
यह सब सुनकर तुम्हारे मन में एक शंका पैदा होगी।
ये कैसे देवता हैं। देवगुरु बृहस्पति की धर्म पत्नी देखो, अपने पति के चेले के साथ रमण कर रही है। और चन्द्रदेव अपनी गुरुपत्नी के साथ रमण कर रहे हैं, जिसे महापातक माना गया है। इनको मानें हम देव?
शास्त्र कहता है –
यथा भुजङ्गाः सर्पाणामाकाशं विश्वपक्षिणाम्
विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः
एक जगह से दूसरी जगह अगर साँप को जाना है, उसे ही पता रहता है कि कैसे जाना है। तुम्हारे सोचे हुए या बताए हुए मार्ग से वह नहीं जाएगा।
एक जगह से दूसरी जगह अगर एक चिड़िया को जाना है तो उसे ही पता रहता है कि कैसे जाना है। तुम्हारे सोचे हुए या बताए हुए मार्ग से वह नहीं जाएगी।
इसी तरह, देवों के तौर-तरीकों के बारे में उन्हें ही पता रहता है।
तुम्हारी मंद बुद्धि, तुम्हारी सीमित सोच, जो हमेशा मेरा घर, मेरी पत्नी, मेरा बेटा, मेरी आमदनी, मेरी प्रगति, मेरा स्वास्थ्य, मेरी रक्षा, इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है, इससे तुम उनके बारे में अनुमान नहीं कर सकते।
उनके सही-गलत पर फैसला सुनाने की तुममें क्या सामर्थ्य है? क्या देखा है तुमने?
इसलिए कहा है – विदन्ति मार्गं दिव्यानां दिव्या एव न मानवाः। उनके मार्ग को वे ही जानते हैं, मनुष्य नहीं।
उनका दोष निकालना तुम्हारा काम नहीं है। तुम निकालो या न निकालो, उनको उससे कोई मतलब ही नहीं है। वे चुनाव लड़ने वाले नहीं हैं। उन्हें तुम्हारा मतदान नहीं चाहिए।
सनातन धर्म के ग्रंथों की खासियत यह है कि जो सच है, जो भी हुआ है, उसे साफ-साफ बताते हैं। गुरुपत्नी ने चेले के साथ रमण किया तो किया। सच को छुपाते नहीं हैं।
कोई संपादक नहीं बैठा है जो सोचे, अरे पाठने वाले क्या सोचेंगे, इसे बदलो। यहां पर TRP रेटिंग की चिंता नहीं है।
जो सच है, वह है। लोकप्रियता के लिए उसका हेर-फेर नहीं करते।
इसलिए इस धर्म को कहते हैं सनातन धर्म। क्यों ऐसा किया, शायद बाद में समझ में आएगा।
सनातन धर्म के ग्रंथ कभी झूठ नहीं कहते। सच ही कहते हैं, सच चाहे कड़वा हो।
अच्छा यही है कि ज्यादा सोचो मत। अरे, भगवान ने ऐसा क्यों किया, अपने काम से मतलब रखो।
एक बात बताओ। सीमा पर अगर जवान ने शत्रु की हत्या की तो उसे कत्ल कहोगे? वही जवान अगर गांव में आकर अपने पड़ोसी को, जिसके साथ उसका नहीं जमता, मार दिया तो?
