
अर्जुन ने भगवान से कहा रथ को कृपया दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कीजिए। मैं देखना चाहता हूं कौन-कौन आए हैं दुर्बुद्धि दुर्योधन के साथ लड़ने।
संजय उवाचा।
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥
भगवान ने दोनों सेनाओं के बीच रथ को ले जाकर खड़ा किया और अर्जुन से कहा: "देखो इन कुरुओं को जो लड़ने आए हैं।" कुरुओं के सम्मुख होकर उनके सामने ही।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥
कौन-कौन थे वहां दोनों सेनाओं में? दोनों सेनाओं की बात हो रही है। कोई पुत्र इस तरफ तो उसका पिता उस तरफ। एक भाई इस तरफ तो दूसरा भाई उस तरफ। आचार्य, पितामह, पुत्र, पौत्र, ससुर, मित्र, कोई इस तरफ तो कोई उस तरफ।
अर्जुन दुखी हो गए और बोले: कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्। अर्जुन उवाचा। दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। "हे भगवान! हे कृष्ण! लड़ने उपस्थित इन बंधु-बांधवों को देखकर मेरा अंग-अंग शिथिल हो रहे हैं।" सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥ "मेरा शरीर कांप रहा है, मेरा मुंह सूख गया है।" गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥ "मेरा धनुष गांडीव मेरे हाथ से गिर रहा है, मेरी त्वचा जल रही है।" निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ "मुझे सब कुछ उल्टा ही दिखाई दे रहा है। क्यों उतरे हम इस लड़ाई में? बंधु-बांधवों को मारकर क्या कल्याण हो सकता है?"
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ "मुझे कोई जीत नहीं चाहिए, मुझे राज्य नहीं चाहिए, मुझे कोई सुख नहीं चाहिए। इस युद्ध से मुझे कुछ भी नहीं पाना है। ऐसे राज्य भोग और जीवन से मुझे क्या मिलेगा?" येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥ "जिनके लिए यह सब पाना है, वे सब तो यहाँ खड़े हैं लड़ने, अपना प्राण भी छोड़ने तैयार होकर मुझसे ही लड़ने। फिर क्या फायदा इस लड़ाई से?" आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥ गुरुजन, काका, मामा, बाबा, पुत्र, पोते, सब मरने के लिए तैयार होकर यहां आ खड़े हैं। एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥ "भले मैं मर जाऊं, मुझे किसी को नहीं मारना है। अगर मुझे तीनों लोकों का राज्य भी मिल जाए, तब भी मुझे इन्हें नहीं मारना। तो जमीन के एक छोटे टुकड़े के लिए क्या मैं इन्हें मारूंगा?" निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥ "इससे कुछ भी लाभ नहीं है। इन्हें मारकर हम पापी ही बन जाएंगे।" तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥ "अपने ही लोगों को मारकर कैसे सुख की प्राप्ति होगी?" यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥ "कौरव इस बात को नहीं समझ रहे हैं लोभ के कारण। पर इस युद्ध से कुल का ही क्षय होने वाला है। बंधु-बांधव और मित्र ही मारे जाएंगे इस युद्ध में।" कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥ "इनको दोष नहीं दिखाई दे रहा है, मुझे तो दिखाई दे रहा है। मुझे इससे बचना चाहिए।" कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥ "हमारा कुल उत्पत्ति से ही धर्म का आचरण करता आ रहा है। कुल नष्ट होने से यह धर्म भी सदा के लिए नष्ट हो जाएगा। राजकुल का नष्ट होने से अधर्म ही फैलेगा जगत में।" अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥ समाज में वर्णसंकर जैसे दोष उत्पन्न होंगे। संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ श्राद्धादि कर्मों का लोप हो जाने से पितर लोग भूखे रह जाएंगे।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ "अधर्म का आचरण करने से नरकवासी होता है। और जो इन सबके लिए कारण बनेगा उसको नरकवास नहीं तो क्या मिलेगा?" अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ "अहो! इस महान पाप को करने मैं कैसे तैयार हो गया?" यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥ "कौरवों के हाथों मैं मरने के लिए तैयार हूं, मुझे आयुध नहीं उठाना है।"
संजय उवाचा। एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥ ऐसा कहकर अपने धनुष और बाणों को त्यागकर अर्जुन रथ में ही बैठ गया।
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