
उसमें भी तारा और चन्द्रमा का आचरण एक अपवाद था। ऐसा मत समझो कि व्यभिचार जनसाधारण था सनातन संस्कृति में। बृहस्पति ने इसे महापातक कहा।
कुछ लोग खजुराहो के शिल्प दिखाकर ऐसी धारणा फैलाने की कोशिश करते हैं कि ये सब हमारी संस्कृति में बहुत आम बात थी। यह गलत है — ये सब अपवाद हैं।
हमारी संस्कृति का नियम है — पातिव्रत्य। हमारी संस्कृति में उत्कृष्ट है — एक पत्नी व्रत।
भगवान की बात को बीच में मत लाओ — रुक्मिणी, सत्यभामा, राधा। उनके नियम अलग हैं — जैसे मैंने बताया।
राजाओं ने भी कई शादियाँ की हैं। लेकिन आम आदमी में उस पति को श्रेष्ठ माना गया है जो अपनी एकमात्र पत्नी की ओर समर्पित है। उस पत्नी को श्रेष्ठ माना गया है जो अपने एकमात्र पति की ओर समर्पित है।
द्रौपदी ने पाँच-पाँच शादियाँ की हैं — ये सब बीच में मत लाओ। पाँच-पाँच शादियाँ करने के बाद भी —
अहल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा। पञ्च कन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्।।
द्रौपदी को कन्या कहा है। कैसे।
कारण है — रावण की मृत्यु होने के बाद मन्दोदरी विभीषण की राणी बनी, तब भी उन्हें कन्या कहते हैं — कैसे।
शास्त्र में कारण है — उस तरफ नहीं जाएँगे अब।
पातिव्रत्य को गुणों में से श्रेष्ठतम माना गया है। हमारे इतिहास में देखा जा सकता है कि पतिव्रताओं को बहुत ही ऊँचा स्थान दिया गया है। उन्हें देवी की तरह माना जाता है। उनके ऊपर श्लोक बोले जाते हैं। उनकी पूजा की जाती है।
क्यों — पातिव्रत्य एक तपस्या है — एक आजीवन व्रत है। उसका पालन करने से साधारण नारी देवी बन जाती है। उसमें अनुग्रह या निग्रह करने की शक्ति आ जाती है — जैसे ऋषि-मुनियों में होती है। बहुत ही कठिन है यह।
अगर आधुनिक विज्ञान कहता है कि मानव स्वाभाविक तरीके से बहुसंगी है, तो यह गलत नहीं है।
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने।
प्रकृतिरेषा मनुष्याणां निवृत्तिस्तु महाफलः।
मनु भी यही कहते हैं। लेकिन इन वासनाओं को रोकने से महाफल मिलता है।
जैसे अनेक व्यक्तियों के साथ संग करने की स्वाभाविक वासना को जिसने रोका, मान लो वह बहुत बड़ी तपस्या कर रहा है या कर रही है। इसलिए कहते हैं कि स्त्री को पातिव्रत्य के अलावा और कोई अनुष्ठान ही नहीं चाहिए। वही सबसे बड़ी तपस्या है।
तापसों में शक्ति कैसे आती है — वे शरीर के स्वाभाविक खिंचावों को रोकते हैं। भूख को वश में रखते हैं। आम आदमी को भूख लगे तो क्या करेगा — खाना खाएगा। लेकिन तापस भूख को वश में रखेगा। इस तरह शरीर की अन्य स्वाभाविक आवश्यकताओं को भी।
ऐसा करने से दैविक शक्ति का विकास होता है।
प्राणायाम में भी वही होता है — साँस की स्वाभाविक धारा को रोका जाता है, उसे वश में लाया जाता है। इसलिए प्राणायाम करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे योगी बन जाता है।
पतिव्रता में दैविक शक्ति कहाँ से आती है — बहुसंग की जो मानवीय स्वाभाविकता है, उसे रोकने से।
सनातन संस्कृति में आचरण का सामान्य नियम क्या था?
सनातन परंपरा में सामान्य समाज के लिए संयमित वैवाहिक आचरण ही मानक था। कुछ कथाओं में दिखने वाले आचरण नियम नहीं बल्कि अपवाद थे। शास्त्रीय दृष्टि से ऐसे आचरण को गंभीर दोष माना गया। इसलिए पूरे समाज को उन्हीं उदाहरणों से आंकना ठीक नहीं है। नियम और अपवाद में स्पष्ट भेद रखा गया।
अगर कुछ कथाएं अलग आचरण दिखाती हैं तो उन्हें क्यों याद रखा गया?
अपवाद इसलिए दर्ज होते हैं ताकि नियम की सीमा समझ में आए। वे यह दिखाते हैं कि क्या सामान्य नहीं है। इससे समाज के लिए सही आचरण और भी स्पष्ट होता है। कथा का उद्देश्य अनुकरण नहीं, बोध है।
क्या अपवादों की मौजूदगी नियम को कमजोर नहीं करती?
नहीं, अपवाद नियम को कमजोर नहीं करते बल्कि उसे परिभाषित करते हैं। हर व्यवस्था में सीमांत स्थितियां होती हैं। शास्त्र ने उन्हें अलग नाम और स्थान दिया है। सामान्य आचरण का मूल्यांकन हमेशा नियम से ही होता है।
खजुराहो जैसे शिल्पों से संस्कृति पर क्या निष्कर्ष निकलता है?
शिल्प किसी एक भाव या प्रतीक को दिखाते हैं, पूरे सामाजिक नियम को नहीं। उन्हें संदर्भ से अलग करके सामान्य आचरण बताना गलत निष्कर्ष है। संस्कृति का मूल्यांकन ग्रंथों और सामाजिक आचरण से होता है। कला अपवाद को भी दिखा सकती है।
फिर ऐसे शिल्प क्यों बनाए गए होंगे?
