धृतराष्ट्र के ऊपर भीमसेन का क्रोध

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धृतराष्ट्र के ऊपर भीमसेन का क्रोध

पतिव्रता रत्न द्रौपदी पंच पाण्डवों की पत्नी बनीं और द्रौपदी से उन्हें पांच पुत्र उत्पन्न हुए। अर्जुन की दूसरी पत्नी सुभद्रा थीं, जो भगवान श्री कृष्ण की बहन थीं। उन दोनों का पुत्र अभिमन्यु था।

कुरुक्षेत्र युद्ध में द्रौपदी के सभी पुत्र और अभिमन्यु, सभी मारे गए। अभिमन्यु की पत्नी महाराजा विराट की पुत्री उत्तरा थीं। कुरुक्षेत्र युद्ध के अंत में कुरु वंश का एकमात्र उत्तराधिकारी उत्तरा के गर्भ में शेष था। उसे भी द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने गर्भ में ही मार दिया। बाद में श्री हरि ने अपनी दिव्य शक्ति से उसे पुनः जीवित कर दिया। उसका नाम परीक्षित रखा गया। कुरु वंश के परिक्षीण हो जाने के बाद जन्म लेने के कारण उसका नाम परीक्षित पड़ा।

अपने सौ पुत्रों के मारे जाने से धृतराष्ट्र और गांधारी अत्यंत दुखी हो चुके थे। युधिष्ठिर दिन-रात उनकी सेवा करने लगे। विदुर भी अपने भाई धृतराष्ट्र के पास ही रहते थे। युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को पिता के समान मानकर उनकी सेवा करते थे।

लेकिन भीमसेन का क्रोध कभी शांत नहीं हुआ। जब भी अवसर मिलता, वह धृतराष्ट्र पर कठोर वचनों से प्रहार करता। वह कहता कि इस अंधे के सभी पुत्रों को उसने मार डाला है। उसने दुश्शासन का रक्त पिया है। उसे कोई लज्जा नहीं है और वह यहां बैठकर युधिष्ठिर का अन्न कुत्ते की तरह खा रहा है।

युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को सांत्वना देते थे और कहते थे कि इन बातों को न सुनें, भीम मूर्ख है। अठारह वर्षों तक धृतराष्ट्र वहां रहे। इसके बाद उन्होंने जंगल जाने की इच्छा प्रकट की।

यह उस समय के लोगों के दृष्टिकोण को दर्शाता है। आज कहा जाता है कि वृद्धावस्था में कोई कष्ट नहीं होना चाहिए, पेंशन, बीमा और बुजुर्गों के लिए सुविधाएं होनी चाहिए। लेकिन उस समय राजा और महाराजा भी पोते के जन्म के बाद सब कुछ छोड़कर तपस्या के लिए जंगल चले जाते थे। अधिकार, शक्ति और राज्य छोड़ देना सरल नहीं था, लेकिन वे ऐसा करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि ये सब मूल्यहीन हैं।

आज लोग कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते। पचहत्तर वर्ष का पिता संपत्ति के लिए अपने पुत्रों से मुकदमा लड़ता है। व्यापार सौंप देने के बाद भी फिर से नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहता है। यही कलियुग की मूर्खता बताई गई है।

भीमसेन ने युद्ध में मरे सभी लोगों का अंतिम संस्कार कर दिया, लेकिन कौरवों का नहीं किया। धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से प्रार्थना की कि वे अपने पुत्रों का अंतिम संस्कार करना चाहते हैं और इसके बाद जंगल जाना चाहते हैं। लेकिन उनके पास इसके लिए कोई धन शेष नहीं था। विदुर ने भी यह इच्छा व्यक्त की कि यह कार्य हो जाना चाहिए।

युधिष्ठिर ने सभी परिवारजनों को बुलाकर कहा कि वे अपने ज्येष्ठ पिता धृतराष्ट्र को उनके पुत्रों के श्राद्ध के लिए धन प्रदान करेंगे। यह बात भीमसेन को पसंद नहीं आई।

