गुरु पद का रज नेत्रों के लिये अमृत है

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गुरु पद का रज नेत्रों के लिये अमृत है

रामचरितमानस के भाषा का पंद्रहवां मंगलाचरण।
'गुरुपद रज मृदु मञ्जुल अञ्जन नयन अमिय द्रिगदोष विभञ्जन'।

गुरु के स्वच्छ और कोमल पदरज को सिद्धाञ्जन के समान नेत्रों पर लगाने से दृष्टि के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। गुरु के चरणों की धूल अत्यंत कोमल और शुद्ध होती है। 'मञ्जुल' शब्द का अर्थ है मन को हरने वाला, और यह गुरु-पद-रज सचमुच सबके मन को मोह लेता है।

गुरु के चरणकमल की रज को 'नयनामृत' कहा गया है — अर्थात यह नेत्रों के लिए अमृत के समान है। 'अमरत्व जनक द्रव्यम् अमृतम्' — जन्म लेने वालों की मृत्यु निश्चित है, और जो मृत्यु का विनाश करे वही अमृत है। जैसे मृत्यु का अंत मोक्ष से होता है, वैसे ही नेत्रों के अज्ञानरूपी मृत्यु को मिटाकर यह गुरुचरण-रज नेत्रों को मोक्ष प्रदान करती है।

यहाँ नेत्र का अर्थ बाह्य इंद्रिय नहीं, बल्कि चित्त में विद्यमान आंतरिक नेत्र है। 'नियते अने नेतिनेत्रम्' — जो मार्ग दिखाता है, वही नेत्र है। मन का यह नेत्र हमें दिशा देता है, चाहे वह सही हो या गलत; स्वयं उसे इसका बोध नहीं होता।

जब यह आंतरिक नेत्र विकृत हो जाता है, तो व्यक्ति सांसारिक सुखों में फँस जाता है। तब वह श्रीराम के चरित्र को नहीं जान पाता, न ही भक्ति को प्राप्त कर पाता। किंतु जब गुरु के चरणकमल की रज का स्पर्श होता है, तो यह आंतरिक नेत्र शुद्ध हो उठता है। वह मन को सच्चे मार्ग की ओर ले जाता है और श्रीराम के प्रति अखंड भक्ति का अनुभव कराता है।

 

यह गुरु के चरणों की रज क्या करती है?
यह रज दृष्टि के दोषों को दूर करती है और मन की दिशा को शुद्ध करती है। जैसे काजल नेत्रों की चमक बढ़ाता है, वैसे ही यह रज ज्ञान की दृष्टि को तेज करती है। इससे अज्ञान का अंधकार मिटता है और साधक का चित्त निर्मल होता है।

गुरु के चरणों की रज को अमृत क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह जन्म-मरण के चक्र में बंधे जीव को मोक्ष की दृष्टि प्रदान करती है। अमृत वह है जो मृत्यु का विनाश करे, और गुरुचरण की रज अज्ञानजन्य मृत्यु को समाप्त करती है। यह साधक की दृष्टि को स्थायी प्रकाश देती है।

अगर गुरु के चरणों की रज सिर्फ मिट्टी है तो यह इतना प्रभावी कैसे?
यह सामान्य धूल नहीं, श्रद्धा से भरी शक्ति है। गुरु के चरण वे स्थान हैं जहाँ से ज्ञान प्रवाहित होता है। जब मन विनम्रता से झुकता है, तो वही मिट्टी चेतना को जगाने वाला माध्यम बन जाती है।

आंतरिक नेत्र क्या है?
यह मन की वह दृष्टि है जो सही और गलत के बीच भेद करती है। यह बाहरी आँखों की तरह नहीं देखती, बल्कि निर्णय और दिशा देती है। जब यह दूषित होती है, तो मन मोह और भ्रम में पड़ जाता है।

गुरु के चरणों की रज इस आंतरिक नेत्र को कैसे शुद्ध करती है?
गुरु का स्मरण और उनके चरणों का वंदन मन के अहंकार को गलाता है। जब विनम्रता आती है, तब यह नेत्र पुनः निर्मल होकर सत्य को देखने लगता है। यही शुद्ध दृष्टि भक्ति और विवेक की जननी बनती है।

क्या बिना गुरु के आंतरिक नेत्र शुद्ध हो सकता है?
बहुत कठिन है। जैसे दर्पण स्वयं अपनी धूल नहीं पोंछ सकता, वैसे ही मन अपनी विकृति खुद नहीं मिटा सकता। गुरु उस करुणामय हाथ की तरह हैं जो मन के दर्पण को स्वच्छ कर देते हैं।

जब आंतरिक नेत्र दूषित होता है तो क्या होता है?
मन संसारिक सुखों की ओर भागता है, आत्मिक सत्य से दूर हो जाता है। यह भ्रमित दृष्टि उसे स्थायी शांति नहीं देती। साधक बाह्य दिखावे में उलझकर भक्ति से वंचित रह जाता है।

गुरु के चरणों की रज इस स्थिति को कैसे बदलती है?
यह भीतर की दृष्टि को पुनर्जीवित करती है। जब मन गुरु के चरणों में झुकता है, तो अहंकार टूटता है और दृष्टि भीतर की ओर मुड़ती है। वहीं से सच्चे मार्ग की पहचान होती है।

क्या यह केवल प्रतीकात्मक अर्थ है या वास्तविक अनुभव?
यह दोनों है। जो भक्ति और विनम्रता से गुरु के चरणों को प्रणाम करता है, वह भीतर से एक वास्तविक परिवर्तन अनुभव करता है। यह अनुभव किसी तर्क से नहीं, बल्कि साधना से सिद्ध होता है।

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जय श्रीराम

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