ईश्वर के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये?

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ईश्वर के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये?

आपकी बुद्धि पुत्र के ऊपर इतना संकेन्द्रित क्यों है।
आप तो ऐसे बरतावे कर रहे हैं जैसे इस संसार में पुत्र ही सब कुछ है।
पुत्र को देखने से भूख नहीं मिटती, उसके लिए भोजन करना पड़ता है।
पुत्र को देखने से प्यास नहीं मिटती, उसके लिए पानी पीना पड़ता है।
अजीगर्त नामक ब्राह्मण ने अपने पुत्र को राजा हरिश्चन्द्र के हाथ मूल्य लेकर बेच दिया था। पुत्र का महत्व इतना ही है।
'मेरा पुत्र, मेरा पुत्र' इस भ्रम को छोड़ दीजिए।

इस धरती नामक कर्मभूमि में जन्म पाना ही बहुत मुश्किल है। उसमें भी मनुष्य होकर, उसके ऊपर मैं एक उत्तम कुल में ब्राह्मण होकर पैदा हुआ हूँ।
मुझे नहीं व्यर्थ करना इस मौके को।

मुझे सिर्फ ऐसे ज्ञान दीजिए जिससे मैं हमेशा के लिए मुक्ति पाऊँ।

व्यासजी बोले – मेरे द्वारा विरचित भागवत पुराण पढ़ो, जो वेद के समान है।
इससे तुम्हें सत् और असत् का ज्ञान मिल जाएगा।

भगवान श्री हरि बाल मुकुन्द का रूप धारण करके वट वृक्ष के पत्र के ऊपर प्रलय जल में लेटे थे और सोच रहे थे।
मुझे इस बालक के रूप में किसने उत्पन्न किया, क्यों उत्पन्न किया और किस द्रव्य से उत्पन्न किया।
ये सब मुझे कैसे पता चलेगा।

देवी भगवती ने आधे श्लोक से इन सब सवालों का उत्तर दे दिया।
सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्।

ये सब कुछ मैं ही हूँ।
मेरे सिवा सनातन और कुछ भी नहीं है।

भगवान विस्मित हो गए – इस वचन को कौन कह रहा है।
यह कौन है – पुरुष या स्त्री या नपुंसक।

भगवान उस वचन 'सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्' का मनन करने लगे।
उसके मन ही मन दोहराने लगे।

किसी मन्त्र की या शब्द की या वचन की आवृत्ति करने से, उनमें अंतर्विष्ट जो देवता है या भाव है या तत्व है, उसका प्रत्यक्षीकरण होता है।
यह सनातन धर्म का एक मूल तत्व है, आधार तत्व है, प्रामाणिक तत्व है।

मन्त्र जाप या स्तोत्र पाठ बार-बार किया जाता है, तब जाकर साक्षात्कार होता है।
साक्षात्कार मतलब उस देवता या तत्व का सान्निध्य होना।

शब्द में इतनी शक्ति है।
शब्द रूप का साक्षात्कार कर देता है, शब्द सान्निध्य लाता है।

दुर्गा चालीसा की १००८ आवृत्ति करो, वहाँ माता दुर्गा का सान्निध्य अवश्य आएगा।

लेकिन एक बात ध्यान में रहे – जाप या पाठ सिर्फ देवता का सान्निध्य लाता है।
उसके बाद उस सान्निध्य से कैसे प्रयोजन लेना है, यह तुम्हारे हाथों में है।

१००८ आवर्तन किए, माता का सान्निध्य आया।
उठकर मुँह फेरकर चले जाओगे तो क्या लाभ होगा।

तुम्हारे घर मानो कोई मंत्री या बड़े अधिकारी आए हैं।
उनके साथ आदरपूर्वक व्यवहार करना पड़ेगा।
उन्हें तुम्हारी कठिनाइयाँ बतानी पड़ेगी, तुम्हारी समस्याओं को उनके सामने रखना पड़ेगा।
तब जाकर हल निकलेगा।

