विकृतिं नैव गच्छन्ति सङ्गदोषेण साधवः

विकृतिं नैव गच्छन्ति सङ्गदोषेण साधवः

विकृतिं नैव गच्छन्ति सङ्गदोषेण साधवः।

आवेष्टितं महासर्पैश्चन्दनं न विषायते।।

दुष्टों के संग में होने पर भी साधुजन अच्छे ही रहते हैं | सर्पों से वेष्टित चंदन का वृक्ष, विष थोडी बन जाता है?

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