बडों से आशीर्वाद लेने का फल क्या है?

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बडों से आशीर्वाद लेने का फल क्या है?

रामचरितमानस के भाषा के मंगलाचरणों से तुलसीदास जी ने पंचदेवता और गुरु की वंदना की थी। अब वे भूमि में विद्यमान साधुओं की वंदना कर रहे हैं।

बंदउ प्रथम महीसुर चरणा। मोह जनित संशय सब हरना॥

मैं भूमि में विद्यमान साधुजनों के पदकमलों को प्रणाम करता हूं, जो मेरे संशयों को मिटा देते हैं, जो मोह से उत्पन्न होते हैं।

'मही सुर चरणा' — 'मही' का अर्थ है भूमि। 'सुर' देवताओं का पर्यायवाची है। 'सुष्ठुराति ददात्यभीष्टमिति सुरः' — अर्थात जो हमारे अभीष्ट मनोवांछित को प्रदान करें, वे सुर हैं।

यदि केवल 'सुर' कहा जाए तो वे स्वर्ग में रहने वाले इंद्रादि देव होते हैं। हम यज्ञ में आहुति देकर उनसे प्रार्थना करते हैं, तो वे हमारे अभीष्ट फल को प्रदान करते हैं।

'मही सुर' यानी भूमि में सुर के समान विद्यमान साधुजन — वे भी सुर ही हैं। उनको नमस्कार करने से वे हमें अभीष्ट प्रदान करते हैं।

बड़ों को और साधुजनों को प्रणाम करना चाहिए — यही इसका कारण है। वे हमारा अभीष्ट प्रदान करने की शक्ति रखते हैं।

'अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलम्॥'

जो लोग अपने से बड़ों को प्रणाम करते हैं, उनकी आयु, विद्या, यश और बल — ये सब बढ़ते हैं।

यह कैसे होता है? जब हम बड़ों को प्रणाम करते हैं, तो वे हमें आशीर्वाद देते हैं।

बड़े लोगों को नमस्कार करके देखिए, वे बोलते हैं — 'दीर्घायुश्मान भवः' — तुम्हारी आयु दीर्घ हो। 'विद्यावान भवः' — तुम्हें सही और अच्छी विद्या मिले। 'यशस्वी भवः' — तुम्हें यश और प्रसिद्धि मिले। 'बलवान भवः' — तुम्हारा बल बढ़े।

बल अर्थात तन और मन दोनों का बल — जीवन में आने वाले शारीरिक और मानसिक कष्टों का सामना करने की शक्ति मिले।

'मंगलं भवतु' — जीवन में सब मंगल हो। 'सुखी भवः' — खुश रहो।

ऐसे सद्वाक्यों से बड़े हमें आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

 

संतों को वंदना करने का अर्थ क्या है?
संतों की वंदना का अर्थ है उस दिव्यता को प्रणाम करना जो मानव जीवन में सत्य और प्रेम की स्थापना करती है। जब हम संतों के चरणों में झुकते हैं, तब हमारा मन विनम्र होकर सीखने योग्य बनता है। यह केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का आरंभ है।

क्यों कहा गया कि संत मोहजनित संशय हर लेते हैं?
क्योंकि संतों का जीवन स्वयं अनुभव और ज्ञान पर आधारित होता है। वे मोह के आवरण को चीरकर सत्य को देखने की दृष्टि देते हैं। जब हम उनके सान्निध्य में आते हैं, तो मन की उलझनें स्वतः मिटती जाती हैं।

क्या यह केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं है?
नहीं, यह श्रद्धा के साथ-साथ एक आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है। जिस प्रकार सूर्य के सामने अंधकार टिक नहीं सकता, उसी तरह संतों की उपस्थिति में संशय टिक नहीं पाता। यह अनुभवजन्य तथ्य है, केवल भावना नहीं।

'महीसुर' को देवता क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे धरती पर रहकर देवताओं जैसे कार्य करते हैं — लोगों के दुःख हरते हैं, ज्ञान देते हैं, और धर्म की रक्षा करते हैं। उनका आचरण और वाणी लोगों को उच्चतर चेतना की ओर ले जाती है।

क्या भूमि के संत देवताओं से भी श्रेष्ठ हैं?
कई अर्थों में हाँ, क्योंकि देवता अदृश्य हैं, जबकि संत साक्षात मार्गदर्शन देते हैं। वे साधक को वास्तविक जीवन में सुधारने की प्रेरणा देते हैं।

क्या हर व्यक्ति ऐसे संतों से लाभ पा सकता है?
हाँ, यदि उसके भीतर विनम्रता और ग्रहणशीलता हो। संतों का आशीर्वाद केवल भक्तों के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए होता है जो ईमानदारी से सुधार चाहता है।

बड़ों को प्रणाम करने से चार गुण क्यों बढ़ते हैं?
क्योंकि प्रणाम करने में अहंकार का त्याग होता है। यह मन को ग्रहणशील बनाता है और वरिष्ठों का आशीर्वाद प्राप्त करने का मार्ग खोलता है। यही आशीर्वाद व्यक्ति के जीवन में दीर्घायु, ज्ञान, यश और बल के रूप में प्रकट होता है।

क्या यह परिणाम वास्तव में अनुभव किया जा सकता है?
हाँ, जो लोग नियमित रूप से अपने बड़ों को प्रणाम करते हैं, वे जीवन में स्थिरता और सम्मान दोनों प्राप्त करते हैं। यह उनके व्यवहार और दृष्टिकोण में दिखाई देता है।

यदि कोई इस नियम को अंधविश्वास माने तो क्या उत्तर होगा?
यह अंधविश्वास नहीं, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सत्य है। प्रणाम करने से मन में विनम्रता और सकारात्मक भाव आते हैं, जो तनाव घटाते और निर्णय-क्षमता बढ़ाते हैं। यही आयु, यश और बल बढ़ने का वास्तविक आधार है।

आशीर्वाद की शक्ति कैसे काम करती है?
आशीर्वाद किसी के शुभचिंतन की ऊर्जा है। जब वरिष्ठ व्यक्ति शुभ भावना से कहते हैं 'दीर्घायु हो', तो वह एक सकारात्मक संकल्प के रूप में कार्य करता है। यही संकल्प सूक्ष्म स्तर पर वातावरण और मन दोनों को प्रभावित करता है।

क्या हर शब्द आशीर्वाद बन सकता है?
नहीं, केवल वे शब्द जो सच्चे हृदय से बोले जाएं, वही प्रभाव डालते हैं। आध्यात्मिक रूप से, आशीर्वाद में भाव और सत्यनिष्ठा का होना आवश्यक है।

क्या बिना बोले भी आशीर्वाद दिया जा सकता है?
हाँ, मन का भाव भी उतना ही प्रभावी होता है। जब कोई संत या बड़ा व्यक्ति मन से शुभकामना करता है, वह बिना शब्दों के भी परिणाम देती है।

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