उद्यमेन हि सिध्यन्ति

उद्यमेन हि सिध्यन्ति

उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः|
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः|

 

केवल इच्छा रखने से कार्य सिद्ध नहीं होते| कार्य की सिद्धि होने के लिए परिश्रम करना पडता है| सोए हुए शेर के मुह में जाकर मृग अपने आप प्रविष्ट होकर उसका भूख मिटाते हैं क्या?

  • केवल चाह लेने से कुछ नहीं होता, जब तक उसके लिए पुरुषार्थ न हो।

  • हर कार्य को सिद्ध करने के लिए श्रम करना अनिवार्य है; निष्क्रिय रहने से कुछ भी नहीं मिलता।

  • सफलता उसी को मिलती है जो प्रयत्न करता है, केवल मन में सोचने भर से कुछ नहीं बदलता।

  • शक्ति भी व्यर्थ है यदि उसे उपयोग में न लाया जाए — बल को कर्म की दिशा चाहिए।

  • यह संसार परिश्रम का फल देता है, केवल अधिकार या आशा से कुछ नहीं मिलता।


मुख्य बात क्या है?
सिर्फ इच्छा रखने से काम सिद्ध नहीं होता, उसके लिए परिश्रम करना आवश्यक है।

सिर्फ सोचने से कार्य क्यों नहीं होता?
क्योंकि संसार कारण और परिणाम के नियम पर चलता है। इच्छा कारण नहीं है, कर्म ही कारण बनता है।

लेकिन कुछ लोगों को सब कुछ बिना प्रयास के मिल जाता है?
वो केवल ऊपर से ऐसा लगता है। हर फल किसी न किसी पूर्व कर्म का परिणाम होता है। कोई भी इस नियम से मुक्त नहीं है।


सोए हुए शेर का उदाहरण क्या समझाता है?
कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली हो, जब तक वह प्रयत्न नहीं करता, वह अपनी भूख नहीं मिटा सकता।

शेर और मृग का दृष्टांत क्यों दिया गया?
क्योंकि यह सरल और स्पष्ट उदाहरण है — अगर शेर को भी भोजन के लिए उठना पड़ता है, तो हमें भी अपने लक्ष्य के लिए परिश्रम करना ही होगा।

क्या यह दुर्बल लोगों के साथ कठोरता नहीं है?
नहीं। यहाँ बल नहीं, पुरुषार्थ की बात हो रही है। दुर्बल भी सजगता, लगन और निरंतरता से आगे बढ़ सकते हैं।


इच्छा से कार्य सिद्ध क्यों नहीं होता?
क्योंकि इच्छा केवल एक भावना है। कार्य तभी सिद्ध होता है जब उस भावना के पीछे श्रम और निष्ठा हो।

क्या दृढ़ संकल्प से सब कुछ प्राप्त हो सकता है?
हाँ, यदि वह संकल्प श्रम के साथ जुड़ा हो। केवल कल्पना करने से कुछ नहीं होता।

अगर किसी को बिना परिश्रम के कुछ मिल जाए तो?
ऐसा होना अत्यंत दुर्लभ है। और यदि होता भी है, तो वह भी पहले के सत्कर्मों का ही परिणाम होता है।

 

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