अगर तुम नहीं बताओगे तो वे सोचेंगे सब कुछ ठीक है और तुमसे कुशल मंगल की औपचारिकता करके निकल जाएँगे।

भगवान को सब पता रहता है।
जो मुझे चाहिए वह अवश्य देंगे।

क्यों देंगे।
भगवान तो लीलाएँ करते रहते हैं।
उनके लिए सब कुछ एक खेल है।
तुम्हारी पीड़ा भी उनके लिए एक खेल है।

मुँह खोलकर कहो – मैं परेशान हूँ, मुझसे सहन नहीं हो रहा है।
वे इस खेल के नियम थोड़ा बदल देंगे।

इसके लिए तुम्हारी बात उनके ध्यान में लाना पड़ेगा।
जैसे तुम दूसरे आदमी के साथ व्यवहार करते हो, वैसे ही ईश्वर के साथ भी व्यवहार करो।
खुलकर, सीधे तरीके से।

 

  • पुत्र को जीवन का केंद्र बना देना क्यों गलत दृष्टि है?
    पुत्र जीवन का एक भाग है, पूरा जीवन नहीं। केवल पुत्र पर टिके रहने से मूल कर्तव्य और लक्ष्य धुंधले हो जाते हैं। शरीर को भोजन और जल चाहिए, भावनाओं से वह नहीं चलता। संबंध सहारा दे सकते हैं, समाधान नहीं। संतुलन टूटे तो बुद्धि कमजोर होती है।

  • अगर पुत्र इतना प्रिय है तो उससे दूरी की बात क्यों कही गई?
    दूरी नहीं, आसक्ति की बात है। प्रेम ठीक है, पर मोह विवेक को बांध देता है। जब मोह हावी होता है, तब सही और गलत का भेद मिट जाता है। यही चेतावनी दी गई है।

  • क्या पुत्र को कम महत्व देना स्वाभाविक भावनाओं के विरुद्ध नहीं है?
    नहीं, यहां महत्व घटाने की नहीं, अति को रोकने की बात है। जीवन कई कर्तव्यों का मेल है, एक ही भूमिका सब कुछ नहीं। अति किसी भी दिशा में नुकसान करती है। विवेक भावनाओं का मार्गदर्शक होना चाहिए।


  • मनुष्य जन्म और अनुकूल परिस्थिति को अवसर क्यों कहा गया है?
    मनुष्य जन्म दुर्लभ है क्योंकि इसमें सोचने और चुनने की शक्ति होती है। अनुकूल कुल और शिक्षा इस शक्ति को सही दिशा दे सकते हैं। ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता। इसे व्यर्थ करना स्वयं के साथ अन्याय है।

  • इस अवसर का सही उपयोग कैसे समझा जाए?
    जब जीवन केवल भोग या मोह में न उलझे। जब प्रश्न मुक्ति, सत्य और स्थायी शांति की ओर मुड़ें। यही संकेत है कि अवसर सही दिशा में जा रहा है।

  • क्या जन्म आधारित विशेषता पर जोर देना भेदभाव नहीं है?
    यहां जन्म नहीं, साधनों की बात है। जिनके पास बेहतर साधन हैं, उनसे अधिक जिम्मेदारी अपेक्षित है। यह अधिकार नहीं, दायित्व का संकेत है।


  • मुक्ति के लिए ज्ञान को ही क्यों साधन माना गया है?
    क्योंकि अज्ञान ही बंधन का मूल है। कर्म और संबंध तब तक बांधते हैं जब तक उन्हें समझा न जाए। सही ज्ञान स्थायी भ्रम को तोड़ता है। इसलिए ज्ञान को केंद्रीय साधन कहा गया है।

  • कौन सा ज्ञान मुक्ति की ओर ले जाता है?
    जो सत् और असत् का भेद सिखाए। जो अस्थायी और स्थायी को अलग कर सके। जो बाहरी सहारों से हटाकर भीतर की समझ दे।