दोनों में जान ही तो जा रही है।
यहां पर कानून के बिना स्पष्टीकरण नहीं हो सकता, जो मनुष्य का ही बनाया हुआ है, जो बदलता रहता है। तो देवताओं के कार्यों के ऊपर क्या फैसला सुनाओगे।
कुछ लोगों का काम यही है। श्रीराम ने सीतादेवी को त्याग दिया, श्रीकृष्ण ने कर्ण को मार दिया। अधर्म है।
तुम क्या जानते हो धर्म और अधर्म के बारे में कि इतना फैसला सुना रहे हो। खुद का चाल-चलन संभलता नहीं अपने से, और भगवान का दोष निकालने निकले।
एक और बात – न देवचरितं चरेत्। धर्मशास्त्र में यह नहीं कहा है कि भगवान का अनुकरण करो। मनुष्य और देवताओं का व्यवहार एक जैसा होना जरूरी नहीं है। यह सोच अपक्व है, बचपना है।
वैसे भी इन घटनाओं के अंदर परम सत्य को ढूंढने मत जाओ।
भगवान विष्णु ने क्या कहा। मैं उस माया शक्ति के अधीन हूं, मुझसे ये सब कराती है वह शक्ति। क्यों, उस शक्ति को ही पता है।
उस घटना को देखो। लक्ष्मीजी भगवान को, स्वयं अपने पति को, श्राप देती हैं। क्यों? क्योंकि बाद में जाकर हयग्रीव नामक दानव की मृत्यु भगवान द्वारा हो सके।
हयग्रीव को वर किसने दिया? देवी ने।
ब्रह्माजी क्या पूछते हैं देवी मां से। ये सब आप क्यों कराती हैं? मुझे जगत का स्रष्टा आप ही बनाती हैं, उसके बाद मुझे मारने को दानवों को मेरे पीछे आप ही छोड़ देती हैं। कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
इन लीलाओं का कारण ढूंढने जाओगे तो कोई उत्तर नहीं मिलेगा। इनमें सही-गलत ढूंढने जाओगे तो नहीं मिलेगा। इनमें युक्ति ढूंढने जाओगे तो नहीं मिलेगा।
एक निर्देशक एक पिक्चर बनाता है। उस पिक्चर से उसका स्वभाव पता चल पाएगा? कोई संबंध ही नहीं रहेगा।
देवताओं की लीलाएं और उनके सही स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इन घटनाओं का कोई मतलब नहीं है। मैं इतना ही कह रहा हूं कि इन घटनाओं के पीछे जो हमें ऊपर-ऊपर से दिखाई पड़ रहा है, वह नहीं है।
और इनमें युक्ति ढूंढना, इनमें सही-गलत का फैसला करना, मनुष्य की बस की बात नहीं है।
शेर जब हिरन को मारकर कच्चा खाता है तो हम इसे सहज ही मानते हैं। अगर कोई आदमी तुम्हारे सामने एक हिरन को कच्चा खाते हुए देखा जाए तो क्या लगेगा।
जैसे शेर और आदमी में फर्क है, वैसे ही भगवान और आदमी में भी फर्क है। दोनों के नियम एक नहीं हैं।
और भी वचन हैं शास्त्र में।
अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्
ये जो भी देवताओं के कार्य हैं, ये हमारे सोच के बाहर हैं। इनमें युक्ति मत ढूंढो। तर्क-वितर्क से कभी इनमें स्पष्टता या अंतिमता नहीं मिलेगी।
देवताओं के आचरण को मनुष्य की नैतिकता से क्यों नहीं परखा जा सकता?
देवताओं की कार्य-प्रणाली मानव जीवन की सीमाओं में बंधी नहीं होती। मनुष्य की सोच परिवार, लाभ, सुरक्षा और शरीर तक सिमटी रहती है। इसी दायरे से बाहर की क्रियाओं को वही मापदंड लगाकर आंकना गलत निष्कर्ष देता है। जैसे अलग जीवों के अलग नियम होते हैं, वैसे ही अलग स्तर की सत्ता के भी होते हैं। इसलिए तुलना ही आधारहीन हो जाती है।
अगर कुछ घटनाएं अजीब लगें तो उन्हें कैसे समझें?
पहले यह स्वीकार करना होगा कि हर बात हमारी समझ में आना जरूरी नहीं। जो दृश्य दिखता है, वही पूरा सत्य नहीं होता। समय और व्यापक संदर्भ से कई बातें स्पष्ट होती हैं। धैर्य रखने से भ्रम कम होता है।
अगर समझ नहीं आता तो उसे गलत क्यों न मानें?
समझ की सीमा से बाहर होना गलत होने का प्रमाण नहीं है। छोटे अनुभव से बड़े तंत्र का निर्णय नहीं किया जा सकता। विज्ञान में भी कई सत्य पहले समझ से बाहर थे। इसलिए अज्ञान को निर्णय का आधार बनाना तर्कहीन है।
शास्त्र घटनाओं को बिना सजावट के क्यों बताते हैं?
शास्त्रों का उद्देश्य प्रसन्न करना नहीं, सत्य दिखाना है। जो घटित हुआ, उसे ज्यों का त्यों रखा गया है। इससे सीख लेने का अवसर मिलता है। छिपाने से भ्रम बढ़ता है, स्पष्टता नहीं। यही दीर्घकालीन परंपरा की मजबूती है।
क्या ऐसा लिखने से लोगों में भ्रम नहीं फैलता?
भ्रम तब फैलता है जब आधा सत्य या बदला हुआ सत्य दिया जाए। सीधे तथ्य पाठक को सोचने की जगह देते हैं। समय के साथ समझ परिपक्व होती है। सजावटी कथा तात्कालिक आकर्षण देती है, स्थायी समझ नहीं।
क्या सत्य हमेशा कठोर ही होता है?
