
हम कुरुक्षेत्र के बारे में देख रहे हैं।
सूर्यमण्डल में एक कुरुक्षेत्र है। एक उत्तर कुरुक्षेत्र, जो नेपाल में शृंगगिरि के उत्तर में है।
अब तीसरा भारतवर्ष का कुरुक्षेत्र, जहां युद्ध हुआ था। यह कुरुक्षेत्र हस्तिनापुर के पश्चिम का प्रदेश है। युद्ध के लिए इस भूमि को जानबूझकर चुना गया था, क्योंकि वह युद्ध साधारण युद्ध नहीं था — धर्म युद्ध था।
केवल पाण्डवों के लिए नहीं, कौरव भी सोचते थे कि वे राजधर्म का ही आचरण कर रहे हैं। 'वीरभोग्या वसुन्धरा' — भूमि के ऊपर वीरों का ही अधिकार है। उन्होंने भी कभी नहीं सोचा कि हम अधर्मी हैं। जो गलत काम करता है, उसके पास भी न्यायिकरण कुछ न कुछ रहेगा ही। कोई नहीं कहेगा कि मुझे अधर्म और अन्याय करना अच्छा लगता है।
कुरुक्षेत्र को इसलिए चुना गया था कि वह धर्मक्षेत्र है।
कुरुक्षेत्र पहले से धर्मक्षेत्र था। इसके कई कारण हैं। ब्रह्माजी ने सत्यलोक से आकर भूमि में पांच बार यज्ञ किया है — पुष्कर में तीन बार, प्रयाग में एक बार, और कुरुक्षेत्र में एक बार। जिन विद्वानों ने इन यज्ञों में भाग लिया, उनसे ही धरती पर ब्राह्मणों के वंश प्रवृत्त हुए।
जब हम गोत्र कहते हैं, उसके साथ ऋषि प्रवर भी होता है — किन ऋषियों ने इस गोत्र को प्रवृत्त किया। कोई-कोई गोत्र एक ऋषि से प्रवृत्त हुआ, कोई-कोई दो, तीन, चार और पांच ऋषियों से। इन ऋषियों को इन गोत्रों का स्थापक कह सकते हैं।
उदाहरण के लिए बताता हूं — भृगुओं का गृत्समद गोत्र है, जिसका एक ही ऋषि है — गृत्समद। हिरण्यरेतस गोत्र है विश्वामित्रों में — इसके दो ऋषि हैं: विश्वामित्र और हिरण्यरेतस। तीन ऋषियों वाले गोत्र सबसे अधिक मिलेंगे, पांच वाले भी। तीन में कौण्डिन्य गोत्र — वसिष्ठ, मित्रावरुण, कुण्डिन ऋषि। चार के सारे गोत्र लुप्त हो चुके हैं, ऐसा लगता है।
यहां पर देखिए — ब्रह्मा के एक ही यज्ञ में जिन्होंने भाग लिया, उनके द्वारा एक ऋषि वाले गोत्र प्रवृत्त हुए। दो यज्ञों में दो ऋषि वाले। इस प्रकार पांचों यज्ञों में जिन्होंने भाग लिया, उनके द्वारा पांच प्रवर वाले गोत्र — एकप्रवर, द्विप्रवर, त्रिप्रवर, चतुष्प्रवर और पंचप्रवर वाले गोत्र।
प्रयाग पहले से ही क्षेत्र था। ब्रह्मा ने वहां यज्ञ किया, इसलिए वह क्षेत्र भी बन गया। यज्ञ के अंत में उसके फल की प्राप्ति अवबृथ स्नान द्वारा होती है। पुष्कर में वहां के सरोवर में ही ब्रह्माजी ने स्नान किया था।
ब्रह्मा का धरती पर अंतिम यज्ञ हुआ कुरुक्षेत्र में। ब्रह्माजी को कुरुक्षेत्र बहुत अच्छा लगा। ब्रह्माजी ने कुरुक्षेत्र को एक विश्राम स्थान बनाया — किसके लिए? जो भौमस्वर्ग के देवता हैं, भूदेव — जो वैदिक काल में सैबेरिया में रहते थे — वे जब भी भारतवर्ष में आएंगे, वे कुरुक्षेत्र में ही रहेंगे।
इस प्रकार भी कुरुक्षेत्र पवित्र स्थान बन गया। यहां खेती नहीं होती थी। यहां देवताओं को छोड़कर और कोई रह भी नहीं सकता था — जैसे आजकल सरकारी सर्किट हाउस होता है, वहां सरकारी अफसर ही रह सकते हैं।
बाद में इसी स्थान पर राजर्षि कुरु ने एक बड़ा ही विचित्र तप शुरू कर दिया। अपने हाथों से यहां हल चलाना शुरू किया। उनको एक वर चाहिए था — जिसका भी यहां देहांत होगा, कुरुक्षेत्र में — उसके सारे पाप नष्ट होकर वह पुण्यलोक चला जाएगा।
सोचिए — धर्मयुद्ध में जितने योद्धा मरे, 18 अक्षौहिणियों में — एक अक्षौहिणी में एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास सैनिक होते हैं। इतने लोग कुरुक्षेत्र गए, इनमें से कितने वापस आए? ग्यारह या बारह। बाकी सब — एक तो वीरमृत्यु द्वारा, दूसरा कुरु ने जो वर प्राप्त किया उसके द्वारा — सबको पुण्यलोक की प्राप्ति हुई।
परशुरामजी ने दुष्ट राजाओं का इक्कीस बार उन्मूलन किया। उनके खून से पांच सरोवर कुरुक्षेत्र में बने। उनमें तर्पण करके परशुरामजी ने अपने पितरों को तृप्त किया। बाद में उनसे वर मांगा कि यह सरोवर पवित्र जल के बन जाएं, और इनमें जो स्नान करेंगे वे भी पवित्र हो जाएं।
इसके आधार पर कुरुक्षेत्र का एक नाम भी है — स्यमंतपंचक।
कुरुक्षेत्र में पुण्य नदी सरस्वती है — लुप्ता सरस्वती। ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
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