
रामचरितमानस के छठे मंगलाचरण से तुलसीदास जी ने गुरुपदपद्म के धूली को नमस्कार किया था। फिर भी उस रज की महिमा समाप्त नहीं हो रही। इसलिए भाषा के सातवें, आठवें और नववें मंगलाचरण से भी उसका वंदन कर रहे हैं तुलसीदास जी।
रामचरितमानस के भाषा का सातवां मंगलाचरण – अमियमूरिमय चूरण चारू समान सकल भवरुज परिवारू। मेरे गुरु के चरण कमल का रज अमृतमय जड़ी के चूर्ण के समान है, जो भवरोगों के परिवार को और कामादियों को नाश करता है। जैसे संजीवनी के सेवन से कोई मृत्यु से अतीत हो जाता है, वैसे ही गुरु के चरणकमल की धूली के सेवन से शिष्य अज्ञान से अतीत हो जाता है।
यही मानवों के भवरोगों को नाश करके उन्हें दिव्यस्वरूप प्राप्त कराता है। गुरु के चरणकमल की धूली 'संजीवनी' नामक जड़ी मृत शरीर में भी जीवन ला सकती है। वैसे ही यह गुरु चरण की धूली जड़ बुद्धि को भी ज्ञान दे सकती है। यह गुरु के चरण का रज अमृत स्वरूप है। अमियमूरिमय, अमृतमय।
जैसे अमृत के सेवन के बाद मरण संभव नहीं है, वैसे ही इस अमृत स्वरूप रज के सेवन के बाद जो ज्ञान मिलता है, उसका क्षय कभी नहीं होता, उस ज्ञान की मृत्यु नहीं होती। यह चूर्ण चारू है। चारू मतलब – चरति चित्ते मतौ वा इति चारू हु।
बड़े-बड़े विद्वानों के भी गुरु होते हैं और उनके मन और बुद्धि में सदा यह गुरुचरण का रज विचरण करता है। यह चूर्ण भाव रोगों का भी विनाशक है। 'भाव' शब्द के बहुत सारे अर्थ होते हैं – जन्म, भविष्य, क्षेम, संसार – इनमें मुख्य हैं।
यह चूर्ण भाव रोगों का विनाशक है, अर्थात यह जन्म आदि से विद्यमान रोगों का विनाश करने वाला है। यह चूर्ण भविष्य में आने वाले रोगों का विनाश करने वाला है। यह चूर्ण क्षेम, मोक्ष के मार्ग में विद्यमान रोगों का विनाश करने वाला है। 'भव' यानी 'संसार' भी होता है। यह चूर्ण संसार में विद्यमान समस्त रोगों का विनाशक है।
'भव' शब्द का एक और अर्थ है 'भगवान' शिव जी। 'भव' शिव जी का भी नाम है – 'व्योमकेशो भवो भीमः स्थाणुरुद्रो मापतिः'। अर्थात 'भव' के समान शिव जी जैसे सभी रोगों का विनाश करते हैं, वैसे ही यह चूर्ण भी सभी रोगों का विनाश करने वाला है। ऐसे गुरु के पद में विद्यमान अमृतमय चूर्ण को मेरा नमस्कार।
गुरुचरण की धूल को अमृतमय चूर्ण क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह शिष्य को अज्ञानरूपी मृत्यु से उबारता है, जैसे संजीवनी मृत शरीर को जीवन देती है। यह धूल चेतना में स्थायी रूप से प्रकाश भरती है।
गुरु की धूल को अमृत मानने में क्या विशेष बात है?
अमृत से शरीर अमर नहीं होता, पर यह चूर्ण आत्मा को अज्ञान से मुक्त कर देती है — यह उससे भी ऊँची अमरता है।
क्या यह सिर्फ उपमा है, या कुछ वास्तविक प्रभाव होता है?
यह केवल उपमा नहीं है। गुरु के चरणों में श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति अपने भीतर परिवर्तन को स्वयं अनुभव करता है — यह अनुभूति-आधारित ज्ञान है।
यह चूर्ण भवरोगों का नाश कैसे करता है?
भवरोग = जन्म-मरण का चक्र। गुरुचरण की रज शिष्य के भीतर वैराग्य और विवेक को जागृत करती है, जिससे वह चक्र टूटता है।
क्या यह केवल मानसिक शांति देता है या वास्तव में मुक्त करता है?
यह केवल मन को शांत नहीं करता, बल्कि शिष्य को मोक्ष के मार्ग पर स्थिर करता है — यह आत्मज्ञान की ओर बढ़ने का साधन है।
किस आधार पर कहा जा सकता है कि यह सभी रोगों का नाश करता है?
जिनमें श्रद्धा, विनय और सेवा होती है, वे गुरुचरण की धूल से अपने ही मन के दोषों और भ्रमों को मिटाते हैं — यही असली रोग हैं।
'भाव' शब्द के अनेक अर्थ क्यों लिए गए?
क्योंकि यह शब्द जीवन की अनेक अवस्थाओं को दर्शाता है — जन्म, संसार, भविष्य, मोक्ष की स्थिति। रज इन सभी से उबारती है।
इतने अर्थों को जोड़ने का उद्देश्य क्या है?
गुरुचरण की रज को एक सीमित इलाज नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन की औषधि के रूप में प्रस्तुत करना।
क्या यह भाषाई खेल है या वास्तविक जीवन में भी असर करता है?
यह केवल शब्दों का खेल नहीं है — जिन्हें गुरु की कृपा और धैर्य से मार्गदर्शन मिला, वे जानते हैं कि यह रज कैसे अंतर को बदल देती है।
गुरुचरण की रज को शिव के समान क्यों कहा गया है?
क्योंकि जैसे शिव सभी दोषों और संकटों को हरते हैं, वैसे ही यह चूर्ण सभी मानसिक, आध्यात्मिक विकारों का नाश करता है।
क्या शिव और गुरु की तुलना उचित है?
यह तुलना गुण के आधार पर है — दोनों चेतना के विकास का कारण बनते हैं।
शिव को उदाहरण के रूप में लेने का तात्पर्य क्या है?
ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गुरुचरण की रज कोई साधारण चीज नहीं, वह शिवतत्त्व के समान कल्याणकारी है।
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