
दहेज मांगना कानूनी अपराध है।
लेकिन क्या दहेज को लड़की के अधिकार के रूप में नहीं देख सकते।
वेद में एक शब्द है—वहतु।
इसका अर्थ है दहेज।
कन्या दहेज लेकर अपने पति के घर जाती है और वहाँ जाकर गर्व से दिखाती है कि देखो, मैं क्या-क्या लेकर आई हूँ।
लेकिन उसी के साथ एक मंत्र भी है, जिसमें बहू का स्थान बताया गया है पति के परिवार में।
सम्राज्ञ्येधि श्वशुरेषु सम्रज्ञ्युत देवृषु।
ननान्दुः सम्राज्ञ्येधि सम्राज्ञ्युत श्वश्व्राः।
वधू से कहा जाता है—श्वशुर, देवर, ननद और सास के बीच तुम सम्राज्ञी, रानी बनकर रहो।
यह है वेद का सद्विचार।
यह है सनातन धर्म का सद्विचार।
इसके भीतर दहेज का भी स्थान है, लेकिन तब तक, जब तक वेद के आदर्शों का समग्र रूप से पालन किया जाए।
ऐसा नहीं कि दहेज वेद में है और बहू को तड़पाया जाए।
यह नहीं चलेगा।
जब माता-पिता यह सोचते हैं कि अपने नाकाम बेटे को आगे रखकर विवाह के नाम पर थोड़ा पैसा कमाया जाए, यह कलियुग की सोच है।
तब कानून बदलना पड़ता है।
दहेज को गैरकानूनी बनाना पड़ता है।
यह सब इसलिए कहा गया कि भीष्म ने जो कुछ किया, उस पर आलोचनात्मक होने का सामर्थ्य हममें नहीं है—यह स्थापित करने के लिए।
तो काशी नरेश की कन्याओं के स्वयंवर मंडप में भीष्म पहुँचे।
उन्होंने अंबा, अंबिका और अंबालिका—इन तीनों कन्याओं का अपहरण किया, अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य से विवाह कराने के लिए।
तीनों कन्याओं को लेकर भीष्म हस्तिनापुर पहुँचे और उन्हें सत्यवती को सौंप दिया।
विवाह की तैयारियाँ धूमधाम से शुरू हो गईं।
एक बात और।
यह कन्याओं के उल्लंघन या अनाचार की बात नहीं है।
विधिवत विवाह किया जा रहा है।
तीनों कन्याएँ हस्तिनापुर की रानी बनने वाली हैं।
तीनों में सबसे बड़ी थीं अंबा।
अंबा ने भीष्म से कहा—आप बड़े महात्मा हैं, बड़े धर्मज्ञ हैं, बड़े ज्ञानी हैं।
आप जब हमारा हरण करके यहाँ लाए, उससे पहले ही मैंने मन ही मन राजा शाल्व को, जो स्वयंवर सभा में उपस्थित थे, अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था।
वे भी मुझमें अनुरक्त हो गए थे।
आपका कुलाचार मुझे ज्ञात नहीं है।
उसके अनुसार जो भी उचित हो, वही कीजिए।
भीष्म ने अपनी माता सत्यवती, गुरुजनों और मंत्रियों से विचार-विमर्श किया।
यह निर्णय हुआ कि यदि वह कन्या स्वेच्छा से वापस जाना चाहती है, तो जा सकती है।
अंबा शाल्व के पास चली गई।
उसने कहा—मैं भीष्म की आज्ञा लेकर आपके पास आई हूँ, मुझे स्वीकार कीजिए।
हमारे बीच जो मन का संबंध बना था, उसके बारे में मैंने भीष्म को बताया, इसलिए उन्होंने मुझे जाने दिया।
अब हम विवाह कर सकते हैं और सुख से रह सकते हैं।
शाल्व ने कहा—मेरे सामने, मेरी आँखों के सामने, भीष्म ने तुम्हारा हाथ पकड़ा था और रथ में बैठाकर ले गए थे।
उसके बाद क्या हुआ, मुझे नहीं पता।
मैं कैसे मान लूँ कि तुम दूषित नहीं हुई।
मैं किसी के उच्छिष्ट को स्वीकार नहीं कर सकता।
हमारा विवाह नहीं हो सकता।
अंबा रोती हुई भीष्म के पास वापस आ गई।
उसने कहा—आपने मेरा हाथ पकड़ा, इसी कारण राजा शाल्व ने मेरा त्याग कर दिया।
आप धर्मज्ञ हैं, महाभाग हैं, आपको ही मुझे स्वीकार करना होगा।
यही धर्म है।
यदि आपने भी मुझे स्वीकार नहीं किया, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।
भीष्म ने कहा—तुम पहले ही कह चुकी हो कि तुम्हारा मन शाल्व में आसक्त है।
तो मैं तुम्हें कैसे स्वीकार कर सकता हूँ।
एक काम करो, अपने पिता के पास वापस चली जाओ।
अंबा वहाँ से चली गई।
वह किसी निर्जन स्थान पर जाकर तपस्या करने लगी।
वेदों में दहेज को किस रूप में देखा गया था?