कई बार सत्य असहज लगता है क्योंकि वह हमारी अपेक्षा से टकराता है। पर वही हमें सोचने और बढ़ने पर मजबूर करता है। आसान लगने वाली बातें हमेशा सही नहीं होतीं। इसलिए कठोरता सत्य का दोष नहीं है।
मनुष्य को दूसरों के कर्मों पर निर्णय देने से क्यों बचना चाहिए?
निर्णय देने के लिए पूरा ज्ञान, संदर्भ और परिणाम जानना जरूरी है। मनुष्य के पास यह समग्र दृष्टि नहीं होती। अधूरी जानकारी से दिया गया निर्णय अन्याय करता है। इसलिए संयम ही बुद्धिमानी है।
फिर सही-गलत का विचार कैसे करें?
अपने आचरण और कर्तव्य पर ध्यान देना पहला कदम है। जहां अधिकार और उत्तरदायित्व स्पष्ट हों, वहीं निर्णय करें। बाहर की घटनाओं में जिज्ञासा रखें, निर्णय नहीं। इससे मानसिक संतुलन बना रहता है।
क्या यह सोच जिम्मेदारी से भागना नहीं है?
नहीं, यह भूमिका की स्पष्टता है। हर स्तर की अलग जिम्मेदारी होती है। जो हमारे हाथ में है, उसी पर निर्णय देना उचित है। बाकी पर अटकना ऊर्जा की हानि है।
एक ही कर्म अलग परिस्थिति में अलग क्यों माना जाता है?
कर्म का अर्थ परिस्थिति, उद्देश्य और परिणाम से तय होता है। सीमा पर किया गया कार्य और निजी द्वेष से किया गया कार्य समान नहीं होते। बाहरी समानता आंतरिक भिन्नता को नहीं मिटाती। इसलिए संदर्भ अनिवार्य है।
तो नियम सबके लिए समान क्यों नहीं हो सकते?
समान नियम अलग परिस्थितियों में अन्याय कर सकते हैं। इसलिए नियम संदर्भ के अनुसार बनते हैं। व्यवहारिक जीवन में यही संतुलन है। कठोर समानता व्यावहारिक नहीं होती।
क्या यह मनमानी को बढ़ावा नहीं देता?
नहीं, क्योंकि संदर्भ का अर्थ स्वेच्छा नहीं होता। स्पष्ट उद्देश्य और परिणाम से नियम तय होते हैं। बिना तर्क के छूट नहीं दी जाती। यह व्यवस्था है, मनमानी नहीं।
क्या देव-आचरण का अनुकरण करना उचित है?
शास्त्र मनुष्य को ऐसा करने की शिक्षा नहीं देते। मनुष्य की क्षमता और उत्तरदायित्व अलग हैं। अनुकरण से भ्रम और पतन होता है। सीख और अनुकरण में भेद समझना जरूरी है।
तो फिर इन कथाओं से सीख क्या है?
सीख सिद्धांतों से लें, क्रियाओं की नकल से नहीं। मूल्य, धैर्य और विवेक ग्रहण करें। बाहरी कर्म को हूबहू दोहराना उद्देश्य नहीं है। यही संतुलित मार्ग है।
अगर अनुकरण नहीं तो वर्णन क्यों?
वर्णन व्यापक सत्य दिखाने के लिए है। हर कथा बहुस्तरीय संकेत देती है। समझने वाला सार लेता है, नकल नहीं करता। यही परंपरा की गहराई है।
क्यों कहा जाता है कि कुछ बातें तर्क से परे हैं?
हर विषय तर्क की सीमा में नहीं आता। तर्क साधन है, अंतिम सत्य नहीं। कुछ वास्तविकताएं अनुभव और स्वीकार से समझी जाती हैं। वहां तर्क अटक जाता है।
तो तर्क का स्थान कहां है?
जहां मानव आचरण, नीति और निर्णय हों, वहां तर्क आवश्यक है। सीमाओं के भीतर तर्क स्पष्टता देता है। सीमाओं के बाहर वह भ्रम पैदा करता है। सही स्थान पर सही साधन जरूरी है।
क्या तर्क छोड़ना अंधविश्वास नहीं है?
नहीं, यह साधनों की पहचान है। हथौड़े से हर काम नहीं होता। तर्क का सम्मान करते हुए उसकी सीमा मानना विवेक है। अंधविश्वास तब होता है जब बिना सोच स्वीकार किया जाए।
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