तेहि करि विमल विवेक विलोचना।
बरनउँ रामचरित भवमोचना॥
गुरुचरणकमल के पावन रज के अंजन से आंतरिक नेत्र को स्वच्छ करके भवसंसार से छुड़ाने वाले श्रीरामचरितमानस का मैं वर्णन करता हूं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, ऐसे श्रीरामचरितमानस के भाषा के पांचवें मंगलाचरण से लेकर इस सोलहवें मंगलाचरण तक उन्होंने गुरु के चरण की रज और गुरु के पदनख के प्रकाश का वर्णन किया। तत्वों को सही से जानने वाले लोगों की सिर्फ मोक्ष में ही इच्छा होती है। गोस्वामी तुलसीदास जी जैसे भक्तों को केवल रामभक्ति चाहिए, और कुछ नहीं। उन्हें स्पष्ट पता है कि मोक्ष कैसे पाया जा सकता है, और रामजी पर भक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है।
इनमें सबसे प्रथम है मन की शुद्धि। जब मन शुद्ध होता है, तो वह एक जगह पर स्थिर रह पाता है। उस शुद्धि के लिए उसमें विद्यमान संदेह छिन होने चाहिए। जब मन में संदेह होता है, तो वे हमें लक्ष्य तक पहुंचने नहीं देते। उन संदेहों का निवारण कर देता है यह गुरुचरणकमल का रज।
चित्तशुद्धि के बाद है संसार से मुक्ति। संसार से मुक्ति मिलने के बाद ही रामजी पर भक्ति की प्राप्ति होती है। संसार में अनेक विषयवस्तुएं हैं, जो हमें अपने में उलझा कर तत्व तक जाने नहीं देतीं। वे हमें यह विश्वास दिला देती हैं कि संसार ही सत्य है, यही परमार्थ है। उन अज्ञान वासनाओं से मुक्ति ही मोक्ष है।
उस मोक्ष को दिलाकर रामजी पर भक्ति की प्राप्ति करा देता है मेरे गुरुचरण का पवित्र रज। उसको प्रणाम करके रामजी की भक्ति पूर्ण श्रीरामचरितमानस का मैं वर्णन करता हूं।
मन की शुद्धि का महत्व क्या है?
मन शुद्ध होने पर वह स्थिर और एकाग्र होता है। जब मन स्वच्छ होता है, तो उसमें संदेह और द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। यही स्थिरता साधना की सफलता की कुंजी है। अशुद्ध मन में भक्ति और ज्ञान टिक नहीं पाते।
मन को शुद्ध कैसे किया जा सकता है?
गुरु की चरणरज के स्मरण और सेवा से मन के दोष धुल जाते हैं। यह रज साधक के भीतर विनम्रता, श्रद्धा और सत्य का भाव जगाती है। जैसे दर्पण को साफ करने से प्रतिबिंब स्पष्ट दिखता है, वैसे ही शुद्ध मन में आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है।
क्या बिना मन की शुद्धि के भी मोक्ष संभव है?
नहीं, क्योंकि मोक्ष किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन से मिलता है। जब तक मन के विकार नहीं मिटते, तब तक मुक्ति की अनुभूति नहीं होती। शुद्ध मन ही भक्ति और ज्ञान का सच्चा पात्र बनता है।
गुरुचरण की रज को पवित्र क्यों कहा गया है?
यह साधक के भीतर के अज्ञान को मिटाती है। यह रज केवल भौतिक धूल नहीं, बल्कि गुरु की करुणा और अनुभव का प्रतीक है। इससे साधक के हृदय में विवेक और श्रद्धा दोनों उत्पन्न होते हैं।
गुरु की रज का संबंध विवेक से कैसे है?
गुरुचरण की रज साधक की दृष्टि को निर्मल करती है, जिससे वह सत्य और असत्य में भेद कर पाता है। विवेक जागृत होने पर व्यक्ति संसार की माया में फँसता नहीं। इस विवेक के बिना ज्ञान केवल शब्द रह जाता है।
क्या केवल ज्ञान से मुक्ति मिल सकती है?
ज्ञान जरूरी है, परन्तु गुरु की कृपा उसके बिना अधूरी है। गुरु अनुभव का वह दीपक हैं जो ज्ञान को प्रकाश में बदलते हैं। केवल पढ़ा हुआ ज्ञान अंधकार में रखा दीपक है — गुरु उसे जलाते हैं।
संसार से मुक्ति और भक्ति में क्या संबंध है?
जब व्यक्ति संसार के मोह से मुक्त होता है, तभी सच्ची भक्ति उत्पन्न होती है। बंधन में फँसा मन ईश्वर में लीन नहीं हो सकता। मुक्ति भक्ति का द्वार खोलती है।
संसार के विषय मन को कैसे बाँधते हैं?
वासनाएँ आकर्षक दिखती हैं, पर वे व्यक्ति को बाह्य सुखों में उलझा देती हैं। जैसे कीचड़ में पैर फँस जाए तो चलना कठिन होता है, वैसे ही विषयों में फँसने से मन ऊपर नहीं उठ पाता।
क्या संसार से भागना ही मुक्ति है?
नहीं, मुक्ति भागने में नहीं, दृष्टिकोण बदलने में है। जब व्यक्ति संसार में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होता, तभी वह मुक्त कहलाता है। यही सच्ची वैराग्यता है।
तुलसीदास जी ने भक्ति को अंतिम लक्ष्य क्यों कहा?
क्योंकि भक्ति में ज्ञान और मोक्ष दोनों समाहित हैं। भक्ति वह भाव है जिसमें आत्मा पूर्ण समर्पण से ईश्वर में लीन होती है। इससे अहंकार मिटता है और हृदय में शांति का अनुभव होता है।
क्या मोक्ष से ऊँचा कुछ है?
तुलसीदास जी के अनुसार, हाँ — भक्ति। मोक्ष केवल बंधन से छुटकारा देता है, पर भक्ति आनंद देती है। मोक्ष शांति है, भक्ति प्रेम है।
गुरु के बिना भक्ति का मार्ग कैसे कठिन हो जाता है?
क्योंकि गुरु ही साधक के भीतर छिपे अंधकार को दिखाते हैं। वे केवल मार्ग नहीं बताते, साधक को अपने अनुभव से रूपांतरित करते हैं। बिना गुरु के साधना अंधेरे में तीर चलाने जैसी है।