बंकिमचन्द्रजी- एक अखिल भारतीय राष्ट्रवादी

 

श्री बंकिम चन्द चट्टोपाध्याय १९वीं शताब्दी के सबसे उत्कृष्ट और प्रसिद्ध भारतीयों में से एक हैं ।

एक शुद्ध कलाकार और लेखक के रूप में अपना जीवन शुरू करके उन्होंने अपनी मातृभाषा बंगला की गरिमा को अपनी कृतियों द्वारा बहुत बढ़ाया ।
उस समय प्रायोगिक तल पर हम अंग्रेजों के गुलाम थे ही, पर मानसिक तल पर भी हम उनकी संस्कृति का अनुकरण करके अपनी विरासत को खोने लगे थे ।
इसके लिए एक प्रधान कारण था अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार ।
पश्चिमी शिक्षा ने हमारे शिक्षित वर्ग को हमारी संस्कृति और परंपराओं से विमुख बना दिया था ।

बंकिम जी ने राष्ट्रीय भावना को जगाने और हमारे उज्ज्वल अतीत के बारे में गर्व को समाज में लाने के लिए बहुत प्रयास किया और इसमें वे सफल भी हुए ।
उनका दृढ़ विश्वास था कि अंग्रेजी भाषा समाज के उच्च वर्ग तक ही सीमित है और उसके माध्यम से आम जनता तक पहुंच पाना किसी भी विषय में असंभव है ।

सन १८७२ में बंकिम जी ने अपने कुछ बुद्धिजीवी मित्रों के साथ मिलकर 'बंगदर्शन' नामक पत्रिका प्रारंभ की थी, जो ज्ञान को जन सामान्य तक पहुंचाने में सफल हुई ।
मातृभाषा में ही ज्ञान का प्रसार — यही इस पत्रिका का उद्देश्य था ।

बंकिम जी उन दिनों सर्विस में थे ।
जब वे हावड़ा में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, तब उन्होंने एक धृष्ट अंग्रेज उच्चाधिकारी की बोलती बंद कर दी थी ।
उस समय वहाँ के कलेक्टर Buckland थे ।

हावड़ा नगरपालिका ने एक सूचना जारी की कि ज्वलनशील सामग्री द्वारा घर का छत बनाना दण्डनीय अपराध होगा ।
मूल रूप में यह सूचना अंग्रेजी में थी ।
नगरपालिका के एक अंग्रेज सचिव ने इसका बंगला अनुवाद करते समय 'ज्वलीय' की जगह 'जलीय' लिख दिया ।
उसे बंगला का ज्ञान बहुत सीमित था ।

इस कानून को लेकर पुलिसवालों ने लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया ।
एक ८० वर्ष की बूढ़ी औरत, जिसकी झोपड़ी का छत सूखे पत्तों से बना था, उसे पकड़कर बंकिम जी के सामने लाया गया ।
उसे यह तक नहीं पता था कि उसने क्या गलती की है ।

बंकिम जी ने कहा कि आरोप ही गलत है —
यह 'जलीय सामग्री' होती क्या है?
ऐसी कोई सामग्री है ही नहीं, तो तुम लोग इस बेचारी को परेशान क्यों कर रहे हो?
उन्होंने मुकदमा तुरंत खारिज कर दिया ।

इस पर कलेक्टर बकलंड ने कड़ी आलोचना करते हुए टिप्पणी लिखी कि बंकिम जी अपने असहनीय पाण्डित्य का प्रदर्शन कर रहे हैं ।
बंकिम जी ने आदेश निकाला कि आप मेरे वरिष्ठ अधिकारी नहीं हैं ।
एक न्यायाधिकारी के ऊपर ऐसी निन्दात्मक टिप्पणी लिखने के लिए एक महीने के भीतर क्षमा याचना करें ।
बकलंड को क्षमा माँगनी पड़ी ।

बंकिम जी का मानना था कि पुरानी परंपराओं को त्यागने से पहले यह सिद्ध करना होगा कि उनमें त्याज्य या हानिकारक क्या है ।
प्राचीन भारत का इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र — इन सबके बारे में उनका ज्ञान अत्यंत गहरा था ।

बंकिम जी द्वारा लिखा गया 'कृष्ण चरित्र' उनकी कृतियों में शिरोमणि माना जाता है ।
राष्ट्र निर्माण के दृष्टिकोण से उनकी श्रेष्ठ कृतियां हैं — 'आनंद मठ', 'देवी चौधरानी' और 'सीताराम' ।
इन कृतियों में उस राजनीतिक व्यवस्था से विद्रोह का भाव है, जो अत्याचारों से निरबल लोगों की रक्षा करने और समान न्याय देने में असफल हो चुकी थी ।

बंकिम जी सेवा, पवित्रता, नैतिकता, न्याय और निष्पक्षता के ऊपर दृढ़ विश्वास रखते थे ।
वे मानते थे कि इन्हीं के माध्यम से मानवजाति का उद्धार और प्रगति संभव है ।

'आनंद मठ' के द्वारा उन्होंने देश में राष्ट्रभक्ति की लहर उत्पन्न की ।
'देवी चौधरानी' के माध्यम से सेवा का संदेश और 'सीताराम' के माध्यम से न्यायिक व्यवस्था का संदेश दिया ।

उनका दृष्टिकोण कभी प्रांतीय नहीं था ।
उनमें अखिल भारतीय राष्ट्रवाद की चेतना जागृत थी ।
भारत के विभिन्न जाति और भाषाई समूहों के बीच विचार की एकता लाने के प्रयास पर उन्होंने विशेष जोर दिया ।
वे कहते थे कि भारत में राष्ट्रवाद के अभाव का फायदा उठाकर ही विदेशी हम पर शासन कर रहे हैं ।

राष्ट्र की एकता की चेतना तभी जागेगी जब हमारी नई पीढ़ी हमारे सच्चे इतिहास का सम्यक अध्ययन करेगी ।
उन्होंने देशभक्ति और विश्वबन्धुत्व के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया ।

बंकिम जी कहते हैं —

बंकिम जी ने सनातन धर्म की सार्वभौमिकता और सर्वोच्चता को खोज और अन्वेषण के तर्कसंगत आधार पर स्थापित किया ।
वे मानते थे कि धर्म वही हो सकता है जो मानव के सर्वांगीण विकास में सहायक हो ।
वे यह भी मानते थे कि प्रकृति की विभिन्न शक्तियों — नदियां, पेड़-पौधे, गाय, वायु, अग्नि — की पूजा भी उसी एक ईश्वर की पूजा है, क्योंकि ये सभी उसी एक ईश्वर के भिन्न स्वरूप हैं ।

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं
सुखदां वरदां मातरम् ।। १ ।।
वन्दे मातरम् ।

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले ।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम् ।। २ ।।
वन्दे मातरम् ।

तुमि विद्या, तुमि धर्म तुमि हृदि,
तुमि मर्म त्वं हि प्राणा: ।
शरीरे बाहुते तुमि मां शक्ति,
हृदये तुमि मां भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गढ़ि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ।। ३ ।।
वन्दे मातरम् ।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम् नमामि कमलां
अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम् ।। ४ ।।
वन्दे मातरम् ।

श्यामलां सरलां सुस्मितां
भूषितां धरणीं भरणीं मातरम् ।। ५ ।।
वन्दे मातरम् ।।

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