गिरनार की महिमा

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गिरनार की महिमा

गिरनार की महिमा के बारे में आपको पता है। कहां है गिरनार? गुजरात में। जूनागढ़ ज़िले में। गिरनार और उसके आसपास के इलाकों का पौराणिक नाम है वस्त्रापथ क्षेत्र।

एक दिन कैलास में बैठकर पार्वती माता ने शंकर जी से पूछा — मानव आपको प्रसन्न करने के लिए क्या-क्या करते हैं? भगवान ने कहा — मुझे प्रसन्न करना बहुत सरल है। जो दयालु होते हैं, सदा अपनी पत्नी की तरह अंदर से सत्य ही बोलते हैं, अपने पति या पत्नी के साथ विश्वासघात नहीं करते हैं, और आपत्तियों का सामना धैर्य से करते हैं — उनके साथ मैं प्रसन्न रहता हूं। सदा उनको कुछ विशेष करने की आवश्यकता भी नहीं है मेरे लिए।

इतने में श्री हरि और ब्रह्मा जी कैलास में आए। श्री हरि बोले — आपकी वजह से मेरा जगत के पालन करने का काम बड़ा कठिन हो रहा है। आप तो असुरों को वर देते रहते हैं। वे घमंडी बनकर दूसरों को परेशान करने लगते हैं। वे सब रक्षा मांगकर मेरे पास आ जाते हैं। बताइए मैं कैसे चलाऊं मेरा काम? और आप बहुत आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। एक बेलपत्र भी चढ़ाया, खुश होकर उसे वर देने लगते हैं।

भूलेनाथ को गुस्सा आया — अच्छा, मेरी वजह से तुम लोगों को परेशानी हो रही है न? तो मैं जा रहा हूं। और भगवान वहां से चल पड़े, कैलास को छोड़कर चले गए।

गिरनार में आकर भगवान ने अपना वस्त्र त्याग दिया और अदृश्य होकर वहां रहने लगे। पार्वती जी बोलीं — उनके बिना मैं नहीं रह सकती यहां। और माता भगवान को ढूंढ़कर निकलीं। साथ में बाकी देवता भी।

गिरनार पहुंचे तो उन्हें भगवान का सान्निध्य वहां पता चला। माता पार्वती उज्ज अंता पर्वत के ऊपर रहने लगीं। इस स्थान में है गिरनार का अंबिका माता मंदिर। श्री हरि रैवत पर्वत पर आकर रहने लगे। आदिशेष आए, गंगा जी आईं, सारे देवता इस प्रकार गिरनार पहुंचे।

कुछ समय बाद भगवान ने उन्हें दर्शन दिया। सबने मिलकर उन्हें मनाया। भगवान ने कहा — मैं अपना एक अंश यहां छोड़कर जा रहा हूं। इस प्रकार आप लोग भी अपनी-अपनी शक्तियों का अंश यहां सदा के लिए छोड़कर वापस जाओ।

गिरनार में यह देवी शक्ति सदा के लिए निवास करती है।

इसमें एक विशेष बात यह है कि इसका उल्लेख मुझे सन 1875 में अंग्रेज़ों द्वारा मुद्रित 'इंडियन अंटिक्वरी' नामक पत्रिका में मिला। जो भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य की एक शोध पत्रिका थी। अवहेलना पूर्वक एक शब्द नहीं था इसमें हमारे धर्म या संस्कृति के प्रति। हमारे सच्चे इतिहास के रूप में इस आख्यान को मान्यता प्राप्त है अंग्रेज़ों की पत्रिका में।

आगे जाकर यह बदलने लगा — ऐसा लगता है। सत्ता की लालच में, बाद में, उनके ही हाथों हमारे वेदों की निंदा हुई। हमारी आस्था अंधश्रद्धा कही गई। तब भी लगता है, अंग्रेज़ों में भी जो सच्चे नेक विद्वान थे, उन्होंने कभी झूठ का साथ नहीं दिया। कभी हमारे इतिहास को मिथालॉजी कहकर नहीं बुलाया।

 

गिरनार को पवित्र क्यों माना गया है?
यह स्थान उन दिव्य घटनाओं का साक्षी है जहाँ भगवान शिव ने निवास किया, देवी पार्वती और अन्य देवताओं ने अपनी शक्तियाँ स्थिर कीं। इससे यह स्थान केवल भौगोलिक नहीं, आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बन गया।

क्या आज भी गिरनार में उन शक्तियों का प्रभाव बना हुआ है?
हां, कहा जाता है कि गिरनार आज भी दिव्य चेतना से भरपूर है। यहाँ अंबिका माता मंदिर और अन्य तीर्थस्थलों पर भक्तों को गहरा मानसिक और आध्यात्मिक अनुभव होता है।

