
भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को भीष्म पितामह के पास ही भेजा था, उनके धर्म-संबंधी शंकाओं के दूर करने के लिए।
भीष्मजी शर-शय्या पर लेटे थे।
भीष्मजी ने धर्म और अपहरण को धर्म की दृष्टि से कैसे सामंजस्य में रखा, यह पूर्ण रूप से हमें शायद ही समझ में आए।
लेकिन दो-तीन बातों को समझ लेना यहाँ आवश्यक है।
धर्म जो है, धर्म के नियम जो हैं, धर्म की मर्यादाएँ जो हैं, ये कालगति के अनुसार बदलते रहते हैं।
ये सब शाश्वत नहीं हैं।
ये मनुष्य और मनुष्य, मनुष्य और देवता, मनुष्य और अन्य प्राणी, और मनुष्य और प्रकृति के बीच सुगम व्यवहार के लिए बनाए जाते हैं।
ये बदलते ही रहते हैं।
इन्हें बदलना चाहिए, और बदलते ही रहना चाहिए।
द्वापर युग कब समाप्त हुआ था—कम से कम पाँच हजार साल पहले।
उस समय की सामाजिक और व्यवहारिक परिस्थितियाँ आज जैसी नहीं हैं।
हमारा आज का दृष्टिकोण कितना आगे-पीछे सोच सकता है।
पचास साल पीछे और पचास साल आगे—ज्यादा से ज्यादा।
हमारी दूर-दृष्टि और पश्च-दृष्टि बहुत सीमित है—अधिकतम पचास से सौ साल।
जो पुल पचास साल पहले बनाए गए, जो सड़के बनीं, बस पचास साल में पता चल रहा है कि छोटे पड़ गए।
नए पुल, नई सड़के बनाई जा रही हैं—फोर लेन, सिक्स लेन, आठ लेन।
पचास साल बाद पता चलेगा कि ये भी पर्याप्त नहीं हैं।
बस इतनी ही है हमारी दूर-दृष्टि।
इससे ज्यादा कर भी नहीं सकते।
आज सौ लेन का रास्ता नहीं बना सकते।
जैसे-जैसे जरूरत पड़ेगी, बनाते जाएंगे।
कलियुग में जिन नियमों को सख्ती से लागू करना है, वे द्वापर युग से भिन्न रहेंगे ही।
क्योंकि कलियुग में स्वभावतः मनुष्य कानून का कम पाबंद होता है।
मनुष्य में क्रूरता, स्वार्थ और अधर्म बढ़ते ही जाते हैं—कलियुग में।
कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ।
कोई आरोप नहीं कर रहा हूँ।
चतुर्युग का लक्षण ही ऐसा है।
भीष्म द्वापर में रहे।
और ये जितने नियम हैं, ये द्वापर युग की सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार हैं।
ये कलियुग में लागू नहीं हो सकते।
ऐसा कहा भी नहीं गया है।
जो अभी भी मनु स्मृति या अन्य स्मृतियों के नियमों को ज्यों का त्यों पकड़े बैठे हैं, उन्हें यह बात समझनी चाहिए।
न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति—स्त्री को स्वतंत्रता का अधिकार नहीं है।
ये सब नियम कुछ सीमित समय के लिए हैं।
जैसे दंगे के समय कर्फ्यू लगाया जाता है।
उसकी वैधता कुछ घंटों या कुछ दिनों के लिए होती है।
स्त्री स्वातंत्र्य की बात आती है तो देखो।
मनु स्मृति कहती है—न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।
लेकिन पाण्डु ने कुन्ती से क्या कहा।
जब उन्हें पता चला कि वे स्वयं संतान उत्पन्न नहीं कर सकते, उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि नियोग जैसे मार्ग अपनाकर अन्य किसी से गर्भवती बनो।
ताकि वंश आगे बढ़े।
कुन्ती चौंक गई।
उसने कहा—आपके मुख से यह अधर्म की बात कैसे निकली।
पाण्डु ने कहा—यह अधर्म नहीं है, यही धर्म है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने यही कहा है।
पति-पत्नी के बीच वफादारी का नियम तो बाद में आया, ऐसा पाण्डु ने कहा।
श्वेतकेतु के समय से ही यह मर्यादा चल रही है।
पहले पूर्ण रूप से स्त्री स्वतंत्र थी।
जिसके साथ जाना है जाए, जिसके साथ रहना है रहे, जिससे गर्भवती बनना है बने।
यह निर्णय करने का अधिकार केवल नारी का ही था।
फिर यह कब बदला।
समाज ने इसे बुरी दृष्टि से कब देखना शुरू किया।
श्वेतकेतु के समय से।
धर्म के नियम समय के साथ क्यों बदलते हैं?
