गृहस्थाश्रमी कभी सुखी नहीं

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गृहस्थाश्रमी कभी सुखी नहीं

ब्रह्मचारी अन्न के लिये किसके पास जाता है – गृहस्थ के पास।
संन्यासी अन्न के लिये किसके पास जाता है – गृहस्थ के पास।
और वह गृहस्थ उनका सत्कार करके उनको अन्नदान करता है।
गृहस्थ इनका भी अन्नदाता है – इसलिये गृहस्थाश्रम से श्रेष्ठ अन्य कोई आश्रम नहीं है।
वसिष्ठ जैसे उत्तमोत्तम महर्षि भी गृहस्थ ही रहे हैं।

जो गृहस्थाश्रम में रहकर वेदोक्त कर्मों का अनुष्ठान करता है, उसके लिये स्वर्ग या मोक्ष कुछ भी अप्राप्य नहीं है।
धर्म के जानकार कहते हैं – आश्रमादाश्रमं गच्छेत्।
आश्रम से आश्रम क्रम से ही जाना चाहिये।

इसलिये तुम आलस्य छोड़कर गृहस्थाश्रम में जाने की तैयारी करो।
देवताओं को, पितरों को और अपने आश्रितों को संतुष्ट और तृप्त करो।
पुत्रोत्पत्ति करो, अपने पुत्र को गृहस्थी में लगाओ।
उसके बाद गृहस्थाश्रम छोड़कर वानप्रस्थ में चले जाओ।
वानप्रस्थ को पूरा करके संन्यास में चले जाओ।

जो व्यक्ति स्त्री से रहित रहता है – उसका इन्द्रिय और मन विकल हो जाते हैं।
स्त्री के सामीप्य में ही मनुष्य इन्द्रियों के और मन के ऊपर काबू पाने का अभ्यास कर पायेगा।
जिसने यह प्रायोगिक अभ्यास नहीं किया हो, उसका आत्म-नियंत्रण, इन्द्रिय-निग्रह नाजुक ही रहेगा।
कभी भी वह टूट सकता है।

विश्वामित्र महर्षि ने तीस हजार वर्षों तक जितेन्द्रिय होकर तपस्या की थी – उसके बाद भी मेनका की एक झलक से वे मोहित हो गये।
मेरे पिताजी पराशर महर्षि भी मेरी माँ को पहली बार देखने पर इतने बेचैन हो गये कि जिस नाव पर उन्हें देखा था, उसी पर उनको स्वीकार कर लिया था।

इसलिये मेरी बात मानो, किसी अच्छी मुनि कन्या से विवाह करके सनातन वैदिक धर्म का पालन करो।

शुकदेव बोले – मैं कदापि गृहस्थाश्रम को स्वीकार नहीं करनेवाला, क्योंकि यह जाल के समान है, जिससे जानवरों को और चिड़ियों को पकड़ते हैं।
इसमें फँसने से आदमी धन और धान्य के लिये व्याकुल होने लगता है, गरीबी से डरने लगता है, अपने परिवार को लेकर चिन्ताग्रस्त रहता है, लोभी बन जाता है।

किसी को तप करते हुए देखने पर इन्द्र में असुरक्षा आ जाती है, वे उस तपस्या में विघ्न डालने लगते हैं।
ब्रह्माजी कहाँ सुखी रहते हैं।
लक्ष्मी को पत्नी के रूप में पाने पर भी भगवान विष्णु कहाँ सुखी रहते हैं, दानवों से लड़ने में ही वे लगे रहते हैं।
भोलेनाथ की हालत भी कुछ अलग नहीं है।

अगर धन है तो वह डर और तनाव से नहीं सो पाता है।
अगर निर्धन है तो अपने दुख से नहीं सो पाता है।
ये सब जानते हुए भी आप मुझे गृहस्थी की ओर क्यों भेज रहे हैं।

