
वैदिक धर्म में एक अनुक्रम है जिसे देवताओं को कुछ भी भेंट करते हुए उनसे किसी चीज के लिए आशीर्वाद मांगते हुए पालन किया जाता है। विग्रहः अविस्वीकारः तद्भोजनं तृप्तिः प्रसादः। पहला विग्रहः। देवताओं की उपस्थिति में जाना या उपस्थिति लाना। देवताओं की उपस्थिति में जाना जैसे मंदिर जाना। देवताओं की उपस्थिति लाना जैसे कलश इत्यादि में देवताओं का आवाहन करना। उसके बाद हविस्विकार। भक्त द्वारा हवन में की गई आहुतियां या फल, फूल इत्यादियों का देवताओं द्वारा स्वीकार किया जाना। तद्भोजनम् उनके द्वारा उन द्रव्यों का भोग। उसके बाद तृप्ति ही भोग से देवताओं का संतुष्ट हो जाना और आखिर में प्रसाद उनका आशीर्वाद देना। पहले दें, उसके बाद मांगे। इन नियमों से अनजान लोग ही मन्नत मांगते रहते हैं, जैसे अगर मुझे यह नौकरी मिलती है तो मैं मेरी कुलदेवी के लिए ऐसा करूंगा। अगर मेरा घर हो गया तो मैं इस मंदिर में यह चढ़ाऊंगा। अगर मैं एग्जाम में पास हो जाऊंगा तो तिरुपति जाकर दान पेटी में ₹१००८ डाल दूंगा। अगर मेरी बेटी की एक अच्छे परिवार में शादी हो जाती है तो मैं ऐसा करूंगा, वैसा करूंगा। यह चलता ही रहता है। कोई कोई तो सुबह से शाम तक चार-पांच मन्नतें मांग लेता है। इन वादों से ईश्वर को प्रलोभित नहीं कर सकते। उल्टा यदि कोई ऐसा वादा करता है तो वो मुश्किल में पड़ जाएगा यदि उसे पूरा नहीं किया तो। नियम बहुत कड़े हैं। अगर वादे का काम होने के २४ घंटों के अंदर नहीं निभाया वादे को तो उसका दुगुना करना पड़ेगा। अगर देरी तीन रात की है तो छह गुना। अगर देरी दस रातों की है तो सोलह गुना। अगर देरी एक महीने की है तो सौ गुना। यदि एक साल की है तो १००० गुना। एक बरस के ऊपर तो फिर करने से भी कोई फायदा नहीं। नरक वासी इसका दंड है। तो ये कैसे काम करता है देखते हैं। मान लो कि वादा था कि नौकरी पाने पर कुलदेवी को साड़ी चढ़ाने का। घड़ी शुरू हो जाती है जब नियुक्ति आदेश। हाथ में प्राप्त होता है तब से। अगर वादा उसी दिन पूरा नहीं होता है और एक महीने के बाद किया जाता है तो १०० साड़ियां चढ़ानी होगी। यह है नियम। कुछ लोग एक भ्रम में रहते हैं। ईश्वर को कुछ देना और बदले में कुछ मांगना, क्या यह रिश्वतखोरी नहीं है? भगवान को क्या देना है? उनके पास तो सब कुछ है। सब कुछ तो वही देते हैं, उनको क्या देना? अज्ञान की वजह से ऐसा लगता है। धार्मिक ग्रंथ कहते हैं, ईश्वर का दो स्वरूप है, सगुण और निर्गुण। निर्गुण स्वरूप में ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वक्षम होते हैं। लेकिन सगुण स्वरूप की बात कुछ और है। गीता में कहा गया है कि प्रजापति ब्रह्मा ने देवता और मनुष्यों की सृष्टि करने के बाद उनसे कहा एक दूसरे को पोषण करने। देवता मनुष्य का पोषण करेंगे और मनुष्य देवताओं का। मनुष्य देवताओं का पोषण करेंगे यज्ञ के माध्यम से। देव मानव का पोषण करेंगे आशीर्वाद देकर। यह एक नियम है जिन्हें परमेश्वर ने स्वयं रखा है। भगवान ने ऐसा नियम क्यों रखा? कई जवाब हैं जो हम जानते हैं, कई जवाब होंगे जो हमारी जानकारी और बुद्धि से अतीत हैं। एक जवाब, यह लीला है, एक खेल है। ईश्वर