
ऋषिगण बोले कि उनके मन में एक और शंका उत्पन्न हुई है। यह बात तो स्वीकार्य है कि पराशर महर्षि और सत्यवती का संसर्ग दैववश हुआ था। लेकिन राजा शंतनु के साथ इस निषाद कन्या का विवाह कैसे हुआ। शंतनु क्षत्रिय हैं, श्रेष्ठ पुरु कुल के सदस्य हैं, और सत्यवती एक साधारण निषाद कन्या थी। वह केवल पत्नी ही नहीं बनी, बल्कि शंतनु की पट्ट महिषी बनी, अर्थात रानी के स्थान में सबसे प्रथम।
उन्होंने आगे कहा कि आपने पुरु वंश के विषय में जो कुछ अब तक बताया है, उससे यह शंका उत्पन्न हो रही है कि क्या इस वंश में कभी शिष्टाचार का पालन होता भी है। ज्येष्ठ पुत्र भीष्म के रहते हुए चित्रांगद राजा बने। उसके बाद कनिष्ठ पुत्र विचित्रवीर्य राजा बने। सत्यवती ने व्यासजी से अपने ही पुत्र की पत्नियों के गर्भ में संतान उत्पन्न करने को कहा। इन घटनाओं के क्रम में व्यासजी ने एक दासी से भी संतान उत्पन्न की। इस वंश में कुछ भी साधारण रीति से होता हुआ नहीं दिखता। ऋषियों ने पूछा कि क्या वेद और शास्त्र इन सब बातों को अनुमोदित करते हैं। कृपया इन शंकाओं का समाधान किया जाए।
इसके बाद कहा गया कि इक्ष्वाकु वंश में महाभिष नामक एक राजा थे। उन्होंने हजारों अश्वमेध यज्ञ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ किए थे। इन यज्ञों से प्रसन्न होकर इन्द्र ने उन्हें स्वर्ग में स्थान प्रदान किया। एक बार राजा महाभिष ब्रह्मलोक गए। वहां सभी देवता उपस्थित थे। गंगाजी भी ब्रह्मा की सेवा करने वहां पहुंची थीं।
उसी समय तेज हवा चली और गंगाजी का वस्त्र हिलने लगा। सभी देवताओं ने अपनी दृष्टि नीचे कर ली, लेकिन राजा महाभिष गंगाजी की ओर देखते रहे। राजा महाभिष और गंगाजी के बीच प्रेम उत्पन्न हो गया। इस स्थिति को देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हो गए और उन्होंने दोनों को श्राप दे दिया।
यह भी कहा गया कि ऐसा प्रतीत होता है कि भागवत के प्रत्येक अध्याय में कोई न कोई किसी न किसी को श्राप देता ही है। श्राप और वर देना उस समय सामान्य बात थी। अच्छा है कि आज के समय में ऐसी शक्ति किसी के पास नहीं है, नहीं तो लोग एक-दूसरे को श्राप देकर नष्ट कर देते। कलियुग में असहिष्णुता अधिक है।
ब्रह्माजी ने महाभिष को श्राप दिया कि यज्ञों द्वारा अर्जित उनका समस्त पुण्य नष्ट हो जाएगा और उन्हें पुनः भूलोक में जन्म लेकर पुण्य अर्जित करना होगा, तभी वे स्वर्ग जा सकेंगे। गंगाजी को भी भूलोक में जन्म लेना पड़ेगा। दोनों वहां से चले गए। श्रापित होने पर भी उनमें कुछ न कुछ शक्ति शेष रहती है, ऐसा नहीं है कि वे पूरी तरह शक्तिहीन हो जाते हैं।
महाभिष ने विचार किया कि भूलोक में ऐसा कौन है जो उनका पिता बनने योग्य हो। उन्होंने पुरु वंश के राजा प्रतीप को अपना पिता बनाने का निर्णय किया।
शंतनु और सत्यवती के विवाह को लेकर शंका क्यों उठती है?
