सन्त वाणी

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धन के पंद्रह दोष

धन कमाने में, कमा लेने पर उसको बढाने, रखने एवं खर्च करने में तथा उसके नाश और उपभोग में - जहां देखो वहीं निरन्तर परिश्रम, भय, चिन्ता, और भ्रम का ही सामना करना पडता है। चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, अहङ्कार, भेद-बुद्धि, वैर, अविश्वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, जूआ और शराब - ये पंद्रह अनर्थ मनुष्यों में धन के कारण ही माने गये हैं।

इसलिये कल्याणकारी पुरुष को चाहिये कि स्वार्थ एवं परमार्थ के विरोधी अर्थनामधारी अनर्थ को दूर से ही छोड दें।

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