लीला क्यों करते हैं, पता नहीं, लेकिन लीला करते हैं। किसी किसी पिक्चर में निर्देशक भी अभिनय करता है। एक अभिनेता बनता है। कोई एक भूमिका अपना लेता है। कभी-कभी निर्देशक हीरो भी बन जाता है। पिक्चर का संपूर्ण नियंत्रक है निर्देशक, लेकिन जब वो अभिनय करने लगता है तो अपने आप को उस पात्र तक ही सीमित रखता है जिसका वो भूमिका निभा रहा हो। ईश्वर भी यही करते हैं। जब वे सगुण लोक में आते हैं, तो अपने आप को सीमित कर देते हैं। उस भूमिका के लिए जो वे निभा रहे हैं, एक अभिनेता के रूप में। एक भगवान जिन्हें मनुष्य समझ सके, जान सके। और इस पिक्चर या नाटक का सबसे बेहतर अभिनेता भी वे बन जाते हैं क्योंकि ये उन्हीं का नाटक है, उन्हीं की लीला है। और ये सगुण अभिनेता भगवान के रूप में उनकी भूमिका भी अलग होती है। वे आराम से अपने आप को बदल सकते हैं दोनों के बीच, सगुण और निर्गुण के बीच पल भर में। और ऐसे करते ही रहते हैं। और ये सगुण परमेश्वर आपसे चाहते हैं कि आप भी अपनी भूमिका अच्छे से निभाएं क्योंकि वे हैं इस नाटक के महानिर्देशक। क्योंकि उन्हें हर अभिनेता से चाहिए पराकाष्ठा, परिपूर्णता। एक सच्चे भक्त के रूप में। भगवान को ये सब क्यों चढ़ा रहे हो? खाद्य, भोजन, वो सब तो वैसे की वैसे रहते हैं। वो तो कुछ खाते नहीं हैं। गरीब को क्यों नहीं देते? वही तो बात है। आपको और मुझे देंगे तो हम खा लेंगे, भगवान को देंगे तो वो छोड़ देंगे हमारे लिए, गरीब के लिए। उसमें उस भोग में अपना प्यार और अपनी करुणा मिलाकर। अपना आशीर्वाद मिलाकर जिससे वो साधारण भोज्य जो चढ़ाया गया, ये सौ गुणा स्वादिष्ट और एक औषध के समान बन जाएगा। शरीर और संसार के हर रोग का औषध। सच में देखो तो भगवान जो हम चढ़ाते हैं उससे कुछ भी ग्रहण नहीं करते। जो रसांश ग्रहण करते हैं उसे भी १०० गुना करके वापस उसी में मिला देते हैं। जब उनको कुछ चाहिए ही नहीं तो क्यों लेकर जाएंगे? उदाहरण के लिए लीजिए तिरुपति बालाजी मंदिर। लाखों रुपए आते हैं हर रोज। भक्तों द्वारा चढ़ाए जाते हैं। लेकिन आपको पता है, लाखों परिवार जीते हैं उस मंदिर का आश्रय लेकर। लाखों परिवार की दो वक्त की रोटी वहीं से बनती है। लाखों बच्चे स्कूल जाते हैं। उस संस्था का आश्रय लेकर अनेक छोटे-छोटे मंदिर चलाए जाते हैं जहां कोई आमदनी नहीं है। तिरुपति में प्राप्त धनराशि से वेद पाठशालाएं चलती हैं। करोड़ों का अन्नदान होता है इसलिए कि आप देते हैं। आप देते हैं क्योंकि भगवान लेते हैं। लेने का नाटक करते हैं। भगवान को कुछ नहीं चाहिए। वे आपको सिखा रहे हैं कि देना कैसे है। जब आप कुछ लेते हैं तो आप सिकुट जाते हैं, जब आप देते हैं तो आप बढ़ जाते हैं। जब आप लेते हैं अपने आप के लिए, अपने छोटे परिवार के लिए लेते हैं। जब आप देते हैं तो समस्त विश्व आपका परिवार बन जाता है। आपका परिवार बढ़ जाता है, आपका अवेक्षण बढ़ता है, आपका आकार बढ़ता है। लेने वाले मनुष्य से देने वाले ईश्वर की ओर आप धीरे-धीरे विकसित होने लगते हैं। अपने अंदर स्थित परमात्मा को परिपूर्ण रूप से साक्षात्कार करने लगते हैं। परिपूर्ण रूप से साक्षात्कार करना शुरू करते हैं। हमसे