
ऋषि उद्दालक के पुत्र थे श्वेतकेतु।
वे उस समय छोटे बालक थे।
एक बार ऋषि बैठे थे।
श्वेतकेतु बैठा था।
माता भी वहीं बैठी थीं।
उसी समय एक अन्य पुरुष आया।
सबके सामने ही उसने उस ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ा और दोनों चले गए।
श्वेतकेतु को बहुत क्रोध आया।
उसने अपने पिता से पूछा—आपने उन्हें रोका क्यों नहीं।
आपने इस अधर्म को रोका क्यों नहीं।
ऋषि बोले—मेरा ऐसा कोई अधिकार नहीं है ऐसा करने का, पति होने के नाते भी नहीं।
वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र है।
धर्म यही कहता है।
श्वेतकेतु ने पूछा—यह धर्म किसने बनाया।
यह नियम किसका बनाया हुआ है।
ऋषि बोले—हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने।
श्वेतकेतु ने पूछा—उन्हें यह अधिकार किसने दिया।
ऋषि बोले—उनके पास तप-शक्ति है।
वे सही और गलत का विश्लेषण कर सकते हैं।
इसलिए उन्हें अधिकार है।
उनकी तप-शक्ति के माध्यम से जो भी वे घोषित करते हैं, वह लागू हो जाता है।
वही नियम बन जाता है।
श्वेतकेतु ने कहा—यदि ऐसा है, तो मैं अपनी तप-शक्ति से आज यह घोषित करता हूँ कि आज के बाद पत्नी का संबंध केवल अपने एकमात्र पति के साथ रहेगा।
आज के बाद यही धर्म रहेगा।
यही नियम रहेगा।
और वह नियम लागू हो गया।
मेरे कहने का अर्थ यह है कि ये जितने भी नियम हैं, ये कालानुसार बदलते रहते हैं।
आज की परिस्थिति में न केवल पत्नी की पति के प्रति, बल्कि पति की पत्नी के प्रति भी वफादारी अत्यंत आवश्यक है।
आज हमारी व्यवस्था मूल परिवार या अणु परिवार की है।
माता-पिता और बच्चे, कभी-कभी बुजुर्ग माता-पिता।
चाचा-चाची, काका-काकी, उनके बच्चे, बच्चों के बच्चे—पचास-साठ लोग एक ही घर में—यह अब बहुत विरल हो गया है।
ऐसी स्थिति में तीन, चार या पाँच लोगों के परिवार में सबका ध्यान एक-दूसरे पर चौबीसों घंटे केंद्रित रहता है।
पहले संतुलन होता था।
बड़े परिवारों में सास ने डांटा तो चाची ने दिलासा दिया, बात खत्म।
आज ऐसा नहीं है।
आज हर बात गंभीर हो जाती है।
संतुलन के लिए आसपास लोग नहीं होते।
आज के परिवार की सुरक्षा का आधार-स्तंभ है पति और पत्नी के बीच संपूर्ण वफादारी।
अखंडित, एकांतिक वफादारी।
यह बच्चों के भविष्य और सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
तो यही है आज के लिए धर्म।
यही धर्म है आज के लिए।
श्वेतकेतु ने इसे सही समय पर लागू किया।
बाल विवाह।
एक समय था जब धर्मशास्त्र के अनुसार वर की आयु वधू से दो या तीन गुना होनी चाहिए थी।
ऐसा मत समझो कि पच्चीस वर्ष की लड़की की शादी पचहत्तर वर्ष के वृद्ध से होती थी।
आठ वर्ष की लड़की की शादी सोलह या अठारह वर्ष के लड़के से होती थी।
सोलह या अठारह इसलिए, क्योंकि उस समय वह वेदाध्ययन पूरा करके गुरुकुल से लौटता था।
उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना होता था।
नियम यह था कि यदि लड़की अपने पिता के घर सयानापन प्राप्त कर लेती थी, युवावस्था में प्रवेश कर लेती थी, तो पिता को भ्रूणहत्या का पाप लगता था और उसे प्रायश्चित्त करना पड़ता था।
यहाँ तक कि यदि युवावस्था प्राप्त करने के बाद एक वर्ष के भीतर उसके लिए वर न ढूंढा जाए, तो उस लड़की को स्वयं अपने लिए वर चुनने का पूरा अधिकार दिया गया था।
लेकिन क्या यह आज संभव है।
आज बाल विवाह के नाम पर लड़कियाँ बेची जाती हैं।
आज कुछ माता-पिता ऐसे हैं।
तो क्या इसे रोकना चाहिए या नहीं।
अवश्य रोकना चाहिए।
क्योंकि कलियुग में कुछ मनुष्यों की नीयत बदल गई है।
हमारी बेटियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर यह कानून बनाना आवश्यक था।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि पहले जो होता था वह गलत था।
जमाना बदला, नीयत बदली, तो नियम भी बदले।
श्वेतकेतु की घटना धर्म में परिवर्तन को कैसे दिखाती है?