  • क्या केवल ज्ञान से जीवन की कठिनाइयां हल हो जाती हैं?
    ज्ञान समस्या नहीं मिटाता, दृष्टि बदलता है। सही दृष्टि से समस्या संभाली जाती है। यही वास्तविक समाधान है।


  • विचार या वाक्य के बार-बार मनन को क्यों महत्व दिया गया है?
    क्योंकि दोहराव से अर्थ गहराता है। सतही शब्द धीरे-धीरे अनुभव में बदलते हैं। मन उसी दिशा में ढलने लगता है। यह मानसिक अनुशासन की प्रक्रिया है।

  • क्या यह केवल मनोवैज्ञानिक अभ्यास है?
    हां, इसका स्पष्ट मनोवैज्ञानिक आधार है। जैसा विचार बार-बार आता है, वैसी ही प्रवृत्ति बनती है। अभ्यास से ही आंतरिक बदलाव होता है।

  • अगर केवल दोहराने से परिणाम मिलता, तो सबको क्यों नहीं मिलता?
    क्योंकि यांत्रिक दोहराव और सजग मनन अलग हैं। बिना समझ के अभ्यास खोखला रहता है। परिणाम के लिए चेतना की भागीदारी जरूरी है।


  • शब्द और विचार को शक्तिशाली क्यों माना गया है?
    क्योंकि शब्द सोच को दिशा देता है। सोच कर्म को, और कर्म जीवन को। इसलिए शब्द मूल में प्रभाव डालता है। यह अनुभवजन्य सत्य है।

  • क्या शब्द वास्तव में किसी अनुभव को जन्म दे सकते हैं?
    हां, जैसे भय या विश्वास शब्दों से ही पैदा होता है। शब्द वातावरण नहीं बदलते, व्यक्ति की प्रतिक्रिया बदलते हैं। वही अनुभव बन जाता है।

  • क्या यह तर्क प्रमाणित किया जा सकता है?
    हां, व्यवहार विज्ञान में यह स्पष्ट है। आत्मसंवाद से आदतें और निर्णय बदलते हैं। यह निरीक्षण से सिद्ध तथ्य है।


  • केवल सान्निध्य पर्याप्त क्यों नहीं माना गया?
    क्योंकि उपस्थिति अवसर देती है, समाधान नहीं। संवाद और निवेदन के बिना लाभ नहीं मिलता। निष्क्रिय रहना स्वयं अवसर गंवाना है।

  • सान्निध्य के बाद व्यक्ति को क्या करना चाहिए?
    अपनी कठिनाइयों को स्पष्ट कहना चाहिए। जो चाहिए, उसे संकोच बिना सामने रखना चाहिए। सक्रिय सहभागिता ही फल देती है।

  • क्या सब कुछ कहने से कमजोरी नहीं दिखती?
    नहीं, स्पष्टता कमजोरी नहीं है। समस्या छुपाना ही वास्तविक दुर्बलता है। समाधान संवाद से ही निकलता है।


  • ईश्वर से सीधे बात करने पर जोर क्यों है?
    क्योंकि संबंध औपचारिक नहीं, जीवंत होना चाहिए। जैसे मनुष्य से बात करते हैं, वैसे ही खुलापन जरूरी है। बनावटी भाषा दूरी पैदा करती है।

  • क्या इतना सीधा व्यवहार अनुचित नहीं माना जाएगा?
    नहीं, सच्चाई कभी अनुचित नहीं होती। दिखावा छोड़कर बात करना ही वास्तविक सम्मान है।

  • अगर ईश्वर सब जानते हैं, तो बताने की जरूरत क्यों?
    जानना और हस्तक्षेप करना अलग है। हस्तक्षेप के लिए आमंत्रण चाहिए। स्पष्ट निवेदन वही आमंत्रण है।

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देवी भागवत

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