न संरोहति वाक् क्षतम्

न संरोहति वाक् क्षतम्

संरोहत्यग्निना दग्धं वनं परशुना हतम् |
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक् क्षतम् ||

 

आग से जला हुआ या कुल्हाडी से कटा हुआ वन भी कभी न कभी वापस उगकर पहले जैसे बन सकता है | पर अगर हम ने अपने शब्दों से किसी को एक बार नीचा दिखाया तो फिर हमारी वाणी वापस पहले जैसे नहीं हो सकती | इसलिए किसी को नीचा दिखाना नहीं चाहिए | एक बार वाक् का मूल्य गिर गया तो वह कभी नहीं बढेगा |

 

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