यह घटना बताती है कि धर्म स्थिर नहीं होता। परिस्थितियों के अनुसार नियम बनते और बदलते हैं। श्वेतकेतु ने देखा कि पुराना नियम नई स्थिति में संतुलन नहीं दे रहा। इसलिए उसने नया नियम घोषित किया। यही व्यावहारिक धर्म की पहचान है।
क्या किसी व्यक्ति को धर्म बदलने का अधिकार हो सकता है?
उस काल में अधिकार तप और विवेक से जुड़ा था। जिसे समाज मार्गदर्शक मानता था, उसकी घोषणा स्वीकार होती थी। यह शक्ति मनमानी नहीं थी। यह उत्तरदायित्व के साथ जुड़ी हुई थी।
क्या आज ऐसा अधिकार किसी को मिल सकता है?
नहीं, क्योंकि आज व्यवस्था सामूहिक और विधिक है। नियम व्यक्तिगत घोषणा से नहीं बदलते। अब संस्थागत प्रक्रिया जरूरी है। यही समय का अंतर है।
आज पति-पत्नी की पारस्परिक वफादारी क्यों अनिवार्य है?
आज परिवार छोटा हो गया है। सहारा देने वाले लोग आसपास नहीं होते। हर तनाव सीधे दंपती पर पड़ता है। इसलिए भरोसा और वफादारी ही स्थिरता देती है।
क्या पहले वफादारी की आवश्यकता नहीं थी?
पहले सामाजिक संतुलन बड़ा था। भावनात्मक दबाव कई लोगों में बंट जाता था। इसलिए नियम अलग थे। आवश्यकता बदलने पर नियम भी बदले।
अगर वफादारी न हो तो क्या होगा?
छोटे परिवार में अस्थिरता तुरंत बच्चों पर असर डालती है। सुरक्षा और मानसिक संतुलन टूटता है। इसलिए आज यह मूल आधार है। यह व्यावहारिक सत्य है।
बाल विवाह के पुराने नियम किस आधार पर बने थे?
वे उस समय की सामाजिक और शैक्षिक व्यवस्था से जुड़े थे। आयु, शिक्षा और आश्रम-प्रणाली संतुलित थी। नियम का उद्देश्य शोषण नहीं था। व्यवस्था अलग थी।
क्या उस समय लड़कियों के पास कोई अधिकार नहीं था?
नहीं, अधिकार मौजूद थे। निर्धारित समय में विवाह न होने पर स्वयं वर चुनने का अधिकार था। यह तथ्य अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। संदर्भ समझना जरूरी है।
फिर आज बाल विवाह को पूरी तरह गलत क्यों माना जाता है?
क्योंकि आज उसका स्वरूप बदल गया है। अब उसमें नीयत और व्यवहार विकृत हो चुके हैं। सुरक्षा खतरे में है। इसलिए नियम बदलना आवश्यक हो गया।
क्या पुराने नियमों को गलत कहना उचित है?
नहीं, वे अपने समय के अनुसार उचित थे। उन्हें आज के मानदंड से नहीं तौला जा सकता। संदर्भ के बिना निर्णय अन्याय होगा। यह बौद्धिक त्रुटि है।
तो नियम बदलने का सही आधार क्या है?
नीयत, परिस्थिति और प्रभाव। जब ये बदलते हैं, नियम बदलते हैं। यही धर्म का जीवंत स्वरूप है। स्थिरता नहीं, संतुलन लक्ष्य है।
क्या यही दृष्टि आज के धर्म के लिए पर्याप्त है?
हाँ, क्योंकि यही समाज को सुरक्षित रखती है। अंधा पालन नहीं, विवेकपूर्ण आचरण जरूरी है। यही आज का धर्म है।
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