इस धरती पर जन्म लिया है तो – गर्भ में रहते वक्त, जन्म के वक्त, बुढ़ापे में, मरण के वक्त – दुख स्वाभाविक है।
लेकिन उसके ऊपर भी गृहस्थ बनाकर और ज्यादा दुख क्यों दिलाना चाहते हैं आप मुझे।

किसी से कुछ माँगकर जीने से मरना अच्छा है।
ब्राह्मणों की अवस्था देखो – गृहस्थी की विवशता में आकर, ज्ञान होने पर भी उन्हें दान की अपेक्षा करनी पड़ती है।
इस उम्मीद में रहना पड़ता है कि कोई श्रीमान यजमान मेरा सम्मान करेगा, भरपूर दान देगा – तब जाकर उनका भी घर-गृहस्थी चलेगा।

वेदाध्ययन करने के बाद भी, शास्त्राध्ययन करने के बाद भी – उसे किसी धनिक के पास जाकर उसके हितानुसार बात करनी पड़ती है, उसे खुश करना पड़ता है।
तब जाकर उन्हें दान-दक्षिणा मिलती है।

खुद का पेट वह आराम से संभाल लेगा – उसमें इतना संयम है कि वह फल, पत्र, कन्द, मूलों से भी काम चला लेगा।
लेकिन अपने परिवार की जरूरतों के लिये उसे यह करना पड़ता है।

मुझे भी आप इस कष्ट में फेंकना चाहते हैं।
इसलिये पिताजी, मुझे कर्मकाण्ड में जाना ही नहीं है।
मुझे ज्ञानमार्ग का उपदेश दीजिये, मुझे योगमार्ग का उपदेश दीजिये।

मेरे कर्मों को – संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण – तीनों को नष्ट करने का उपाय मुझे बताइये।
जिसको अपना निद्रासुख त्याग करना है, वही विवाह करता है।
विधाता भी जिसको कष्ट देना है, उसी से विवाह कराते हैं।

व्यासजी का मन टूट गया।
अब मैं क्या करूँ।
उनके साथ यही होता रहता है, लगता है – एक और ज्ञान की बात।

व्यासजी जैसे ज्ञानी, तपस्वी के सामने भी अगर यह विवशता – 'मैं क्या करूँ' – यह बार-बार आती है, तो साधारण मानव की क्या बात है।
व्यासजी की आँखों में आँसू भरने लगे, उनका शरीर काँपने लगा।

शुकदेव बोले – माया का प्रभाव देखो।
वेदान्तशास्त्र के प्रणेता हैं मेरे पिताजी, तत्वज्ञानी हैं, वेदों को सांगोपांग जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं, पुराणों के रचयिता हैं, वेदों के विभागकर्ता हैं – देखो, क्या हालत करती है माया शक्ति उनकी भी।

शुकदेव विस्मय से चकित हो रहे थे।
लगता है मुझे उस माया शक्ति की शरण में जाना पड़ेगा।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश को भी जो मोहित कर देती है – वही हो सकती है विश्व में सबसे प्रबल।
सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापी ईश्वर भी इसकी शक्ति के वश में ही हैं।

मेरे पिताजी तो स्वयं भगवान विष्णु के अंश हैं।
उनकी हालत आज ऐसी है, जिसे देखकर लगता है कि समुद्र में किसी व्यापारी का जहाज डूब गया हो।
ऐसे शोक में डूबकर वे बैठे हैं।

यह कौन है – मैं कौन हूँ – क्या है यह भ्रम।
पंचभूतों से बने हुए इस शरीर के अन्दर यह पिता और पुत्र की भावना कहाँ से आयी।
जो भी है, यह माया तो बहुत प्रबल है – मायावियों को भी यह मोहित कर देती है।

उन्होंने व्यासजी से कहा – ऐसा शोक तो साधारण लोग करते हैं।
आप ज्ञानी हैं, दूसरों को ज्ञान देनेवाले हैं, यह आप क्या कर रहे हैं।

