
महाभारत की कहानी है।
एक गुरुजी थे धौम्य।
उनके तीन शिष्य थे – आरुणि, उपमन्यु और वेद।
यह कहानी प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति की एक झलक है।
कभी-कभी ऐसा भी हुआ करता था कि, जैसा हम सोचते हैं कि गुरुजी शिष्य को अध्याय के बाद अध्याय सिखाएंगे जैसे आजकल के स्कूलों में है – हमेशा ऐसा नहीं था।
गुरु का प्रथम कर्त्तव्य था कि शिष्य को ज्ञान प्राप्ति के लिए योग्य बनाना।
इसी में सालों लग जाते हैं।
एक बार शिष्य में योग्यता आ गयी तो विद्या और ज्ञान के आने में समय नहीं लगता।
अपने आप ये आ जाते हैं।
इसका दृष्टांत है यह कहानी।
एक बात ध्यान में रखिए – ये गुरुजन आजकल के गुरुओं जैसे साल में एक बार मिलनेवाले गुरु, या दीक्षा देकर अप्रत्यक्ष होनेवाले गुरु, या हफ्ते में एक बार एक घंटे के लिए मिलनेवाले नहीं हैं।
यहां शिष्य छोटी उम्र से ही गुरु के साथ चौबीसों घंटे उनके आश्रम में ही रहता है।
गुरु की नजर सर्वदा शिष्य के ऊपर है – उसमें क्या-क्या कमियां हैं, उनको कैसे ठीक किया जाए – गुरुजी देखते ही रहते हैं।
शिष्य को पूर्णतया विद्या प्राप्ति के लिए योग्य बनाना।
एक दिन गुरुजी आरुणि को बुलाकर कहे –
बेटा, खेत चले जाओ।
वहां मेड टूटी हुई है।
उसे बांध दो, पानी खेत से बाहर बह रहा है।
बहुत प्रयास करने के बाद भी वह उसे बांध नहीं पाया।
अंत में आरुणि मेड के स्थान पर स्वयं लेट गया और पानी को रोका।
शाम तक जब आरुणि वापस नहीं लौटा तो गुरुजी और बाकी के दो शिष्य उसे ढूंढकर निकले।
खेत पहुंचे तो वहां आरुणि मिला, लेटा हुआ।
गुरुजी बोले –
अरे, क्या कर रहे हो वहां, यहां आओ।
आरुणि उठकर गुरुजी के पास चला आया।
पानी फिर से बाहर बहने लगा।
गुरुजी ने आरुणि से पूछा –
वहां क्यों लेटे थे?
'मैं अपने शरीर से पानी को रोक रहा था।'
'तो फिर उठकर क्यों चले आए?
देखो, पानी फिर से बाहर जा रहा है।'
'आपने बुलाया, इसलिए मैं उठकर चला आया।
आपने बोला पानी को रोकने – मैंने रोका।
आपने बुलाया – मैं आ गया।
शिष्य को इससे ज्यादा सोचना ही नहीं है।
गुरुजी जानते हैं क्या सही है, क्या गलत है,
क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए।
इसके आगे शिष्य को सोचना ही नहीं है।
गुरु के निर्धारण शक्ति के ऊपर कभी अविश्वास मत करो।'
गुरुजी को समझ में आया कि अब यह ज्ञान प्राप्ति के लिए योग्य बन गया है।
उन्होंने कहा –
'बेटा, वेदों और शास्त्रों के संपूर्ण ज्ञान से मैं तुम्हें अनुगृहीत कर रहा हूं।
ये सब तुम्हारे अंदर इसी क्षण आ गये हैं।
अब तुम अपना घर जा सकते हो।'
ध्यान में रखिए – यह पहले की बात है।
आज के लिए जैसे तुलसीदास जी ने बोला है –
'लखि सुबेष जग बंचक जेऊ।
बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।।
उधरहिं अंत न होइ निबाहू।
कालनेमि जिमि रावन राहू।।
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू।
जिमि जग जामवंत हनुमानू।।'
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