वेदों में दहेज को कन्या का अधिकार माना गया था। यह उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान से जुड़ा था। दहेज के साथ बहू को परिवार की रानी के रूप में स्वीकार करने का भाव था। इसका उद्देश्य सुरक्षा और सम्मान था। शोषण का कोई स्थान नहीं था।
तो फिर आज दहेज अपराध क्यों बना?
क्योंकि उद्देश्य बदल गया। अब दहेज अधिकार नहीं, लेन-देन और लालच बन गया। बहू का सम्मान नहीं, उत्पीड़न होने लगा। इसलिए कानून का हस्तक्षेप जरूरी हुआ।
क्या इसका अर्थ है कि पहले की व्यवस्था गलत थी?
नहीं, वह अपने समय के अनुसार सही थी। समस्या नियम में नहीं, नीयत में आई। नीयत बदली तो नियम भी बदले। यही व्यावहारिक दृष्टि है।
भीष्म द्वारा कन्याओं का अपहरण किस संदर्भ में हुआ?
यह विवाह की वैध प्रक्रिया का हिस्सा था। उद्देश्य विचित्रवीर्य का विवाह और राज्य की स्थिरता था। इसमें कन्याओं को रानी का स्थान दिया जा रहा था। इसे आज की दृष्टि से नहीं तौला जा सकता।
क्या इसे अनाचार कहना उचित है?
नहीं, क्योंकि विवाह विधिवत हो रहा था। कन्याओं की प्रतिष्ठा सुरक्षित थी। उद्देश्य और प्रक्रिया दोनों सामाजिक नियमों के भीतर थे। संदर्भ समझना आवश्यक है।
तो आज यह आचरण क्यों अस्वीकार्य है?
क्योंकि सामाजिक परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। आज यह उत्पीड़न माना जाएगा। समय बदलने पर मूल्यांकन भी बदलता है।
अंबा का शाल्व को चुनना क्या दर्शाता है?
यह स्त्री की स्वेच्छा और निर्णय क्षमता को दिखाता है। उसने मन से चयन किया था। उस समय यह स्वीकार्य था। यह उस युग की सामाजिक स्वतंत्रता दर्शाता है।
भीष्म ने अंबा को लौटने की अनुमति क्यों दी?
क्योंकि उसकी इच्छा को प्राथमिकता दी गई। यह धर्म का मूल सिद्धांत था। स्त्री की स्वेच्छा का सम्मान किया गया। यह निर्णय विवेकपूर्ण था।
क्या यह निर्णय भीष्म के लिए सरल था?
नहीं, यह कठिन था। लेकिन धर्म में सरलता नहीं, न्याय प्रधान होता है। व्यक्तिगत सुविधा नहीं, नैतिक संतुलन देखा गया। यही धर्मज्ञता है।
शाल्व द्वारा अंबा को अस्वीकार करने का कारण क्या था?
वह सामाजिक संदेह से ग्रस्त था। उसने बाहरी घटनाओं को आधार बनाया। विश्वास की कमी उसके निर्णय में दिखी। यही उसके पतन का कारण बना।
क्या यह निर्णय धर्मसम्मत था?
नहीं, यह भय और अहंकार से प्रेरित था। उसने परिस्थिति को समझे बिना निर्णय लिया। इससे अंबा का जीवन संकट में पड़ा। यह अधर्म का संकेत है।
अगर शाल्व स्वीकार कर लेता तो क्या होता?
अंबा का जीवन स्थिर हो जाता। संघर्ष और तपस्या की आवश्यकता न पड़ती। एक निर्णय ने पूरी दिशा बदल दी। यही कर्म का प्रभाव है।
अंबा द्वारा भीष्म से आग्रह क्यों किया गया?
क्योंकि समाज की दृष्टि में वही उसका आधार बने थे। उसने धर्म के आधार पर न्याय मांगा। यह विवशता का स्वर था। यह उसकी पीड़ा को दिखाता है।
भीष्म ने अंबा को स्वीकार क्यों नहीं किया?
क्योंकि अंबा का मन पहले ही शाल्व से जुड़ा था। धर्म में भाव की शुद्धता आवश्यक है। जब मन कहीं और है, तो स्वीकार असंभव था। यह कठोर लेकिन सुसंगत निर्णय था।
अंबा का तपस्या मार्ग क्या दर्शाता है?
यह अस्वीकार और पीड़ा की चरम अवस्था है। जब सामाजिक मार्ग बंद हो जाते हैं, तब व्यक्ति भीतर की शक्ति खोजता है। तपस्या संघर्ष का रूप बन जाती है। यही उसकी परिणति थी।
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