
रामचरितमानस के भाषा का चौदहवां मंगलाचरण।
जथा सु अंजन अंजिदृक साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखहिं सैल बन भूतल भूरि निदान॥
आध्यात्मिक जगत में तीन प्रकार के लोग होते हैं - साधक, सुजान और सिद्ध। साधक वह होते हैं जो किसी लक्ष्य को पाना चाहते हैं, पर उन्हें यह पता नहीं होता कि क्या पाना है। सुजान वे हैं जिन्हें यह पता है कि क्या पाना है, पर उन्होंने अभी तक पाया नहीं है और उसे पाने के लिए प्रयत्नशील हैं। सिद्ध वे हैं जो पा चुके हैं।
सुजान एक विशेष प्रकार का काजल होता है जो औषधियों और मन्त्रों से सिद्ध किया जाता है। उसे लगाने से अदृश्य वस्तुएँ भी दिखाई देने लगती हैं — जैसे जल के अंदर विद्यमान मूँतिया, पर्वत के अंदर छिपे हुए खनिज, भूमि के नीचे जल का स्रोत, वन में छिपी औषधियाँ, या नागबिल में छिपी नागमणि। यह दिखने का कारण वह मन्त्रित अंजन है जो आँखों में लगा होता है। जो देख रहा है, उस व्यक्ति की कोई विशेष सामर्थ्य नहीं होती; यह सामर्थ्य अंजन में होती है। चाहे कोई सिद्ध पुरुष लगाए या सामान्य व्यक्ति, सबको अदृश्य वस्तुएँ दिखने लगती हैं।
ऐसे ही साधक, सुजान या सिद्ध — कोई भी हो — जब इस अंजन के समान गुरु के चरणों की रज को प्रणाम करता है, तो उसे अपनी अपेक्षित वस्तु मिल जाती है, अपना लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। साधक को सुजान होने का मार्ग मिलता है और ज्ञान प्राप्त होता है। सुजान अपने लक्ष्य तक पहुँच पाता है, मोक्ष को प्राप्त करता है। सिद्ध को भी सब मिल जाता है — और अंततः उसे भक्ति प्राप्त होती है।
सिद्ध को किस चीज से आनंद मिलता है? भक्ति से, राम जी पर भक्ति से, जो केवल राम जी की कृपा से मिलती है। श्री गुरु के चरणकमल की रज को प्रणाम करने से सिद्ध को राम जी की कृपा मिलती है और भक्ति प्राप्त होती है, जिससे वह राम जी में लय को प्राप्त कर लेता है।
जैसे पर्वतों में खनियाँ होती हैं, वैसे ही वेद और पुराणों में रामकथा रूपी खनियाँ होती हैं। पर्वत बहुत बड़ा होता है, और खनियाँ कहीं-कहीं छिपी होती हैं। उन खनियों को ढूँढ निकालने के लिए लोग सिद्धांजन लगाते हैं और उन्हें ढूँढ निकालते हैं। उसी तरह वेद और पुराण पर्वत के समान हैं, उनमें राम जी का चरित्र कहीं-कहीं छिपा हुआ है। उन चरित्रों को जानने के लिए गुरु के चरणों की रज सिद्धांजन के समान है।
तुलसीदास जी ने पहले भी कहा था — 'तिलक गुणगण बस करनी'। इस गुरु के चरणरज के तिलक करने से यह राम जी के सारे गुणों को अपने वश में कर देता है, राम जी के सारे चरित्रों को प्रदान कर देता है।
ऐसे गुरु चरणों की पावन रज को मेरा नमस्कार।
गुरु चरण की रज का प्रभाव क्या है?
गुरु चरण की रज मन को निर्मल करती है और साधक को सत्य को देखने की दृष्टि देती है। जैसे सिद्ध अंजन से अदृश्य वस्तुएँ दिखती हैं, वैसे ही यह रज अंतरात्मा के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। इससे व्यक्ति भ्रम से मुक्त होकर मार्ग को स्पष्ट देख पाता है।
क्यों कहा गया है कि यह रज अंजन के समान है?
