सुवचन को छोटे बच्चों से भी ग्रहण कर लेना चाहिये

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सुवचन को छोटे बच्चों से भी ग्रहण कर लेना चाहिये

बड़ों के आशीर्वाद से हमारा अभीष्ट फल हमें मिलता है। कैसे वे पूजा पाठ, जप, अनुष्ठान ये सब करते हैं जिससे उनको सिद्धि मिलती है। वे जो बोलते हैं, वह सच हो जाता है। बड़ों का आशीर्वाद कहीं दुकान में जाकर लेकर नहीं आ सकते, ये सिर्फ विनयपूर्वक उनको प्रणाम करने से ही मिलता है।

वृद्ध का मतलब जन्मतिथि के अनुसार उम्र में जो बड़े हैं, वे ही सिर्फ हमसे बड़े नहीं होते। ज्ञानवृद्ध भी होते हैं — जिनका ज्ञान या जिनकी सिद्धि हमसे ज्यादा होती है। जिनका ज्ञान या जिनकी सिद्धि हमसे ज्यादा हो, वे भी हमसे बड़े होते हैं, वृद्ध होते हैं। अगर हमसे कोई उम्र में छोटा है, फिर भी उसका ज्ञान हमसे ज्यादा है, तो उससे भी हमें आशीर्वाद लेना चाहिए।

अमित्रादपि सद्वृत्तम अमेध्यादपि कांचनम्। विशादप्यमृतं ग्राह्यम् बालादपि सुभाषितम्।।
दुश्मन से भी अच्छी विद्या सीख लेनी चाहिए। रामजी लक्ष्मण को बोले कि रावण के पास जो विद्याएं हैं, उनको सीखो। भले ही रावण दुष्ट था, फिर भी उसके पास जो विद्या थी, वह विद्या ही है। इसलिए कहते हैं, दुश्मन से भी अच्छी विद्या ग्रहण कर लेनी चाहिए। गंदगी के बीच में भी स्वर्ण पड़ा हो, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। स्वर्ण का एक गुण है, एक मूल्य है। विष के साथ रखे हुए अमृत को भी ग्रहण कर लेना चाहिए, उसका भी एक गुण है। समुद्र मंथन करते समय पहले विष बाहर निकला था, उसके बाद ही अमृत निकला, फिर भी इस अमृत को देवताओं ने ग्रहण किया।

वैसे हमसे कोई छोटा ही क्यों न हो, उसका भी सुवचन, आशीर्वचन ग्रहण कर लेना चाहिए। मोह जनित संशय सब हरना — मोह के कारण जो संदेह उत्पन्न हुए हैं, उनको दूर कर देता है साधुजनों का चरण। मोह ईश्वर के विषय में संशय उत्पन्न करता है। वे संशय सब साधुओं के चरण कमल की वंदना से मिट जाते हैं। और जिनको रामभक्ति अभीष्ट हो, उनको रामजी पर भक्ति भी संशय के दूर होने से प्राप्त हो जाती है।

 

ज्ञान केवल बड़ों से ही नहीं, हर योग्य व्यक्ति से प्राप्त किया जा सकता है।
ज्ञान का मूल्य उसकी उत्पत्ति पर नहीं, उसकी सच्चाई और उपयोगिता पर निर्भर करता है। जिस प्रकार छोटा दीपक भी अंधकार मिटाता है, उसी तरह छोटा व्यक्ति भी बड़ा ज्ञान दे सकता है।
क्या कम उम्र के व्यक्ति से ज्ञान लेना उचित है?
उम्र नहीं, अनुभव और दृष्टि मायने रखते हैं। यदि कोई छोटा व्यक्ति सत्य और विवेक से युक्त है, तो उसका मार्गदर्शन ग्रहण करना बुद्धिमानी है।
क्या यह विरोधाभास नहीं कि छोटा व्यक्ति हमें सिखाए?
नहीं, क्योंकि विनम्रता सीखने की पहली शर्त है। अहंकार ज्ञान का द्वार बंद कर देता है, जबकि खुले मन से सुनने वाला हर व्यक्ति लाभ पाता है।


शत्रु से भी अच्छी विद्या ग्रहण करनी चाहिए।
सत्य या उपयोगी ज्ञान का मूल्य उसके बोलने वाले के स्वभाव से कम नहीं होता। जैसे रावण दुष्ट था, फिर भी उसके पास महान ज्ञान था, जो सीखने योग्य था।
क्या शत्रु से सीखना आत्मसम्मान के विरुद्ध नहीं है?
नहीं, क्योंकि शास्त्र सिखाते हैं कि ज्ञान का कोई शत्रु नहीं होता। यदि किसी के पास उपयुक्त शिक्षा है, तो उसे ग्रहण करना आत्मविकास है, आत्महीनता नहीं।
क्या बुरे व्यक्ति से सीखने में खतरा नहीं है?
खतरा तब होता है जब हम उसके स्वभाव को अपनाएं, ज्ञान को नहीं। विवेक से छानकर केवल सही बात ग्रहण करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।


साधुजन मोह और संदेह को दूर करते हैं।
संतों के चरणों का स्मरण मन को शुद्ध करता है, जिससे ईश्वर के प्रति भ्रम मिट जाते हैं। श्रद्धा से उनका संग भक्ति की स्थिरता लाता है।
कैसे साधुओं के चरण मोह को हरते हैं?
उनका जीवन उदाहरण बनता है। जब हम उनका आचरण देखते हैं, तो अपने भ्रम टूटते हैं और सत्य का अनुभव सहज होता है।
क्या केवल साधु के चरण छूने से संशय मिटता है?
केवल स्पर्श नहीं, श्रद्धा से भरा संग ही परिवर्तन लाता है। चरणों का अर्थ है उनके मार्ग का अनुसरण करना — वही मन को निर्मल बनाता है।

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जय श्रीराम

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