प्राण प्रतिष्ठा कोई अन्ध विश्वास नहीं है

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प्राण प्रतिष्ठा कोई अन्ध विश्वास नहीं है

समीप में एक वीडियो देखा। यह कोई बहस है टीवी पर जिसका संदर्भ है किसी मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा। और बहस में भाग लेने वाले में से एक कहते हैं कि यह पाखंड है, अंधविश्वास है। पाषाण में कभी प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है क्या? दो मुद्दे उठाए गए हैं उनके द्वारा। वे कहते हैं कि कोई वेद मंत्र नहीं है जिसके द्वारा मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है। दूसरा, प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद वो मूर्ति खाना पीना, बोलना, चलना क्यों नहीं शुरू करती है? पहला मुद्दा। वेद का मंत्र। ऋग्वेद, दसवा मंडल। सूक्त संख्या 59। असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिहनो देहि भोगम। जोक्पश्ये सूर्यमुच्छरंत हनुमते मृळयान स्वस्ति। यह एक वेद मंत्र है जो प्राण प्रतिष्ठा में उपयोग किया जाता है। इसका अर्थ है असुनीता नाम वाली प्राणदायिनी देवी से हम प्रार्थना करते हैं, प्राण देखने की शक्ति इत्यादि का स्थापना करें। इसके अलावा और भी मंत्र है वेद में। अथर्ववेद में संपूर्ण प्राण सूक्त है। जिसको अगर आप अच्छे से समझेंगे तो आपको पता चलेगा कि वेद में प्राण शब्द का अर्थ क्या है। प्राण का अर्थ यह नहीं है कि जिसमें प्राण है, वह चलना फिरना, खाना पीना और बोलना शुरू कर देगा। पेड़ पौधों में भी प्राण है, लेकिन वे चलते फिरते नहीं हैं, खाते पीते नहीं हैं। प्राण प्रतिष्ठा का मतलब यह नहीं है। संस्कृत में कई अर्थ हैं प्राण शब्द का जो आप किसी भी निखंडू से जान पाएंगे। आगम शास्त्र में प्राण प्रतिष्ठा के आगे एक और प्रक्रिया है, जीव आवाहन। जो सिर्फ बड़े-बड़े महादेवालयों में होता है। मतलब प्राण और जीव में भी फर्क है। प्राण प्रतिष्ठा करके बाद में जीव का भी आवाहन करते हैं। आत्मी के अंदर पांच मुख्य प्राण और पांच उप प्राण हैं जिनका अलग-अलग कर्तव्य है। यह इतना सरल नहीं है कि प्राण शक्ति की तुलना खाने पीने से और चलने फिरने से की जा सकती है। यजुर्वेद अध्याय 16, मंत्र संख्या 43। इसमें भगवान श्री रुद्र को किम शिला शब्द से संबोधित किया है। नमः किम शिलाय। शिला शब्द का अर्थ तो जानते ही होंगे, पत्थर। जब वेद में यह कहा गया है, तो इसमें तर्क क्या है? वेद ज्ञान का समंदर है। वशिष्ठ महर्षि स्वयं 800 साल वेद का अध्ययन करने के बाद, वे वेद का एक अंश ही समझ पाए। ऋग्वेद की 21 शाखाएं थी, अब हमारे पास दो ही बाकी है। शुक्ल यजुर्वेद की 16 शाखाएं, कृष्ण यजुर्वेद की 88। कब रहा? चार या पांच। सामवेद में कौतुम शाखा, राणायनीय शाखा, जैमिनी शाखा। अथर्ववेद की नौ शाखाएं, बाकी है दो। इनके अलावा उपनिषद, छे वेदांग, श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक भाष्य ग्रंथ, पुराण