अभी तो मैं आपका पुत्र हूँ।
लेकिन पूर्व जन्म में आप कौन थे, मैं कौन था – कौन जानता है।
हमारे बीच कोई सम्बन्ध था या नहीं – इस बात को कौन जानता है।

ज्ञानियों के लिये यह संसार एक भ्रम मात्र है।
आप इतना शोक क्यों करते हैं।
आपको धैर्य रखना चाहिये, विवेक रखना चाहिये, शोक और इस मोहजाल को छोड़ दीजिये।

 

  • गृहस्थ आश्रम को अन्य आश्रमों से श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?
    गृहस्थ ही ब्रह्मचारी और संन्यासी दोनों का पालन करता है। अन्न, आश्रय और व्यवस्था का आधार वही बनता है। बिना गृहस्थ के कोई भी आश्रम टिक नहीं सकता। इसलिए गृहस्थ आश्रम को आधार-आश्रम कहा गया है। यह समाज की धुरी की तरह काम करता है।

  • क्या केवल त्याग से ही जीवन चलता है?
    त्याग तभी संभव है जब कोई उसे संभालने वाला हो। त्यागी भी अन्न और सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर होता है। यह निर्भरता गृहस्थ पूरी करता है। इसलिए जिज्ञासु को यह समझना चाहिए कि त्याग और गृहस्थ एक-दूसरे के पूरक हैं।

  • अगर गृहस्थ इतना ही श्रेष्ठ है, तो सबको वही क्यों न अपनाना चाहिए?
    श्रेष्ठ होने का अर्थ यह नहीं कि वही अंतिम लक्ष्य है। यह क्रम का एक आवश्यक चरण है। बिना क्रम के लिया गया त्याग असंतुलन पैदा करता है। इसलिए आश्रम व्यवस्था में क्रम को महत्व दिया गया है।


  • आश्रमों में क्रम से आगे बढ़ने की बात क्यों कही गई है?
    जीवन में परिपक्वता चरणबद्ध आती है। पहले कर्तव्य, फिर विरक्ति का अभ्यास होता है। सीधे त्याग लेने पर मन और इन्द्रियां अस्थिर रहती हैं। क्रम से चलने पर अनुभव से सीख मिलती है।

  • क्या कोई व्यक्ति क्रम तोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता?
    अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वे नियम नहीं बनते। अधिकतर लोग बिना अभ्यास के संतुलन नहीं रख पाते। क्रम जीवन को सुरक्षित दिशा देता है। यह जोखिम को कम करता है।

  • क्या यह क्रम आज के समय में भी उपयोगी है?
    आज भी मनुष्य वही है, उसकी प्रवृत्तियां वही हैं। जिम्मेदारी के बिना लिया गया त्याग आज भी टूट जाता है। इसलिए क्रम का सिद्धांत समय से ऊपर है।


  • स्त्री-संग के बिना मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण कठिन क्यों माना गया है?
    वास्तविक संयम परीक्षा से बनता है, दूरी से नहीं। साथ रहते हुए मर्यादा सीखना अभ्यास है। बिना अभ्यास का संयम कमजोर रहता है। जीवन-संग में ही आत्म-नियंत्रण मजबूत होता है।

  • क्या अकेले रहकर संयम साधना आसान नहीं होती?
    अकेले रहना परीक्षा से भागना भी हो सकता है। वहां आकर्षण सामने नहीं आता। सामने आने पर ही नियंत्रण की शक्ति परखी जाती है। इसलिए जिज्ञासु को भ्रम में नहीं रहना चाहिए।

  • इतिहास में महान तपस्वी भी क्यों डगमगा गए?
    क्योंकि वर्षों की साधना भी बिना व्यावहारिक परीक्षा के अधूरी रह जाती है। एक क्षण का आकर्षण वर्षों की तपस्या को हिला सकता है। यह मनुष्य की प्रकृति को दिखाता है। इससे सीख मिलती है, अहंकार नहीं।


