यह क्रिया एक सेकण्ड भी वन्द नहीं रहती। एक को पचा कर होता है नाता है। वो
परेकछाधानवस्तु,
दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा ऐसा एक से एक सार पदार्थ तैयार हुआ करता है और प्रत्येक क्रिया मे फजूल चीजें मल, मूत्र, पसीना, आँख, कान, व नाक का मैल, नाखून, केशादिक के रूप मे बाहर निकल जाती है। इसी प्रकार पाँच दिन के बाद मेदा से अस्थि, अस्थि से मन्ना और मज्जा से सप्तम सार पदार्थ वीर्य बनता है। फिर उसका पाचन नहीं हो सकता। यही वीर्य फिर ओजस् रूप मे सम्पूर्ण शरीर में चमकता रहता है। स्त्री के इस सप्तम शुद्धातिशुद्ध सार पदार्थ को रज कहते हैं। दोनों मे भिन्नता होती है। वीर्य काँच की तरह चिकना और सफेद होता है और रज लाख की तरह लाल होता है। अस्तु, इस प्रकार रस से लेकर वीर्य व रज तक छः धातुओं के पाचन करने मे पाँच दिन के हिसाब से पूरे ३० दिन व करीव ४ घण्टे लगते हैं, ऐसा आर्य-शास्त्रों का सिद्धान्त है।*
यह वीर्य वा रज कोई खास जगह मे नहीं रहता सम्पूर्ण शरीर ही इसका निवास स्थान है। बादाम या तिल मे जैसे तेल, दूध मे जैसे मक्खन, किसमिस व ईख मे जैसी मिठास, काठ मे जैसी अग्नि किंवा फूल मे अथवा चन्दन मे जैसे सुगन्ध सर्वत्र कण कण मे भरी रहती है, उसी तरह वीर्य भी शरीर के प्रत्येक अणु परमाणु मे भरा हुआ है। वीर्य का एक बूंद भी निकलना मानो अपने शरीर को नींबू की तरह निचोड़ ही
सधातौ स्गदौ मनान्ते प्रयेकं क्रमतो रसः।
अहो राबात्स्वयं पंच साई दण्डं च तिष्टति ॥ इति भोज । अर्थ-रस से मजान्त पर्यन्त प्रत्येक धातु पांच दिन रात व डेढ़ घड़ी तक रहती है।
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