
चार प्रकार के भक्त होते हैं। जिज्ञासु भक्त, आर्त भक्त, अर्थार्थी भक्त, और ज्ञानी भक्त। इनमें से जिज्ञासु भक्त दार्शनिक किस्म के भक्त हैं। उनके आध्यात्मिक लोक का दायरा बहुत सिमटा हुआ होता है। जैसे किताब या कंप्यूटर स्क्रीन या उनके हाथ में पकड़े मोबाइल और उनके सिर के बीच की दूरी, उतनी ही। उनके दिमाग पर आध्यात्मिकता छाई हुई है। जब वे कुछ पढ़ते हैं या बोलते हैं या सुनते हैं तो वे आध्यात्मिक हैं। ऐसे विद्वानी लोगों को भी हम भक्त कहते हैं। पर वे भक्त कहलाने लायक हैं भी या नहीं कहा नहीं जा सकता। ऐसे भक्त भगवान का अस्तित्व सिद्ध करने के चक्कर में अक्सर तर्क-वितर्क में फंस जाते हैं। अगर कोई कह दे कि ईश्वर नहीं है तो बस ये लोग ईश्वर को साबित करने को ही अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लेते हैं। जिज्ञासु भक्तों पर आधारित एक अध्यापक और शिष्य की कहानी है विदेश से। एक नास्तिक अध्यापक ने एक विद्यार्थी से पूछा कि अगर भगवान है तो संसार में बुराई क्यों है? तो विद्यार्थी ने पूछा कि क्या ठंड होती है? शिक्षक ने उत्तर दिया हाँ। छात्र ने कहा नहीं, गर्मी की कमी को ही ठंड कहते हैं। शिष्य ने आगे पूछा क्या अंधकार होता है? तो शिक्षक ने फिर से वही कहा हाँ। नहीं, रोशनी की कमी को ही अंधकार कहते हैं। ठीक इसी तरह दैवी उपस्थिति की कमी है तो समाज में बुराई जन्म लेती है। जब ईश्वर सबके दिलो दिमाग में विराजमान होंगे तो बुराई का अंत खुद-ब-खुद हो जाएगा। इस तरह से भगवान को सिद्ध करने की कोशिश करते हैं ये लोग। ये सुनकर नास्तिकता के पक्ष के लोग कहेंगे कि ये बिल्कुल बेवकूफी वाले तर्क हैं। इस तर्क के हिसाब से तो अगर गरीबी है तो वो सिर्फ संपत्ति की कमी है, इसी तरह बीमारियाँ भी स्वास्थ्य की कमी है। इससे क्या अनुमान निकला? क्या परिणाम निकला? ईश्वर जिज्ञासु भक्तों के मस्तिष्क में निवास करते हैं न कि दिल में। ये लोग सदा आध्यात्मिकता में अपने ही तर्क को सिद्ध करने में उलझे रहते हैं।
सनातन धर्म के छह दर्शन हैं: प्रामाणिक, न्याय, वेदांत, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य और योग। हर कोई अपने-अपने तरीके से किसी भी चीज की सत्ता या गैर-सत्ता को सिद्ध करने में लगा रहता है। इस काम के लिए व्याकरण, व्युत्पत्ति विज्ञान, तर्क, सभी तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। आप देखेंगे कि मीमांसकों और वेदांतियों, सांख्यकारों और तार्किकों के बीच ईश्वर, ब्रह्म, आनंद, सत्य, असत्य, पुरुष, प्रकृति, लगभग सभी के अस्तित्व के बारे में तर्क और वाद-विवाद होता रहता है। अद्वैती और विशिष्टाद्वैती दोनों ही वेदांती हैं लेकिन फिर भी वे छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे पर चीखते-चिल्लाते रहते हैं यहाँ तक कि एक दूसरे की निंदा करने से भी नहीं चूकते। मामूली सी बात पर एक दूसरे से स्पर्धा करते हैं। मुझे अभी भी समझ नहीं आता कि इन दोनों सोचों के बीच वास्तव में क्या अंतर है। आप ईश्वर की महिमा के बारे में एक दिल को छू लेने वाली कविता लिखिये, एक ऐसी कविता जिससे सुनने वाले की आँखों में आँसू आ जाएं, सबसे पहले तो व्याकरण वाले उसमें कमियां निकालेंगे। प्रयोग सही नहीं है, यहाँ पर ये विभक्ति नहीं हो सकती, इस शब्द का प्रयोग पहले किसी जाने-माने कवि ने नहीं किया है, आपने कैसे कर दिया? इन्हीं कारणों की वजह से सनातन धर्म में हल्की सी कमजोरी आई है आजकल। हमने हमारे श्रेष्ठ धर्म को इन गैर-जिम्मेदार लोगों के हाथों में सौंप दिया जो स्वयं की प्रसिद्धि में ही दिलचस्पी रखते हैं, ताकि दुनिया को पता चले कि वे कितने महान हैं, वे कितने बड़े हैं। वे बाज के समान आकाश में ऊंचे उड़ते हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी आंखें तब भी जमीन पर ही हैं आहार की खोज में। वे अपने नाम और प्रतिष्ठा से ही मतलब रखते हैं। जो कुछ भी हमारे ऋषियों ने निःस्वार्थ भाव से हमें सौंपा उसकी गलत व्याख्या की जाती है। कलियुग धर्म कहता है जैसे-जैसे कलियुग बढ़ता जाएगा जो कुछ हमने ऋषि-मुनियों से पाया है वो सब हम खो देंगे। हमारे पास केवल सुनी-सुनाई और खोखली बातें ही रह जाएंगी और यही तो जिज्ञासु भक्तों की खूबी है। हम ऐसे भक्तों का सम्मान करते हैं, उन्हें नमन करके उनके पैर छूते हैं क्योंकि वे ऐसे ज्ञानी लगते हैं कि उनकी बातें हमारी समझ से परे हैं और ना ही उनकी बातों का उनसे ही स्पष्टीकरण करने का हम में साहस है। ये है जिज्ञासु भक्त।
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