लेकर भगवान हमें यह सीखने का अवसर देते हैं। यह देना एक प्रयोगशाला का प्रयोग जैसा है। एक व्यायामशाला का व्यायाम जैसा है, अभ्यास। यह देना एक अभ्यास है और इसके लिए मौका देते हैं भगवान। हमसे स्वीकारने का नाटक करके अपने आप पर अपने छोटे परिवार पर केंद्रित एक साधारण मानव जीवन से बढ़कर विकसित होकर एक विश्व जीवन की ओर बढ़ने का मौका। यही है आध्यात्मिक प्रगति। हर आध्यात्मिक प्रणाली का लक्ष्य यही है, यह विकास। जब आप किसी होटल में जाकर खाना खाते हैं और पैसा देते हैं तो जो आपने दिया उसके बदले में आपको वहीं के वहीं कुछ मिल जाता है। वहीं के वहीं कुछ मिल गया जिसका आप जांच और परिमाण कर लेते हैं। कीमत के बराबर मिला कि नहीं। लेकिन जब दान में देते हैं, मंदिर में देते हैं, सत्कार्य के लिए देते हैं, अग्नि में आहुति के रूप में देते हैं तो वहीं के वहीं कुछ वापस नहीं आता। ऋषि मुनियों ने कहा है, आचार्यों ने कहा है, धार्मिक ग्रंथों ने कहा है, अच्छा करो, अच्छा फल मिलेगा। यह है कर्म का नियम। लेकिन आपको इस पर विश्वास है क्या? यह देना इसकी एक परीक्षा है, एक जांच है। कर्म की जो पद्धति और व्यवस्था जो परमेश्वर ने इस विश्व का संचालन के लिए लगाई है, उस पर आपका कितना विश्वास है इसकी परीक्षा। दृढ़ विश्वास चाहिए देने के लिए, नास्तिक कहते हैं मंदिर खोल कर। अगर लोगों को लूटते हैं, यह सच नहीं है। जिसे भगवान की व्यवस्था में विश्वास है, वही जाएगा मंदिर में, दान देगा, अनाथाश्रम जाएगा, दान करेगा, गौशाला जाएगा, दान करेगा। नास्तिक तो भाषण करता रहेगा। भगवान को आपका नैवेद्य नहीं चाहिए, आपके फूल नहीं चाहिए, आपका हार नहीं चाहिए, आपको चाहिए सीखने कि देना कैसे है। वही के वही कुछ ना मिलते हुए भी देना कैसे है। विश्वास के साथ। देते हुए आगे बढ़ने के लिए अपने आध्यात्मिक जीवन में, भगवान की व्यवस्था के ऊपर विश्वास करना सीखने जो समस्त विश्व को संभालती है। यह है आध्यात्मिक प्रगति। भगवान सिर्फ मंदिर में नहीं, वह आपके अंदर भी है। जब आप बाहर ईश्वर को धोखा देते हैं तो आप अपने अंदर के परमेश्वर को भी धोखा दे रहे हैं। अपने आप को धोखा दे रहे हैं। इस तरह आप पाप करते हैं और इसके परिणाम भुगतते हैं। जब आप वादा करेंगे और उसे समय पर नहीं निभाएंगे तो भगवान को आपको सजा देने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप अपने आप को झूठ बोलने के लिए दंडित करेंगे। अपराधी और न्यायाधीश और फैसले के निष्पादक सभी आपके भीतर ही हैं। इसे समझकर आगे से इस मन्नत मांगने की आदत को छोड़ दीजिए और सच्चे और अच्छे ज्ञान को लेकर आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़िए।
Astrology
Bhagavad Gita
Bhagavatam
Bharat Matha
Devi
Devi Mahatmyam
Ganapathy
Garuda Puranam
Glory of Venkatesha
Hanuman
Kathopanishad
Mahabharatam
Mantra Shastra
Mystique
Practical Wisdom
Purana Stories
Radhe Radhe
Ramayana
Rare Topics
Rigveda Explained
Rituals
Sages and Saints
Shiva
Spiritual books
Sri Suktam
Story of Sri Yantra
Temples
Vedas
Vishnu Sahasranama
Yoga Vasishta