
वंदवु खलजन सेश सरोषा।
सहस बधन बरनई परदोषा॥
पुनि प्रनववु पृतुराज समाना।
पर अघ सुनही सहस दसकाना॥
बहुरि सक्रसम विनवउ तेही।
संतन सुरानी कहत जेही॥
वचन वज्र जेही सदा पियारा।
सहस नयन परदोष निहारा॥
इंद्र को देवों की सेना सबसे प्रिय है। वैसे ही खल जनों को मदिरा आदि नशा प्रिय है। सारा मादक पदार्थ ही इस जगत में उनका प्रिय है। इंद्र देवताओं की सेना के भरोसे निश्चिंत रहते हैं, वैसे ही खलजन मादक पदार्थों की सेना समूह के भरोसे निश्चिंत रहते हैं।
इंद्र पर कोई आक्रमण करे तो वे अपनी सेना का आश्रय लेते हैं। उसी प्रकार जब दुष्टों की अवस्था बिगड़ जाती है, तो वे मादक पदार्थों का आश्रय लेते हैं। इंद्र को और एक वस्तु प्रिय है — वज्र, वज्रायुध। वैसे ही दुष्ट जनों को वज्र के समान कठोर वचन प्रिय हैं। इंद्र वज्र से अपने शत्रुओं के शरीर को विदीर्ण करते हैं, वैसे ही दुष्टजन अपने वज्र समान वचनों से साधुजनों के हृदय को विदीर्ण करते हैं।
इंद्र अपना समय परब्रह्म स्वरूप श्रीरामजी के चिंतन में बिताते हैं, वैसे ही दुष्टजन अपना समय दूसरों की गलतियों के चिंतन में नष्ट करते हैं। इंद्र जैसे देवसेना और वज्रायुध के अध्यक्ष हैं, वैसे ही दुष्टजन दोष, मद और अवगुण के अध्यक्ष हैं।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने दुर्जनों की तुलना तीन व्यक्तियों से की है — सहस्रमुख शेषजी, राजा पृतु और सहस्राक्ष इंद्र। इनमें शेषजी पाताललोक के हैं, राजा पृतु भुलोक के और इंद्र स्वर्गलोक के। इससे यह स्पष्ट होता है कि दुर्जन केवल पृथ्वी पर ही नहीं, तीनों लोकों में दोष निकालने की क्षमता रखते हैं।
शेषजी, पृतुराज और इंद्र — इन तीनों के पास सहस्र संख्या में विशिष्ट गुण हैं। शेषजी के पास हजार मुख, पृतुराज के पास दस हजार कान और इंद्र के पास हजार आंखें हैं। परंतु ये तीनों गुण एक साथ दुर्जनों में मिलते हैं। वे दूसरों की बुराई दस हजार कानों से सुनते हैं, हजार आंखों से देखते हैं और हजार मुखों से फैलाते हैं।
ये दूसरों के दोष निकालने के लिए ही जीते हैं। इसलिए मैं उन्हें सच्चे भाव से प्रणाम करता हूं। तुलसीदासजी ने यहां यह दिखाया है कि आशुरी संपत्ति भी भगवान से ही उत्पन्न है, इसलिए उन्होंने दुष्टजनों को भी शुभ भाव से प्रणाम किया है।
दुष्टों की प्रवृत्ति का मूल अर्थ क्या है?
दुष्ट व्यक्ति अपने सुख का आधार भौतिक वस्तुओं और इंद्रिय सुखों को मानते हैं। वे दूसरों की गलतियों में आनंद लेते हैं और उनकी निंदा से ही अपने अस्तित्व को पुष्ट महसूस करते हैं। यह प्रवृत्ति आत्मिक अज्ञान से उत्पन्न होती है।
दुष्ट व्यक्ति ऐसा क्यों करते हैं?
क्योंकि वे भीतर की शांति खो चुके होते हैं, इसलिए बाहरी दोष खोजकर मन की अस्थिरता को ढकने की कोशिश करते हैं। यह आत्मवंचना का एक तरीका है, जिसमें व्यक्ति अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए दूसरों को छोटा दिखाता है।
क्या यह सिर्फ बुराई है या किसी कारण का परिणाम?
यह प्रवृत्ति केवल बुराई नहीं, बल्कि अधूरे आत्मज्ञान का परिणाम है। जब व्यक्ति अपनी चेतना का विस्तार नहीं कर पाता, तो वह सीमित सुखों और दूसरों की गलतियों में उलझ जाता है।
इंद्र, शेष और पृतुराज के उदाहरण से क्या समझाया गया है?
तुलसीदासजी ने तीनों के गुणों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया — इंद्र की आंखें, शेष के मुख और पृतु के कान। ये बताते हैं कि दुष्ट व्यक्ति हर ओर से जानकारी जुटाते हैं, देखते हैं, सुनते हैं और फिर उसे फैलाते हैं।
क्या इन उदाहरणों का अर्थ वास्तविक रूप से लिया जाए?
नहीं, ये प्रतीक हैं। इनसे तुलसीदासजी ने यह समझाया कि दुष्ट का मन एक ही समय में बहुत दिशाओं में भटकता है — देखने, सुनने और बोलने की विकृति में।
दुष्टों के पास ये गुण क्यों हैं?
क्योंकि नकारात्मकता भी ब्रह्मांड की रचना का हिस्सा है। जैसे अग्नि जलाती है पर प्रकाश भी देती है, वैसे ही दुष्टजन नकारात्मकता के माध्यम से समाज को सजग करते हैं।
तुलसीदासजी ने दुष्टों को प्रणाम क्यों किया?
क्योंकि उन्होंने देखा कि दुष्ट भी उसी सृष्टिकर्ता की योजना का अंग हैं। वे सज्जनों की परीक्षा लेकर उन्हें और दृढ़ बनाते हैं।
क्या यह व्यावहारिक दृष्टि से संभव है कि कोई दुष्टों को प्रणाम करे?
यह बाहरी प्रणाम नहीं, आंतरिक स्वीकृति का प्रतीक है — कि सृष्टि में सब कुछ किसी उद्देश्य से बना है, और द्वेष रखने से आत्मशांति नष्ट होती है।
दुष्टों के प्रति शुभ भाव रखने का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि हम उनके व्यवहार को न अपनाएं, लेकिन उनके अस्तित्व को अस्वीकार भी न करें। वे हमें विवेक, धैर्य और आत्मसंयम सिखाने वाले अदृश्य शिक्षक हैं।
कठोर वचन को वज्र से क्यों जोड़ा गया है?
क्योंकि जैसे वज्र शरीर को चोट पहुंचाता है, वैसे ही कटु वचन हृदय को घायल करते हैं। दुष्ट अपने शब्दों से वही नाश करते हैं जो इंद्र अपने अस्त्र से करते हैं।
क्या शब्दों की चोट शारीरिक पीड़ा से भी गहरी होती है?
हाँ, क्योंकि शब्द मन और आत्मा को प्रभावित करते हैं। बाहरी घाव भर जाते हैं, लेकिन कटु वचन की गूंज लंबे समय तक बनी रहती है।
तुलसीदासजी ने यह तुलना क्यों दी?
ताकि मनुष्य यह समझ सके कि वाणी का उपयोग सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। जिस तरह वज्र देवता का अस्त्र है, वैसे ही वाणी मनुष्य का अस्त्र है — उसे संयम और करुणा से चलाना चाहिए।
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