कला कई स्तरों पर काम करती है—रूपक, प्रतीक और दर्शन। हर दृश्य आचरण का आदेश नहीं होता। कई बार वह चेतावनी या विमर्श भी होता है। इसलिए सीधा अर्थ निकालना ठीक नहीं।
अगर आम लोग भ्रमित हों तो जिम्मेदारी किसकी है?
जिम्मेदारी विवेकपूर्ण व्याख्या की है। बिना संदर्भ देखे निष्कर्ष निकालना समस्या पैदा करता है। अध्ययनशील दृष्टि भ्रम को दूर करती है। शास्त्र और इतिहास साथ पढ़ने चाहिए।
सामान्य जीवन में श्रेष्ठ वैवाहिक आदर्श क्या माना गया?
सामान्य जीवन में एक पत्नी-व्रत और पातिव्रत्य को श्रेष्ठ माना गया। पति-पत्नी का परस्पर समर्पण ही आदर्श है। यह स्थिर परिवार और सामाजिक संतुलन देता है। इसी को नैतिक ऊंचाई माना गया।
राजाओं के अनेक विवाहों का यहां क्या स्थान है?
शासकीय स्थितियों में अलग कारण और नियम रहे हैं। उन्हें सामान्य जन का आदर्श नहीं बनाया गया। समाज ने हमेशा व्यक्तिगत संयम को श्रेष्ठ माना। इसलिए तुलना ठीक नहीं बैठती।
क्या यह आदर्श व्यवहारिक जीवन में कठिन नहीं?
कठिन है, पर मूल्यवान भी है। कठिन व्रत ही व्यक्ति को ऊंचा बनाते हैं। सरल मार्ग हमेशा श्रेष्ठ नहीं होता। समाज ने कठिन को ही आदर्श माना।
पंच कन्याओं की अवधारणा का आशय क्या है?
यहां कन्या शब्द देह से नहीं, आचरण और शुद्धता से जुड़ा है। जीवन की परिस्थितियां बदलने पर भी आंतरिक मर्यादा को महत्व दिया गया। इसलिए नामकरण प्रतीकात्मक है। इसका अर्थ सतही नहीं है।
यह भेद समझना क्यों जरूरी है?
क्योंकि शब्द का अर्थ संदर्भ से बदलता है। बिना संदर्भ समझे विरोधाभास दिखता है। शास्त्र गहरे संकेतों में बात करते हैं। सतह पर अटकना भ्रम पैदा करता है।
क्या यह व्याख्या तर्कसंगत है?
हां, क्योंकि भाषा और दर्शन में प्रतीक सामान्य हैं। कई अवधारणाएं गुणों पर आधारित होती हैं। शास्त्रों में ऐसा प्रयोग बार-बार मिलता है। यह तर्क के अनुरूप है।
पातिव्रत्य को तपस्या क्यों कहा गया?
क्योंकि यह आजीवन संयम और आत्मनियंत्रण मांगता है। इसमें इच्छाओं पर निरंतर रोक रहती है। यही तप का मूल स्वरूप है। इससे व्यक्ति का आंतरिक बल बढ़ता है।
इस तप का प्रभाव क्या माना गया?
इससे मानसिक स्थिरता और नैतिक शक्ति आती है। व्यक्ति के निर्णय दृढ़ होते हैं। समाज में ऐसे आचरण को ऊंचा स्थान मिला। इसे साधना के समान माना गया।
क्या यह शक्ति केवल मान्यता भर है?
नहीं, यह व्यवहार से जुड़ा परिणाम है। लंबे समय का संयम मन को मजबूत करता है। मजबूत मन ही शक्ति का आधार है। यह कारण-कार्य संबंध है।
आधुनिक विज्ञान और संयम के विचार में टकराव है क्या?
विज्ञान स्वाभाविक प्रवृत्तियों को स्वीकार करता है। शास्त्र भी उन्हें मानते हैं। पर शास्त्र आगे बढ़कर कहते हैं कि संयम से उच्च फल मिलता है। दोनों बातें साथ चल सकती हैं।
अगर प्रवृत्ति स्वाभाविक है तो रोकना क्यों?
क्योंकि हर स्वाभाविक चीज हितकारी नहीं होती। अनुशासन से ही विकास होता है। खेल, विद्या और जीवन सभी में यह दिखता है। संयम प्रगति का साधन है।
क्या यह मानव स्वभाव के विरुद्ध नहीं?
नहीं, यह स्वभाव का परिष्कार है। रोक का अर्थ दमन नहीं, दिशा देना है। दिशा मिलने पर ऊर्जा श्रेष्ठ परिणाम देती है। यह तर्कसंगत है।
प्राणायाम और संयम का संबंध कैसे समझें?
प्राणायाम में श्वास की स्वाभाविक गति को नियंत्रित किया जाता है। इससे शरीर और मन पर अधिकार बढ़ता है। यही सिद्धांत अन्य इच्छाओं पर भी लागू होता है। नियंत्रण से क्षमता बढ़ती है।
क्या यह तुलना उचित है?
हां, दोनों में मूल तत्व नियंत्रण है। एक में श्वास, दूसरे में इच्छा। प्रक्रिया अलग है, सिद्धांत एक है। इसलिए तुलना सार्थक है।
क्या हर व्यक्ति यह कर सकता है?
अभ्यास से कोई भी कर सकता है। शुरुआत कठिन लगती है। धीरे-धीरे क्षमता बढ़ती है। यही साधना का मार्ग है।
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