  • कुरु वंश में उत्तराधिकारी का बचना क्यों महत्वपूर्ण माना गया है?
    क्योंकि पूरे वंश का भविष्य उसी एक जीवन पर निर्भर था। युद्ध ने लगभग पूरी पीढ़ी को समाप्त कर दिया था। ऐसे में उत्तराधिकारी का बचना निरंतरता का प्रतीक बना। यही कारण है कि उस घटना को विशेष महत्व दिया गया।

  • उत्तराधिकारी को पुनः जीवित करने की घटना क्या दर्शाती है?
    यह वंश की पूर्ण समाप्ति को रोकने का संकेत है। कथा यह बताती है कि जब तक उद्देश्य शेष हो, तब तक समाप्ति नहीं होती। यह निरंतरता के सिद्धांत को सामने लाती है।

  • क्या इसे केवल भावनात्मक घटना कहा जा सकता है?
    नहीं, यह कथा के ढांचे में आवश्यक मोड़ है। इसके बिना आगे का इतिहास संभव नहीं होता। इसलिए यह संरचनात्मक रूप से आवश्यक घटना है।

  • युधिष्ठिर का धृतराष्ट्र के प्रति व्यवहार क्या दर्शाता है?
    यह कर्तव्य और करुणा का उदाहरण है। शत्रु पक्ष से होने पर भी उन्होंने सेवा को नहीं छोड़ा। उन्होंने संबंध को रक्त से नहीं, धर्म से परिभाषित किया। यही उनकी पहचान है।

  • युधिष्ठिर की सेवा लोगों को प्रेरित क्यों करती है?
    क्योंकि यह प्रतिशोध के स्थान पर संयम दिखाती है। जीत के बाद भी विनम्र रहना सरल नहीं होता। यही कठिनता इसे प्रेरक बनाती है।

  • क्या यह व्यवहार व्यावहारिक था?
    हां, क्योंकि इससे शेष समाज में स्थिरता बनी। प्रतिशोध केवल नई शत्रुता पैदा करता है। युधिष्ठिर ने यही टाला।

  • भीमसेन का क्रोध कथा में क्यों रखा गया है?
    क्योंकि वह मानवीय प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है। सभी लोग समान दृष्टि नहीं रखते। यह विविध मानसिकताओं को दिखाता है।

  • भीम के कठोर शब्द क्या दर्शाते हैं?
    वे अधूरे शोक और दबे हुए आक्रोश को दर्शाते हैं। युद्ध का प्रभाव केवल मृत्यु तक सीमित नहीं रहता। यह भावनात्मक घाव भी छोड़ता है।

  • क्या भीम का व्यवहार अनुचित था?
    यह नैतिक रूप से कठोर था, पर मनोवैज्ञानिक रूप से समझा जा सकता है। यह आदर्श नहीं, यथार्थ को दिखाता है।

  • धृतराष्ट्र का वनगमन का निर्णय क्या दर्शाता है?
    यह त्याग और स्वीकार का संकेत है। उन्होंने सत्ता से चिपके रहने का मार्ग नहीं चुना। यह उस युग की मानसिकता को दर्शाता है।

  • आज के समय से इसकी तुलना क्यों की गई है?
    ताकि दृष्टिकोण का अंतर स्पष्ट हो सके। आज सुविधा केंद्र में है, तब त्याग केंद्र में था। यह तुलना सोच को झकझोरती है।

  • क्या यह त्याग सरल था?
    नहीं, यह अत्यंत कठिन था। लेकिन कठिन होने के बावजूद उसे चुना गया। यही इसे विशेष बनाता है।

  • कौरवों के श्राद्ध को लेकर विवाद क्यों हुआ?
    क्योंकि घाव अभी ताजे थे। न्याय और करुणा के बीच टकराव था। यही कारण है कि विरोध उत्पन्न हुआ।

  • युधिष्ठिर द्वारा धन देने का निर्णय क्या दर्शाता है?
    यह करुणा और कर्तव्य दोनों का संतुलन दिखाता है। उन्होंने व्यक्तिगत भावना से ऊपर उठकर निर्णय लिया। यही उनकी विशेषता है।

  • भीमसेन को यह निर्णय क्यों अस्वीकार्य लगा?
    क्योंकि उनके लिए स्मृति अभी भी पीड़ा से भरी थी। क्षमा का समय उनके लिए नहीं आया था। यही मानवीय सीमा को दर्शाता है।

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देवी भागवत

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