
उदासीन अरिमितहित सुझन जरहि खल रीति जानी।
पानी जुग जोरी बिनती करइ सप्रेम प्रीति बखानी।।
मैं अपनी दिसि कीन निहोरा, तिन निज औरन ला उबभोरा।
बायस पली अही अति अनुरागा, होइ न निर्मल कबहुंहि कागा।।
मित्र हो, शत्रु हो या कोई तीसरा — किसी का भी हित हो रहा हो, दुष्ट जनों को अच्छा नहीं लगता।
सबके हित में ये जलते हैं, यही इनकी रीति है।
मैं उन्हें अच्छे मन से, प्रेमपूर्वक प्रणाम करता हूँ।
मैं अपनी ओर से प्रार्थना करूँगा, फिर भी दुष्ट जन मेरे विषय में दोष बोलेंगे,
क्योंकि अपने स्वभाव को छोड़ना अत्यंत कठिन होता है।
चाहे हम कौवे को कितना भी प्यार से पालें, वह गंदी वस्तुओं को खाना नहीं छोड़ता।
दुष्ट जनों को दूसरों का भला बुरा लगता है और पर-हानि देखकर आनंद आता है।
साधारण मनुष्य अपने शत्रु का हित देखकर दुखी होते हैं,
और मित्र का हित देखकर प्रसन्न होते हैं।
पर दुष्ट जनों को इसमें कोई भेद नहीं दिखता —
शत्रु हो या मित्र, किसी का भी हित इन्हें खलता है।
यही उनका स्वभाव है।
फिर भी, ये भी श्रीरामजी के ही स्वरूप हैं।
इस जगत के हर चेतन में श्रीरामजी ही विद्यमान हैं।
इस कारण से मैं उन्हें भी प्रेमपूर्वक प्रणाम करता हूँ।
तुलसीदासजी अपने ग्रंथ में दुष्ट जनों को क्यों प्रणाम करते हैं?
क्योंकि वे जानते हैं कि दुष्ट लोग, चाहे कितना भी सम्मान दो, गलती निकालना नहीं छोड़ते।
गलती निकालना उनका स्वभाव है।
फिर भी तुलसीदासजी उन्हें प्रणाम करके अपने उदार स्वभाव का परिचय देते हैं।
इनको प्रणाम करना कौवे को खीर खिलाने जैसा है —
खीर मिलेगी तो वह खीर भी खाएगा,
परंतु गंदी वस्तुएँ भी साथ में चुगेगा।
ऐसा नहीं कि खीर खाने से वह गंदगी खाना छोड़ देगा,
क्योंकि वह उसका स्वभाव है।
उसी प्रकार, दुष्ट जनों को सम्मान देने का अर्थ यह नहीं
कि वे निंदा करना छोड़ देंगे।
सम्मानित होते हुए भी वे निंदा ही करेंगे,
क्योंकि यह उनका स्वभाव है।
फिर भी, उन्हें देव की तामसिक शक्ति मानकर
गोस्वामी तुलसीदासजी प्रणाम करते हैं
और यहाँ इस खलजन-वंदना का समापन करते हैं।
सज्जन व्यक्ति दुष्टों को भी प्रणाम क्यों करता है?
क्योंकि वह जानता है कि हर चेतन में ईश्वर का अंश है। सज्जन व्यक्ति दूसरों की प्रकृति से नहीं, बल्कि अपने संस्कारों से प्रेरित होकर कार्य करता है। उसका प्रणाम दुष्ट के लिए नहीं, ईश्वर के लिए होता है जो उसमें भी उपस्थित है।
अगर दुष्ट अपमान करें तो क्या प्रणाम करना उचित है?
हाँ, क्योंकि प्रणाम करने से हम उनके स्वभाव को नहीं, अपने संयम को साबित करते हैं। दूसरों के आचरण से हमारी मर्यादा तय नहीं होती, हमारा भाव ही हमारा मापदंड होता है।
क्या दुष्ट को प्रणाम करने से वह सुधर जाएगा?
जरूरी नहीं। जैसे कौआ खीर खाने पर भी गंदगी नहीं छोड़ता, वैसे ही दुष्ट अपनी निंदा की प्रवृत्ति नहीं छोड़ते। लेकिन प्रणाम करने वाला व्यक्ति अपने भीतर की करुणा को सशक्त बनाता है।
दुष्टों को दूसरों का सुख क्यों खलता है?
क्योंकि उनका मन ईर्ष्या और अहंकार से भरा होता है। उन्हें लगता है कि दूसरे का उत्थान उनके अपमान के समान है। यही भाव उन्हें सदा अशांत रखता है।
ऐसे दुष्टों से कैसे निपटना चाहिए?
शांत और सजग रहकर। उनके आचरण को प्रतिक्रिया का कारण न बनाएं। जितनी दूरी रखी जाए, उतनी ही हमारी ऊर्जा सुरक्षित रहती है।
क्या उन्हें सुधारना संभव है?
बहुत कठिन है, क्योंकि परिवर्तन तभी होता है जब व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार करे। जब तक यह स्वीकृति नहीं आती, तब तक कोई उपदेश असर नहीं करता।
तुलसीदास जी ने दुष्टों को ईश्वर का रूप क्यों माना?
क्योंकि उन्होंने संपूर्ण सृष्टि को ईश्वर की अभिव्यक्ति समझा। अच्छा और बुरा — दोनों ही ब्रह्म के विविध रूप हैं। दुष्ट में भी ईश्वर की तामसिक शक्ति कार्यरत होती है।
क्या यह दृष्टि व्यवहार में लागू की जा सकती है?
हाँ, यदि व्यक्ति समदृष्टि का अभ्यास करे। यह समझना कि हर अनुभव किसी आंतरिक शिक्षा के लिए है, हमें शांति देता है।
क्या यह दृष्टि कमजोरी का प्रतीक नहीं है?
नहीं, यह परिपक्वता का संकेत है। जो व्यक्ति दूसरों की नकारात्मकता के बावजूद संतुलित रह सकता है, वही आत्मबलवान होता है।
कौवे के उदाहरण से क्या शिक्षा मिलती है?
यह कि स्वभाव बदलना बहुत कठिन है। चाहे कितनी भी उत्तम चीज़ दी जाए, कौआ अपनी आदत के अनुसार ही व्यवहार करेगा।
क्या इसका अर्थ है कि प्रयास व्यर्थ हैं?
नहीं, प्रयास दूसरों को नहीं, स्वयं को सुधारने के लिए होना चाहिए। यदि हमारा आचरण निर्मल है, तो दूसरों की गंदगी हमें नहीं छूती।
क्या ऐसा स्वभाव ईश्वर की योजना का हिस्सा है?
हाँ, संसार में विविधता इसलिए है कि मनुष्य विवेक और सहनशीलता सीखे। दुष्ट और सज्जन दोनों इस शिक्षण प्रक्रिया के माध्यम हैं।
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