और इतिहास तो छोड़िए, लाखों पन्ने सिर्फ ग्रंथ। तो फिर हम लोग वेद के बारे में प्रामाणिक तरीके से अंतिम मत कैसे दे सकते हैं? एक और सवाल अक्सर सुनाई देता है। पत्थर को भोग क्यों चढ़ाते हैं? आहार के तीन अंश हैं, रसांश, धातु अंश और मलांश। इनमें से सिर्फ रसांश देवता लोगों को समर्पित करते हैं। तो पूछेंगे क्या सिर्फ मंत्र बोलने से प्राण आ सकता है? यही तो वेद का कहना है। मंत्र में सत्य है। मंत्र सत्य है। मानना नहीं मानना आपके ऊपर है। मां कहती है, बेटा मैं तुम्हारी मां हूं, ये तुम्हारे पिताजी हैं, ये तुम्हारी दादी मां हैं। विश्वास कर लेते हैं कि नहीं? या जांच करने जाते हैं? जब समस्त विश्व के हिताभिलाषी ऋषि मुनियों ने और आचार्यों ने हमें यह शास्त्र दिया है, तो इसमें अविश्वास क्यों करें? पहाड़ से शिला लेकर आते हैं। शिल्पी दिन रात मेहनत करके उससे मूर्ति बनाता है। विद्वान लोग विधिवत वेद मंत्रों का उच्चार करते हैं। हजारों लोग अपनी आस्था से उसे मजबूत करते हैं। वेद कहता है पत्थर में भी ईश्वर है, नदी में भी ईश्वर है। गंगा जी की पूजा क्यों करते हैं? पहाड़ में भी ईश्वर है, कैलाश मानसरोवर क्यों जाते हैं? गाय में ईश्वर है। बताइए वेद के अनुसार किस चीज में नहीं है ईश्वर? समस्त विश्व को ईश्वर समझने के लिए ही वेद ने सिखाया है। यही वैदिक तत्व है। कि किसी का कहना नहीं है, अनुभव है ये। लाखों करोड़ों भक्तों का अनुभव है ईश्वर। किसी का तर्क सिद्ध प्रमाण या युक्ति नहीं है ईश्वर। ईश्वर अनुभव है। जिसमें दृष्टांत की आवश्यकता नहीं है, युक्ति की आवश्यकता नहीं है, प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है, सहमति की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर एक वैयक्तिक अनुभव है जिसे लाखों करोड़ों भक्त प्रतिदिन पाते हैं। मंदिर जाकर, घर में फोटो रखकर, दिया अगरबत्ती करके, तुलसी को पानी चढ़ाकर, पीपल की परिक्रमा करके, गाय माता को चारा देकर। बड़ों का शरण स्पर्श करके। यही आस्था है, यही भक्ति है, यही विनम्रता है। मंत्रे तीर्थे द्विजे देवे देवज्ञे भेषजे गुरौ यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी। मंत्र, तीर्थ, द्विज, देव, दैवज्ञ, औषध और गुरु इनमें जैसी भावना वैसा भल। औषध का सेवन। हां, मैं इससे ठीक हो जाऊंगा, ऐसा मानकर करोगे तो अच्छा होगा। सोचोगे कहीं इस बोतल में जहर तो नहीं है मुझे मारने के लिए? तो फिर क्या नतीजा होगा? भावना सही होनी चाहिए। तब जाकर फल मिलेगा। मंदिर और पूजा सनातन धर्म में कोई नवीन प्रथा नहीं है। ये सब हजारों सालों से हमारी संस्कृति में, हमारे दैनिक जीवन में और हमारी दिल और भावनाओं में रूठ मूल है। प्राण प्रतिष्ठा में उपयुक्त मंत्र वेद में अवश्य है। पत्थर में भी भगवान है, इसका भी प्रमाण वेद में है। आप लोग निश्चिंत अपनी आस्था में, श्रद्धा में अटूट रहें, अटल रहें और परमात्मा सर्वशक्ति ईश्वर की कृपा का पात्र बनें। हरि ओम।