  • गृहस्थ जीवन को जाल की तरह क्यों बताया गया है?
    इसमें धन, भय और चिंता लगातार घेरती रहती है। परिवार की जिम्मेदारी मन को बांधती है। व्यक्ति धीरे-धीरे लोभ और असुरक्षा में फंसता है। यह स्वतंत्रता को सीमित कर देता है।

  • क्या सभी गृहस्थ ऐसे ही दुखी रहते हैं?
    नहीं, लेकिन जोखिम सभी के लिए समान होता है। विवेक न हो तो गृहस्थ जीवन बोझ बन जाता है। सजगता हो तो वही साधना बन सकता है। प्रश्न दृष्टि का है।

  • क्या भय और चिंता केवल गृहस्थ को ही होती है?
    नहीं, पर गृहस्थ में कारण अधिक होते हैं। धन हो तो खोने का भय, न हो तो अभाव का दुख। दोनों स्थितियां नींद छीन लेती हैं। यह तर्क अनुभव से जुड़ा है।


  • ज्ञान होने पर भी ब्राह्मण को दान पर क्यों निर्भर होना पड़ता है?
    परिवार की आवश्यकताएं केवल ज्ञान से नहीं चलतीं। समाज की संरचना ने उसे दान पर आश्रित बनाया। इससे आत्मसम्मान पर भी दबाव पड़ता है। यह गृहस्थी की विवशता दिखाता है।

  • क्या यह व्यवस्था ज्ञान का अपमान नहीं है?
    यह व्यवस्था की कमी है, ज्ञान की नहीं। ज्ञान स्वयं पूर्ण है, पर जीवन की जरूरतें व्यावहारिक हैं। यह टकराव जिज्ञासु को सोचने पर मजबूर करता है।

  • क्या इसका कोई समाधान नहीं हो सकता?
    समाधान तभी होगा जब अपेक्षाएं सीमित हों। कम में संतोष सीखना होगा। तभी ज्ञान और जीवन में सामंजस्य बनेगा।


  • ज्ञानमार्ग और योगमार्ग को कर्मकांड से ऊपर क्यों रखा गया है?
    कर्मकांड बाहरी व्यवस्था है, ज्ञान आंतरिक परिवर्तन। ज्ञान से मूल बंधन टूटता है। योग से मन स्थिर होता है। दोनों मिलकर मुक्ति की दिशा देते हैं।

  • क्या कर्म किए बिना आगे बढ़ना संभव है?
    बाहरी कर्म छोड़े जा सकते हैं, पर आंतरिक साधना नहीं। ज्ञान भी एक कर्म है, पर सूक्ष्म। यह जिज्ञासा को स्पष्ट करता है।

  • क्या सभी के लिए ज्ञानमार्ग उपयुक्त है?
    नहीं, हर व्यक्ति की तैयारी अलग होती है। बिना परिपक्वता के लिया गया ज्ञानमार्ग भी भ्रम पैदा कर सकता है। इसलिए विवेक आवश्यक है।


  • माया को इतनी प्रबल शक्ति क्यों कहा गया है?
    यह संबंध और पहचान का भ्रम पैदा करती है। ज्ञानी भी भाव में डगमगा जाते हैं। यह शक्ति दृष्टि को ढक देती है। इसलिए इसे अत्यंत प्रबल कहा गया है।

  • क्या माया से बचना संभव है?
    पूरी तरह बचना कठिन है, पर पहचानना संभव है। पहचान आते ही उसका प्रभाव कम होने लगता है। यही जिज्ञासा का पहला चरण है।

  • अगर सब भ्रम है, तो प्रयास का क्या अर्थ है?
    भ्रम समझ में आने से ही प्रयास सही दिशा लेता है। बिना समझ के जीवन प्रतिक्रिया बन जाता है। समझ के साथ जीवन साधना बनता है।

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देवी भागवत

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