क्योंकि दोनों ही अदृश्य वस्तुओं को दृष्टिगोचर कराते हैं। अंजन बाहरी जगत की गुप्त वस्तुएँ दिखाता है, जबकि गुरु चरण की रज आत्मा और ब्रह्म की अनुभूति कराती है। दोनों ही दृष्टि को दिव्य बनाते हैं।
अगर कोई कहे कि यह केवल प्रतीक है, तो इसका क्या तर्क है?
प्रतीक होते हुए भी इसका प्रभाव वास्तविक है। श्रद्धा से जुड़ा कर्म मनोविज्ञान और आस्था की शक्ति से कार्य करता है। जैसे दवा शरीर को ठीक करती है, वैसे ही गुरु की रज मन की जड़ता को हरती है — यह प्रतीक नहीं, अनुभवजन्य सत्य है।
तीन प्रकार के साधकों में अंतर क्या है?
साधक अनजान खोज में है, सुजान को लक्ष्य का ज्ञान है पर अभी यात्रा में है, और सिद्ध ने गंतव्य पा लिया है। यह तीनों अवस्थाएँ आध्यात्मिक प्रगति के चरण हैं जो एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
क्या ये तीन अवस्थाएँ एक व्यक्ति में भी क्रमशः हो सकती हैं?
हाँ, हर साधक इन तीनों से गुजरता है। पहले अज्ञान से जिज्ञासा, फिर ज्ञान से साधना, और अंततः अनुभव से सिद्धि आती है। यह आत्मविकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
अगर कोई कहे कि सिद्धावस्था असंभव है, तो क्या उत्तर होगा?
यह असंभव नहीं, केवल दुर्लभ है। सिद्धि का अर्थ सर्वज्ञ होना नहीं, आत्मबोध पाना है। जैसे अंधेरे कमरे में दीप जलता है, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर व्यक्ति सब कुछ यथार्थ रूप में देखने लगता है।
गुरु कृपा का स्थान यहाँ क्यों महत्वपूर्ण बताया गया है?
क्योंकि केवल प्रयास से नहीं, कृपा से दृष्टि मिलती है। गुरु साधक के भीतर वह शक्ति जगाते हैं जो उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचाती है। यह कृपा ही है जो साधना को फल देती है।
कृपा और परिश्रम का संबंध क्या है?
परिश्रम पात्रता बनाता है और कृपा परिणाम देती है। बिना पात्रता के कृपा टिकती नहीं, और बिना कृपा के परिश्रम सफल नहीं होता। दोनों का मेल ही पूर्णता लाता है।
अगर कोई कहे कि गुरु चरण की रज मात्र मिट्टी है, तो क्या उत्तर होगा?
भौतिक दृष्टि से हाँ, पर आध्यात्मिक दृष्टि से यह तप, प्रेम और कृपा का प्रतीक है। जैसे तिलक केवल चंदन नहीं, बल्कि श्रद्धा का चिह्न है; वैसे ही यह रज आत्मा को जागृत करने का माध्यम है।
वेद और पुराण को पर्वत क्यों कहा गया है?
क्योंकि उनमें ज्ञान और कथा के गूढ़ रत्न छिपे हैं, जिन्हें ढूँढने के लिए साधना की दृष्टि चाहिए। हर श्लोक में अनंत अर्थ छिपे हैं जो केवल योग्य साधक को ही प्रकट होते हैं।
गुरु चरण की रज को सिद्ध अंजन क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह वही दृष्टि प्रदान करती है जो छिपे हुए सत्य को दिखाती है। जब मन शुद्ध होता है तो भीतर का प्रकाश स्वयं मार्ग दिखाने लगता है।
यदि कोई पूछे कि केवल शास्त्र पढ़ने से यह ज्ञान क्यों नहीं मिलता, तो उत्तर क्या होगा?
क्योंकि शब्द से अधिक आवश्यक है अनुभव। गुरु कृपा उस अनुभव का द्वार खोलती है, जो केवल पठन से नहीं, समर्पण से प्राप्त होता है।
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