 

  • क्या वेद में मूर्ति पूजा या पाषाण में प्राण प्रतिष्ठा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है?
    हाँ, यजुर्वेद के सोलहवें अध्याय के तैंतालीसवें मंत्र में भगवान रुद्र को किम शिलाय कहकर संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है कि वे पत्थर या शिला में भी विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल के उनसठवें सूक्त में प्राण प्रतिष्ठा हेतु विशिष्ट मंत्रों का वर्णन है, जो निर्जीव प्रतीत होने वाली वस्तुओं में चेतना के आवाहन का आधार बनते हैं।
  • यदि मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है, तो वह मनुष्यों की भांति भोजन या हलचल क्यों नहीं करती?
    प्राण का अर्थ केवल जैविक क्रियाएं जैसे चलना या खाना नहीं होता। शास्त्रानुसार प्राण के कई स्तर हैं। जैसे वृक्षों में प्राण होते हुए भी वे स्थान परिवर्तन नहीं करते, वैसे ही विग्रह में प्रतिष्ठित प्राण आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र होते हैं। यह चेतना का वह स्वरूप है जो भक्त की श्रद्धा से जुड़कर उसे फल प्रदान करता है, न कि भौतिक शरीर की नकल करना।
  • प्राण प्रतिष्ठा और जीव आवाहन में क्या सूक्ष्म भेद है?
    प्राण प्रतिष्ठा एक व्यापक प्रक्रिया है जिसमें पंच प्राण और पंच उप-प्राणों को मंत्रों द्वारा स्थापित किया जाता है। जीव आवाहन इससे भी अधिक गहन प्रक्रिया है जो प्रायः बड़े देवालयों में की जाती है। प्राण उस शक्ति को कहते हैं जो ब्रह्मांड में व्याप्त है, जबकि जीव उस विशिष्ट चैतन्य अंश को कहते हैं जो उस विग्रह को साक्षात देव स्वरूप बना देता है।
  • पत्थर को चढ़ाए गए भोग का वास्तविक अर्थ क्या है और देवता उसे कैसे ग्रहण करते हैं?
    आहार के तीन भाग होते हैं: रसांश, धातु अंश और मलांश। देवता अभौतिक स्वरूप में होते हैं, इसलिए वे केवल रसांश या नैवेद्य की सूक्ष्म ऊर्जा (गंध और भाव) को ग्रहण करते हैं। जैसे पुष्प की सुगंध दूर से ली जा सकती है, वैसे ही मंत्रों के प्रभाव से अर्पित किया गया भोग सूक्ष्म रूप में देवताओं तक पहुँचता है।
  • क्या मंत्रों में वास्तव में इतनी शक्ति है कि वे किसी वस्तु के गुण धर्म बदल सकें?
    वैदिक दर्शन के अनुसार शब्द ही ब्रह्म है। मंत्र केवल ध्वनि नहीं, बल्कि विशिष्ट तरंगें हैं जो सूक्ष्म जगत में परिवर्तन लाने की क्षमता रखती हैं। जब शास्त्रोक्त विधि और पूर्ण श्रद्धा से मंत्रोच्चार होता है, तो वह स्थान और शिला एक आध्यात्मिक ऊर्जा क्षेत्र में परिवर्तित हो जाती है, जिसे भक्त अनुभव कर सकते हैं।
  • आधुनिक युग में तर्क के सामने अनुभव को क्यों प्रधानता दी जानी चाहिए?
    ईश्वर तर्क का विषय नहीं बल्कि अनुभव का विषय है। तर्क की अपनी सीमाएं होती हैं, किंतु अनुभव असीम है। जैसे माता-पिता के प्रति विश्वास के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही करोड़ों भक्तों का सदियों से चला आ रहा अनुभव ही ईश्वर की सत्ता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
  • वैदिक शाखाओं के लुप्त होने से हमारे ज्ञान पर क्या प्रभाव पड़ा है?
    वर्तमान में वेदों की मूल शाखाओं का बहुत छोटा अंश ही उपलब्ध है। इसके बावजूद जो शेष है, वह इतना विशाल है कि उसे समझने में भी कई जन्म कम पड़ सकते हैं। अतः उपलब्ध अल्प ज्ञान के आधार पर किसी प्राचीन परंपरा को पाखंड कहना अनुचित है, क्योंकि पूर्ण सत्य उन लुप्त शाखाओं और रहस्यों में निहित हो सकता है।
  • मंत्रे तीर्थे द्विजे देवे... इस श्लोक का प्राण प्रतिष्ठा के संदर्भ में क्या महत्व है?
    यह श्लोक स्पष्ट करता है कि फल की प्राप्ति केवल विधि पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की भावना पर निर्भर करती है। यदि हमारी भावना शुद्ध है, तो मंत्र, औषधि और गुरु का पूर्ण प्रभाव मिलता है। प्राण प्रतिष्ठा में भी विग्रह तभी जागृत होता है जब प्रतिष्ठा करने वाले और दर्शन करने वाले की भावना में पवित्रता और दृढ़ता हो।
  • क्या सनातन धर्म में जड़ और चेतन के बीच कोई अंतर है?
    वैदिक तत्वज्ञान के अनुसार जड़ कुछ भी नहीं है। कण-कण में ईश्वर का वास है। पत्थर, नदी, पर्वत और वृक्ष, सभी में वही एक चेतना भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त हो रही है। प्राण प्रतिष्ठा इसी सत्य को एक साकार रूप देने की प्रक्रिया है ताकि सामान्य मनुष्य उस निराकार चेतना से जुड़ सके।
  • मंदिर जाने और मूर्ति पूजा करने का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभ क्या है?
    मंदिर एक ऐसा स्थान है जहाँ मंत्रों और अनुष्ठानों द्वारा सकारात्मक ऊर्जा को संचित किया गया होता है। वहाँ जाने से मनुष्य की बिखरी हुई वृत्तियां एकाग्र होती हैं। मूर्ति एक आलंबन का कार्य करती है, जिससे मन को एकाग्र करना सरल हो जाता है और धीरे-धीरे भक्त उस पत्थर के माध्यम से सर्वव्यापी परमात्मा का साक्षात्कार करने लगता है।

 

 

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