यह शंका सामाजिक वर्ग और परंपरा के अंतर के कारण उठती है। एक ओर क्षत्रिय राजा है और दूसरी ओर निषाद कन्या। यह अंतर लोगों को असहज करता है। इसी कारण विवाह को लेकर प्रश्न खड़ा किया गया है।
ऐसा विवाह लोगों को असामान्य क्यों लगता है?
क्योंकि सामान्यतः समान वर्ग में विवाह की अपेक्षा की जाती है। जब यह अपेक्षा टूटती है तो जिज्ञासा पैदा होती है। यही जिज्ञासा कथा को आगे बढ़ाती है।
क्या यह शंका केवल सामाजिक सोच से उत्पन्न है?
हां, यह शंका मानवीय वर्ग-बोध से उत्पन्न है। कथा इसी सोच को परखने के लिए यह प्रश्न उठाती है।
पुरु वंश की घटनाओं को अव्यवस्थित क्यों बताया गया है?
क्योंकि उत्तराधिकार और आचरण सामान्य नियमों से अलग दिखाई देते हैं। बड़े पुत्र के रहते छोटे का राजा बनना प्रश्न खड़ा करता है। इससे वंश की प्रकृति पर संदेह होता है।
ऋषि इन घटनाओं को क्यों जोड़कर देखते हैं?
वे पूरे वंश के आचरण को एक सूत्र में समझना चाहते हैं। अलग-अलग घटनाएं मिलकर एक पैटर्न बनाती हैं। यही पैटर्न शंका को जन्म देता है।
क्या केवल असामान्यता से अधर्म सिद्ध होता है?
नहीं, असामान्यता अपने आप में अधर्म नहीं है। नियमों से अलग होना और नियमों के विरुद्ध होना अलग बातें हैं। यही अंतर समझना आवश्यक है।
श्राप और वर को सामान्य घटना क्यों बताया गया है?
क्योंकि उस समय नैतिक अनुशासन को नियंत्रित करने के साधन अलग थे। श्राप और वर उसी नियंत्रण के माध्यम थे। यह व्यवस्था उस युग की मानसिकता को दर्शाती है।
आज के समय से इसकी तुलना क्यों की गई है?
ताकि अंतर स्पष्ट हो सके। आज वैसी शक्ति होती तो समाज में अराजकता फैल जाती। यह तुलना सोच को व्यावहारिक बनाती है।
क्या इससे प्राचीन समय की आलोचना होती है?
नहीं, यह केवल समय के अंतर को दर्शाता है। हर युग की अपनी सीमाएं और साधन होते हैं।
महाभिष को भूलोक में जन्म क्यों लेना पड़ा?
क्योंकि श्राप के अनुसार अर्जित पुण्य समाप्त हो गया था। पुनः पुण्य अर्जित करने के लिए मानव जीवन आवश्यक था। यह कर्म और फल के सिद्धांत को दिखाता है।
श्राप के बाद भी शक्ति शेष रहने का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि पतन पूर्ण नहीं होता। योग्यता और संस्कार समाप्त नहीं हो जाते। केवल दिशा बदलती है।
क्या यह विचार तर्कसंगत है?
हां, क्योंकि पूर्ण शून्यता से आगे की यात्रा संभव नहीं होती। कुछ आधार शेष रहना आवश्यक है।
महाभिष ने राजा प्रतीप को पिता क्यों चुना?
क्योंकि उन्हें उपयुक्त वंश और पात्रता चाहिए थी। यह चयन सोच-समझकर किया गया निर्णय था। इससे आगे की कथा का आधार बनता है।
इस चयन से क्या संकेत मिलता है?
यह संकेत मिलता है कि जन्म केवल संयोग नहीं होता। उसके पीछे चयन और कारण होते हैं। यही कथा की दिशा तय करता है।
क्या यह कल्पना मात्र कहा जा सकता है?
नहीं, क्योंकि कथा अपने भीतर तर्क का क्रम रखती है। प्रत्येक निर्णय का कारण बताया गया है। यही इसे संगत बनाता है।
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