एक बार देवों और असुरों के बीच घोर युद्ध हुआ था। यह अक्सर होता रहता था। धर्म और अधर्म के बीच जो लड़ाई आज भी हर दिन चलती रहती है, यह वही है।
देव: देव धर्म को मानने वाले, धर्म को पालने वाले और सात्विक गुण से युक्त हैं। देव हमेशा यही प्रयास करते रहते हैं कि समस्त विश्व में शांति और खुशहाली बनी रहे।
असुर: असुरों का भाव इसके ठीक विपरीत है। उनमें तमोगुण और रजोगुण ज़्यादा है। अपने भुजबल से हर चीज़ को अपने नियंत्रण में रखने वाले हैं असुर। उनको लगता है कि जगत की हर वस्तु को भोगने का अधिकार उन्हें जन्मसिद्ध है।
कभी-कभी धर्म और अधर्म के बीच की लड़ाई में अधर्म पहले जीत भी जाता है, लेकिन आखिरी जीत हमेशा धर्म की ही होती है। इस युद्ध में भी पहले असुर ही जीत रहे थे, लेकिन जहाँ भी अधर्म की जीत और धर्म की हार दिखती है, वहाँ परमेश्वर परमात्मा हस्तक्षेप करते हैं। उनकी अपार शक्ति से देव जीते और देव खुशियाँ मना रहे थे। नाचना, गाना, ज़ोर-ज़ोर से सबको बताना, 'देखो हमारी ताक़त, सारे असुर हमसे हार गए'। यह सब चल रहा था।
लेकिन उनको पता नहीं था कि किस शक्ति ने उनकी सहायता की थी। यही होता है, जब भी हम कुछ सिद्ध कर लेते हैं, प्राप्त कर लेते हैं, उसका पूरा श्रेय हम खुद ले लेते हैं। कितने लोगों ने हमारी मदद की होगी, दैवीय संकल्प का प्रभाव, यह सब हम भूल जाते हैं। 'देखो मैंने क्या कर दिखाया, अच्छे से योजना बनाई थी मैंने, बहुत मेहनत करके पाया, मेरे अच्छे संबंध काम आए, मैं इसे जानता था उसे जानता था'। यह गलत है। हमें पता होना चाहिए जितनी जीत है, सफलता है, सौभाग्य है, यह सब परमेश्वर की कृपा मात्र है। 'मैंने मेहनत की, मेरा सामर्थ्य है'—यह सब विचार अपरिपक्व और गलत हैं।
तो देव भी यह नहीं जान पाए कि उनकी जीत के पीछे क्या था। वे अहंकार करने लगे। अचानक उनके सामने एक तेज का पुंज प्रकट हो गया। करोड़ों सूर्यों जैसी दीप्ति। ना उसकी शुरुआत, ना अंत। देवता लोग विस्मित हो गए। 'यह क्या है? पहले कभी नहीं देखा ऐसा चमक'। उन्होंने अग्नि देव से कहा, 'ज़रा पता कीजिए कौन है यह, क्या है यह'। अग्नि को 'जातवेदस' कहते हैं, देवों में सब कुछ जानने वाले हैं अग्नि।
अग्नि देव उस तेज के सामने गए और पूछे, 'कौन हो तुम?' वापस सवाल आया, 'पहले यह बताओ तुम कौन हो?' 'अरे, मुझे नहीं पहचानते? मैं अग्नि देव हूँ। मैं विश्वभर में प्रसिद्ध हूँ'। 'किस बात को लेकर प्रसिद्ध?' 'मैं हर चीज़ को जलाकर राख कर सकता हूँ'। 'तो फिर इस घास के टुकड़े को जलाकर दिखाओ'। दीप्ति ने एक घास के टुकड़े को अग्नि देव के सामने डाल दिया। बहुत कोशिश करने के बावजूद अग्नि देव उसे नहीं जला पाए। सर झुकाकर अग्नि देव वापस चले गए।
देवों ने वायु भगवान से कहा, 'आप जाकर पता कीजिए यह क्या है'। वायु भगवान पहुँचे उस तेज के सामने। 'अपना परिचय दो हमें'। तेज ने बताया, 'पहले खुद का परिचय दो'। 'मेरे बारे में नहीं सुने हो? मैं वायु हूँ। इस प्रपंच में मुझे रोकने वाला कोई नहीं है। मैं जहाँ चाहूँ जा सकता हूँ। बड़े-बड़े समंदरों को हिला देता हूँ मैं। हर प्राणी को प्राणवायु के रूप में जीवन मैं ही देता हूँ। बड़े-बड़े वृक्षों को गिरा देता हूँ मैं'। 'तो फिर इस घास के टुकड़े को ज़रा उड़ाकर तो दिखाओ'। नहीं हो पाया, वह घास का टुकड़ा ज़रा हिला भी नहीं। वायु भगवान भी सर झुकाकर वहाँ से चले गए।
देवराज इंद्र को एहसास हो गया कि यह कोई साधारण शक्ति नहीं है, इसके बारे में जानना ज़रूरी है। इंद्र में अपनी ताक़त का गर्व स्वतः सिद्ध है, लेकिन इस बार उन्होंने कुछ और सोच लिया। आँखें बंद करके वे ध्यान करने लगे। अपने मन को एकाग्र करके जगदम्बा ईश्वरी पार्वती जी के दिव्य चरणों में ध्यान करने लगे इंद्र। माता प्रकट हो गईं और उन्होंने बताया, 'यह तेज साक्षात् परब्रह्म परमात्मा परमेश्वर है जो इस जगत के नियंता है। जब तुम लोगों ने असुरों के ऊपर जीत पाया, तुम लोगों में अहंकार आ गया। तुम लोग सोचने लगे कि यह हमारे सामर्थ्य से हुआ है। 'मेरा सामर्थ्य, मेरा सामर्थ्य' सोचकर तुम लोगों में से एक-एक अहंकार करने लग गया था। यह सही नहीं है। इस दिव्य शक्ति ने करुणापूर्वक यह चाहा कि जगत में धर्म सुस्थिर रहे और इसके लिए इस परम शक्ति ने तुम्हारी सहायता की। तुम लोगों ने सोच लिया कि तुम ही लोगों ने असुरों को हराया। तुम्हारे अहंकार को खत्म करके तुम्हें पवित्र करने वही परमेश्वर परमात्मा अब तुम्हारे सामने यहाँ इस दिव्य तेज के रूप में प्रकट हुए हैं। यह जान लो कि इस जगत में जो कुछ भी होता है, इस परमेश्वर की इच्छा शक्ति से ही होता है। देव, मनुष्य, अन्य प्राणी तो केवल निमित्त मात्र हैं, उनके हाथ के सिर्फ साधन हैं, उपकरण हैं'।
यह ज्ञान प्राप्त होने से देवता लोग विनम्र हो गए। उस विनम्रता से वे और शक्तिशाली हो गए, यह ज्ञान उनकी ताक़त बन गई। ईश्वर को जानने के लिए अहंकार को त्याग देना ज़रूरी है। अहंकार को छोड़ देने से ईश्वरी शक्ति निर्बाध बहने लगेगी। अहंकार, लोभ आदि से इस प्रवाह को हम लोग ही रोक लेते हैं। जब अहंकार, लोभ ये सब कम हो जाएँगे, मिट जाएँगे, तो परमेश्वर की अपार शक्ति हमारे माध्यम से प्रवाह करने लगेगी। सच्ची श्रद्धा और भक्ति होने से अहंकार अपने आप मिट जाएगा। विनम्रता ही श्रेष्ठता है, विनम्रता से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
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