
रामभक्ति, ब्रह्मज्ञान और अज्ञानविनाश — ये तीनों संतों के संगम से प्राप्त होते हैं।
हमें यदि गंगा स्नान, यमुना स्नान और सरस्वती स्नान करना हो, तो तीनों नदियों तक अलग-अलग जाकर स्नान करना पड़ेगा। इसका एक और उपाय है — त्रिवेणी संगम में जाकर, जहाँ तीनों नदियाँ मिलती हैं, वहाँ एक साथ स्नान करना।
इसी प्रकार अज्ञान विनाश, ब्रह्मज्ञान और रामभक्ति अलग-अलग साधनों से प्राप्त हो सकते हैं, परंतु संतों की वाणी के द्वारा यह सब एक ही स्थान पर, एक ही उपाय से मिल जाते हैं।
'सब ही सुलभ सब दिन सब देषा, सेवत सादर समन कलेषा।'
तुलसीदास जी अब भी जंगम तीर्थ रूप संतों का ही वर्णन कर रहे हैं। ये संतजन तीर्थ बनकर सभी देशों में, सभी दिनों में सबके लिए सुलभ हैं।
पहले ही तुलसीदास जी ने बताया था कि तीर्थों को ढूंढकर हमें जाना पड़ता है, तीर्थ स्वयं नहीं आते।
परंतु संतजन हमारे हित के लिए हमें ढूंढकर आ जाते हैं।
ये संतजन अहंकार से रहित होते हैं।
जगत में हमें अपना कार्य जिस किसी से कराना हो, उसे ढूंढकर जाना पड़ता है।
यहाँ भी कार्य हमारा ही है — हमारे पापों का नाश होना चाहिए, हमें मुक्ति प्राप्त होनी चाहिए, हमें राम जी पर भक्ति आनी चाहिए।
परंतु ये परोपकारी, दयासागर संतजन स्वयं हमें ढूंढकर आते हैं और उपदेश देकर चले जाते हैं।
पुण्यतीर्थों की तुलना में संतों के पास एक और गुण होता है।
पुण्यतीर्थ हर समय उपलब्ध नहीं रहते — बारिश कम हो तो उनका बहाव कम हो जाता है, कभी-कभी वे पूरी तरह सूख भी जाते हैं।
परंतु संतजन हर ऋतु में, हर परिस्थिति में उपलब्ध रहते हैं।
कुछ गाँवों या शहरों में पुण्यनदियाँ होती ही नहीं, वहाँ के लोगों को स्नान के लिए दूर जाना पड़ता है।
परंतु ऐसे देश-प्रदेशों में भी संतजन उपलब्ध हो जाते हैं।
संतजनों का मन स्वच्छ होता है।
इसलिए जो उन्हें आदरपूर्वक नमस्कार करता है, उनके कष्ट और क्लेश वे मिटा देते हैं।
संतों के संग से तीनों लाभ कैसे मिलते हैं?
संतों की उपस्थिति और वाणी में ज्ञान, भक्ति और अज्ञान विनाश तीनों समाहित हैं। जैसे त्रिवेणी संगम में तीन नदियों का जल एक साथ मिलता है, वैसे ही संत वचन से मनुष्य के भीतर तीनों सिद्धियाँ एक साथ जागृत होती हैं।
क्या केवल संतों के पास जाने से ही यह संभव है?
हाँ, यदि श्रद्धा और ग्रहणशीलता हो तो संतों के संग से यह सब स्वतः प्राप्त होता है। वे आत्मा में वह एकता जगा देते हैं जहाँ ज्ञान और भक्ति अलग नहीं रहते।
कोई पूछे कि यह केवल कल्पना तो नहीं?
नहीं, क्योंकि इतिहास में हर युग में संतों के संपर्क से ही सामान्य जन का रूपांतरण हुआ है — तुलसीदास, कबीर, मीरा सब इसके प्रमाण हैं।
तीर्थ और संत में क्या अंतर है?
तीर्थ स्थान स्थावर हैं — हमें वहाँ जाना पड़ता है; पर संत जंगम तीर्थ हैं, वे स्वयं आकर कल्याण करते हैं। उनकी गति ईश्वरीय प्रेरणा से होती है, मानव इच्छा से नहीं।
क्यों कहा गया कि संत स्वयं ढूंढकर आते हैं?
क्योंकि वे दूसरों के उद्धार के लिए जीते हैं। जैसे बादल प्यासे खेतों पर स्वयं बरसते हैं, वैसे ही संत थके मनों को खोजकर आते हैं।
क्या यह व्यवहार में सच हो सकता है?
हाँ, हर युग में हम देखते हैं — जहाँ कोई सच्चा साधक भीतर से पुकारता है, किसी न किसी रूप में संत या गुरु वहाँ पहुँच जाते हैं।
संत सदा सुलभ क्यों कहे गए हैं?
क्योंकि वे अहंकाररहित और करुणामय होते हैं। तीर्थों की भाँति वे ऋतु या परिस्थिति से बंधे नहीं होते; उनका आशीर्वाद हर समय बहता है।
क्या उनका सुलभ होना सबके लिए समान है?
हाँ, वे किसी भेदभाव से मुक्त हैं। जो भी सादर नमस्कार करता है, उसकी आत्मा में वे कृपा का प्रकाश भर देते हैं।
संदेह हो कि हर कोई क्यों नहीं लाभान्वित होता?
क्योंकि पात्रता श्रद्धा और विनम्रता से बनती है। जो हृदय बंद रखता है, वह सूर्य के सामने भी अंधकार में रहता है।
संतों के मन की स्वच्छता का क्या प्रभाव पड़ता है?
उनके मन की निर्मलता दूसरों के भीतर भी शांति फैलाती है। उनके शब्द और दृष्टि मनुष्य के क्लेशों को धो डालते हैं।
क्या यह मानसिक प्रभाव मात्र है या आध्यात्मिक भी?
दोनों है। मन को शुद्ध कर वे आत्मा को उसके स्वभाव से जोड़ते हैं — वहीं अज्ञान का नाश होता है।
कोई तर्क दे कि यह केवल मनोविज्ञान है?
मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि शुद्ध संगति से चेतना बदलती है। संत उसी नियम को परम स्तर पर लागू करते हैं — वे मन को परम के साथ संतुलित करते हैं।
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