क्या ये सिर्फ एक धार्मिक विश्वास है या इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी है?
1875 में अंग्रेज़ों की शोधपत्रिका में इस कथा का उल्लेख मिलता है। यह दिखाता है कि इसे उस समय भी ऐतिहासिक संदर्भ में स्वीकारा गया था, सिर्फ मिथक नहीं माना गया।


अगर भगवान शिव को सभी की भलाई करनी थी, तो नाराज़ होकर चले क्यों गए?
जब देवताओं ने उनकी नीतियों पर सवाल उठाया, उन्होंने उन्हें समझाने के बजाय मौन और विरक्ति का मार्ग चुना। यह तपस्वी स्वभाव का प्रतीक है — जहाँ क्रिया नहीं, बल्कि उपस्थिति से ही प्रभाव उत्पन्न होता है।

क्या यह कथा हमें बताती है कि ईश्वर को भी आलोचना बुरी लगती है?
यह दिखाता है कि जब भक्ति की जगह व्यंग्य और उलाहना आती है, तो दिव्यता स्वयं को छिपा लेती है। यह चेतावनी भी है कि श्रद्धा के बिना साक्षात्कार संभव नहीं।

क्या यह कथा शिव को अहंकारी नहीं दर्शाती?
नहीं। यह कथा उनके त्याग और आत्म-नियंत्रण को दिखाती है। वे न गुस्से में कुछ नष्ट करते हैं, न किसी को दंड देते हैं — बस चुपचाप हट जाते हैं। यह गूढ़ तपस्वी प्रवृत्ति का उदाहरण है।


देवताओं ने गिरनार में अपनी शक्तियों का अंश क्यों छोड़ा?
भगवान शिव के आदेश पर सभी देवताओं ने गिरनार को स्थायी आध्यात्मिक स्थल बनाने हेतु अपनी शक्तियों का अंश वहां छोड़ा। इससे यह स्थान तीर्थों में अद्वितीय बन गया।

क्या इससे यह सिद्ध होता है कि गिरनार में सभी देवताओं की उपस्थिति है?
हां, यह मान्यता है कि यहाँ एक नहीं, अनेक देवशक्तियाँ सन्निहित हैं। इसलिए गिरनार केवल एक देवता का स्थल नहीं, समस्त देवशक्ति का संगम है।

क्या यह सिर्फ प्रतीकात्मक बात नहीं है?
अगर यह केवल प्रतीकात्मक होता, तो वहाँ आज तक इतनी श्रद्धा और ऊर्जा बनी नहीं रहती। परंपरा और अनुभव — दोनों इसके स्थायित्व को पुष्ट करते हैं।


'इंडियन अंटिक्वरी' जैसी अंग्रेज़ी पत्रिका में इस कथा का होना कितना महत्त्वपूर्ण है?
यह दिखाता है कि उस समय कुछ विदेशी विद्वान भारतीय परंपरा को तर्कसंगत और ऐतिहासिक रूप में स्वीकारते थे, उसे अंधविश्वास नहीं मानते थे।

क्या इससे भारतीय इतिहास की प्रामाणिकता को बल मिलता है?
बिलकुल। जब शत्रु पक्ष भी आपकी परंपरा को प्रमाणिक रूप से दर्ज करता है, तो वह केवल धार्मिक विश्वास नहीं रह जाता, बल्कि सांस्कृतिक इतिहास बन जाता है।

अगर अंग्रेज़ों ने ऐसा स्वीकारा था, तो बाद में वे वेदों की निंदा क्यों करने लगे?
बाद में सत्ता और औपनिवेशिक रणनीति ने नीयत बदल दी। सच्चे शोध की जगह राजनीति और दबाव ने ले ली। इससे पहले जो इतिहास माना गया था, उसे 'मिथक' कहने की चाल चली गई।


क्या यह कहना उचित है कि सभी अंग्रेज़ विद्वान हमारे विरोधी थे?
नहीं। प्रारंभिक काल में कई ऐसे शोधकर्ता थे जिन्होंने भारतीय संस्कृति का निष्पक्ष अध्ययन किया। उन्होंने न तो धर्म की निंदा की और न ही वेदों को अवैज्ञानिक बताया।

फिर वेदों को अंधश्रद्धा कहे जाने की शुरुआत कैसे हुई?
यह बाद की औपनिवेशिक चाल थी, जिससे भारतीयों को अपनी ही जड़ों से काटा जा सके। इससे मानसिक गुलामी पैदा होती है — जिससे लोग अपनी परंपरा पर संदेह करने लगते हैं।

क्या इसका असर आज भी बना हुआ है?
हां, आज भी कई लोग अपने इतिहास को मिथक मानते हैं क्योंकि उन्हें पढ़ाया ही गया कि यह सब कल्पना है। जब तक ऐसे स्वतंत्र स्रोतों को फिर से नहीं पढ़ा जाएगा, यह भ्रम बना रहेगा।

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