धर्म के नियम व्यवहार को सुगम बनाने के लिए बनाए जाते हैं। समाज, प्रकृति और मानव स्वभाव बदलता रहता है। स्थिर नियम बदलती परिस्थितियों में टकराव पैदा करते हैं। इसलिए नियमों में संशोधन आवश्यक होता है। यही व्यावहारिक धर्म की पहचान है।
क्या धर्म को स्थायी मानना गलत है?
धर्म का उद्देश्य स्थिर नहीं, संतुलित व्यवहार है। जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो वही नियम बाधा बन सकते हैं। इसलिए नियम स्थायी नहीं, उद्देश्य स्थायी होता है। यह भेद समझना जरूरी है।
अगर नियम न बदलें तो क्या समस्या होगी?
पुराने नियम नई स्थितियों में अन्याय पैदा करेंगे। समाज में जड़ता आएगी। व्यवहार और नियमों में टकराव होगा। यही कारण है कि परिवर्तन आवश्यक है।
युग परिवर्तन से नियमों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
हर युग की सामाजिक स्थिति अलग होती है। द्वापर की मर्यादाएँ कलियुग में लागू नहीं हो सकतीं। नियम उस समय की मानसिकता के अनुसार बने होते हैं। युग बदलने पर उनका स्वरूप बदलना स्वाभाविक है।
क्या कलियुग के लिए अलग नियम जरूरी हैं?
हाँ, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बदल चुका है। अनुशासन और प्रवृत्तियाँ पहले जैसी नहीं रहीं। इसलिए नियमों की कठोरता और प्रकृति बदलनी पड़ती है। यही व्यावहारिक दृष्टि है।
क्या यह धर्म का पतन कहलाएगा?
नहीं, यह धर्म का अनुकूलन है। उद्देश्य वही रहता है, साधन बदलते हैं। परिवर्तन पतन नहीं, समायोजन है। इसे समझना जरूरी है।
सीमित दृष्टि का उदाहरण सड़कों से कैसे समझाया गया है?
सड़कें वर्तमान जरूरत के अनुसार बनती हैं। भविष्य की पूरी जरूरत आज नहीं जानी जा सकती। समय के साथ उन्हें चौड़ा करना पड़ता है। यही सीमित मानव दृष्टि का उदाहरण है।
क्या सौ लेन की सड़क आज बनाना तर्कसंगत होगा?
नहीं, क्योंकि आवश्यकता अभी नहीं है। संसाधन और उपयोग दोनों व्यर्थ होंगे। इसलिए निर्णय वर्तमान जरूरत से जुड़ा होता है। यही विवेक है।
क्या यह उदाहरण धर्म पर भी लागू होता है?
हाँ, धर्म के नियम भी आवश्यकता आधारित होते हैं। समय के साथ उनका विस्तार या संशोधन होता है। यही कारण है कि नियम स्थिर नहीं रखे जाते। तुलना पूरी तरह संगत है।
मनु स्मृति के नियमों को सीमित क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे विशेष काल और परिस्थिति के लिए बनाए गए थे। वे सार्वकालिक नहीं थे। उनका उद्देश्य सामाजिक संतुलन था। समय बदलने पर उनकी वैधता सीमित हो जाती है।
कर्फ्यू का उदाहरण क्यों दिया गया है?
कर्फ्यू आपात स्थिति के लिए होता है। वह स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकता। उसी तरह कुछ नियम अस्थायी होते हैं। यह तुलना नियमों की प्रकृति समझाती है।
क्या ऐसे नियमों को आज लागू करना उचित है?
नहीं, क्योंकि परिस्थिति बदल चुकी है। बिना संदर्भ के नियम लागू करना अन्याय होगा। विवेक के बिना पालन धर्म नहीं होता। यही तर्क है।
पाण्डु और कुन्ती का संवाद क्या दर्शाता है?
यह दिखाता है कि धर्म स्थिर नहीं था। उस समय नियोग स्वीकार्य था। वंश की निरंतरता को धर्म माना गया। यह सामाजिक प्राथमिकताओं को दिखाता है।
क्या यह स्त्री स्वतंत्रता का प्रमाण है?
हाँ, उस काल में निर्णय का अधिकार स्त्री के पास था। संबंधों की मर्यादा बाद में बनी। यह इतिहास का स्पष्ट संकेत है। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
तो फिर बाद में इसे अधर्म क्यों माना गया?
सामाजिक दृष्टि बदली। मर्यादाएँ कड़ी हुईं। नियंत्रण को नैतिकता कहा जाने लगा। यही परिवर्तन श्वेतकेतु के समय से शुरू हुआ।
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