
तुलसी दास जी गुरु के चरण में विद्यमान धूली को नमस्कार कर रहे हैं। गुरु के चरण में विद्यमान धूली पुष्प में विद्यमान पराग के समान है। इसलिए यहां पर 'पदपदुमपरागा' कहा गया है। पराग का गुण होता है प्रजनन। वैसे ही गुरु के चरण की धूली का गुण है ज्ञान का प्रजनन। इस धूली को प्रणाम करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
यह पराग दिखने में छोटा सा है पर फल और वृक्ष की उत्पत्ति में यही प्रमुख भूत वस्तु है। यही उनके उत्पत्ति का कारण भूत है। वैसे ही गुरु के पदपद्म में विद्यमान पराग ज्ञान और उसका फल मोक्ष को दिलाने में कारण भूत है। यही पराग ज्ञान और मोक्ष को दिलाता है। ऐसे गुरु के पदपराग को मैं नमस्कार करता हूं।
मधुमक्खी आदि पराग को ग्रहण करते हैं। इसी से वृक्ष और फल उत्पन्न होते हैं। वैसे गुरु के चरणों में विद्यमान धूली को मैं ग्रहण करता हूं, उसका नमस्कार करता हूं।
तुलसीदास जी सबसे पहले देवताओं की वंदना करते हैं। फिर वे सोचते हैं कि देवताओं की वंदना मेरे जैसे तुच्छ कैसे कर सकता है। इसको सोचते हुए वे गुरु के चरण की वंदना करते हैं। उसके बाद वे सोचते हैं कि मैं गुरु के चरण की वंदना के लिए भी योग्य नहीं हूं। खुद को अयोग्य मानकर वे गुरु के चरण में विद्यमान धूली का वंदन करते हैं। तुलसीदास जी खुद को अयोग्य मानते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अयोग्य हैं। यह उनका विनय है।
इस अहंकार त्याग का एक और उदाहरण है। कविकुलगुरु कालिदास जी अपने रघुवंश महाकाव्य में कहते हैं - 'क्व सूर्य प्रभवो वंशः क्व चाल्प विशया मतिः तितीर्षुर्दुस्तरं मोहम् धुडुपेन अस्मि सागरम्।' रघुराम जी का वंश साक्षात भगवान सूर्य से उत्पन्न है। वह वंश कहां और मेरी अल्प बुद्धि कहां। मैं एक छोटी सी नाव के साथ बड़े महासागर को पार करने का सोच रहा हूं जो बहुत दुस्तर है।
'मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्। प्राप्तं सुलभ्ये फले लोभात् दुवाभिरिव वामनः।' मैं मंद होते हुए भी कवियों के समान यश को प्राप्त करने के लिए कोशिश कर रहा हूं, जैसे कोई नाटा ऊंचे पेड़ में लगे हुए फल को तोड़ने की आशा रखता हो। वैसे मेरी स्थिति है।
ऐसे अहंकार त्याग करते हैं कालिदास जी। ये दोनों, कालिदास जी और तुलसीदास जी, श्रेष्ठ कवि हैं। इनकी विद्वत्ता का कारण है इनका अहंकार त्याग, इनका सरल स्वभाव, इनका विनयपूर्वक व्यवहार। इसलिए ये दोनों महान कवि हैं। ऐसे कवि सर्वगुण संपन्न तुलसीदास जी के द्वारा लिखे गए रामचरितमानस को पढ़ने से जीवन में सारी इष्टार्थ सिद्धि अवश्य होगी।
रामाय नमः.
गुरु के चरणों की धूल ज्ञान का स्रोत क्यों कही गई है?
गुरु के चरणों की धूल वही सूक्ष्म तत्त्व है जो अज्ञान को दूर कर ज्ञान का प्रजनन करती है। जैसे पराग बीज बनकर वृक्ष को जन्म देता है, वैसे ही यह धूल आत्मज्ञान की उत्पत्ति का कारण बनती है।
अगर धूल इतनी सूक्ष्म है तो इसका प्रभाव कैसे होता है?
सूक्ष्म होने पर भी यह चेतना के भीतर परिवर्तन लाती है। श्रद्धा और समर्पण के साथ स्पर्श करने पर यह भीतर की अंधकार को मिटा देती है।
क्या यह प्रतीक मात्र है या वास्तविक प्रभाव भी होता है?
यह प्रतीक भी है और अनुभव भी। परंपरा में यह भाव रखा गया कि शिष्य जब विनम्र होकर गुरु की चरणधूलि ग्रहण करता है, तो उसमें ज्ञान ग्रहण करने की पात्रता जागती है।
तुलसीदास जी ने देवताओं की बजाय गुरु को पहले क्यों वंदित किया?
क्योंकि वे जानते थे कि देवत्व तक पहुंचने का मार्ग गुरु से होकर जाता है। देवताओं की वंदना भी गुरु की कृपा से ही सार्थक होती है।
क्या यह किसी परंपरा का पालन था या निजी भावना?
यह व्यक्तिगत अनुभूति थी जो परंपरा से जुड़ गई। उन्होंने देवता और गुरु में कोई भेद नहीं रखा, बल्कि गुरु को साक्षात ज्ञानस्वरूप माना।
क्या देवताओं से पहले गुरु की वंदना उचित है?
हाँ, क्योंकि देवत्व का अनुभव गुरु के मार्गदर्शन से ही संभव है। बिना गुरु के ज्ञान अधूरा रहता है।
तुलसीदास जी ने स्वयं को अयोग्य क्यों कहा?
उन्होंने यह आत्मविनय से कहा, अहंकार त्याग की भावना से। यह ज्ञानियों का स्वभाव है कि वे स्वयं को पात्र नहीं मानते।
क्या वे वास्तव में अयोग्य थे?
नहीं, यह उनका विनम्र भाव था। वे जानते थे कि विनम्रता ही भक्त और कवि की शोभा है।
क्या आत्मविनय ज्ञान की अनिवार्य शर्त है?
हाँ, क्योंकि जब तक व्यक्ति का अहंकार जीवित है, तब तक सत्य को ग्रहण नहीं किया जा सकता।
कालिदास जी के उदाहरण से क्या शिक्षा मिलती है?
कि महानता विनम्रता में है। उन्होंने अपने ज्ञान को नहीं, अपनी सीमाओं को पहले स्वीकार किया।
दोनों कवियों की समानता क्या है?
दोनों ने अपने आरंभ में ही आत्मविनय को प्रकट किया। यह उनके लेखन की आत्मा बना।
क्या अहंकार त्याग से ही विद्वत्ता आती है?
हाँ, क्योंकि ज्ञान तभी फलता है जब मन विनीत और अहंकार-रहित हो।
तुलसीदास जी के ग्रंथ को सिद्धि देने वाला क्यों कहा गया है?
क्योंकि वह भक्ति, विनम्रता और ज्ञान का संगम है। उसके पाठ से मन की अशुद्धि दूर होकर जीवन में सिद्धि आती है।
क्या मात्र पाठ से सिद्धि मिलती है या भाव आवश्यक है?
भाव आवश्यक है। श्रद्धा और भक्ति के बिना शब्द केवल ध्वनि रह जाते हैं।
क्या यह सिद्धि सांसारिक है या आध्यात्मिक?
यह दोनों है — जीवन में शांति, धर्म और मोक्ष तीनों की प्राप्ति इसमें सम्मिलित हैं।
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